मध्य-पूर्व में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष में ईरान के युद्ध जारी रखने के कई रणनीतिक कारण बताए जा रहे हैं। असमान युद्ध रणनीति, इस संघर्ष को लंबा खीच रहे है.
मेजर सरस् त्रिपाठी
मध्य-पूर्व में चल रहे अमेरिका-इस्त्राइल-ईरान संघर्ष के प्रारम्भिक चरण में अमेरिकी रणनीतिक समुदाय का यह अनुमान था कि ईरान सीमित समय तक ही प्रतिरोध कर पाएगा। ऐसा ही अनुमान विश्व के अधिकांश रणनीतिक विशेषज्ञों का भी था। अमेरिका और इस्त्राइल की अत्याधुनिक सैन्य तकनीक, वायु शक्ति और खुफिया क्षमता को देखते हुए यह धारणा बनाई गई थी कि तीव्र और सघन हमलों से ईरान को बातचीत या युद्धविराम के लिए मजबूर किया जा सकेगा। किंतु युद्ध के विकसित होते परिदृश्य से यह संकेत मिल रहा है कि यह अनुमान पूरी तरह सही साबित नहीं हुआ है और ईरान अपेक्षा से अधिक समय तक संघर्ष को जारी रखने में सफल रहा है।
ईरान की इस क्षमता के अनेक कारण हैं। पहला कारण उसकी 'असमान युद्ध' (asymmetric warfare) रणनीति है। अमेरिका पारंपरिक सैन्य शक्ति पर निर्भर है, जबकि ईरान ने मिसाइलों, ड्रोन, साइबर हमलों और समुद्री अवरोध जैसी कम लागत वाली रणनीतियों को अपनाया है। इससे वह कम संसाधनों के बावजूद संघर्ष को लंबा खींच सकता है। अमेरिका की सेना एक पारंपरिक या क्लासिक युद्ध के लिए प्रशिक्षित है, जिसके कारण वह असमान युद्ध में, प्रचंड शक्ति के बावजूद, सफल नहीं हो पाती। वियतनाम और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क है। ईरान के साथ जुड़े कई क्षेत्रीय समूह और संगठन पश्चिम एशिया के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय हैं। इनके कारण युद्ध का दबाव केवल ईरान की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक क्षेत्र में फैल जाता है। इससे अमेरिका और इस्राइल को कई मोर्चों पर संसाधन लगाने पड़ते हैं। ईरान द्वारा पोषित तीन बड़े लड़ाकू संगठन, जो इस क्षेत्र की नियमित सेनाओं से लगातार युद्ध करते रहे हैं, बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनमें यमन में हूथी, इराक-सीरिया-फिलिस्तीन में हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह शामिल हैं। इनमें इस्राइल को सबसे अधिक खतरा हिजबुल्लाह से ही है। इसलिए इस्राइल ने लेबनान पर भी मिसाइलों से हमला किया है और अपनी थलसेना भेजकर जमीनी आक्रमण की तैयारी कर रहा है।
तीसरा कारण भौगोलिक और सामरिक स्थिति है। ईरान का क्षेत्रफल बड़ा है और उसके कई सैन्य प्रतिष्ठान भूमिगत या पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं। इससे उन्हें पूरी तरह नष्ट करना कठिन हो जाता है। इसके अतिरिक्त ईरान की समुद्री स्थिति उसे खाड़ी क्षेत्र के महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों पर प्रभाव डालने की क्षमता देती है।चौथा कारण राजनीतिक और वैचारिक प्रेरणा है। ईरान की सत्ता संरचना में राष्ट्रवादी और धार्मिक तत्वों का गहरा प्रभाव है, जिसके कारण युद्ध को 'प्रतिरोध' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे आंतरिक समर्थन बनाए रखने में मदद मिलती है।
पांचवां कारण ईरान द्वारा नेतृत्व के प्रतिस्थापन की सुदृढ़ व्यवस्था है। अयातुल्ला अली खमेनेई और उनके साथ देश के शीर्ष नेतृत्व को मार डालने के बाद अमेरिका ने यह अपेक्षा की थी कि वहां सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि 'लाइन ऑफ सक्सेशन' संभावित निम्नतम स्तर तक परिभाषित और स्थापित है।
इन सभी कारणों से यह कहा जा सकता है कि अमेरिका की त्वरित विजय की धारणा आंशिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हुई है और ईरान ने अपनी रणनीति के माध्यम से युद्ध को अपेक्षा से अधिक लंबा खींचने की क्षमता दिखाई है। इसी कारण ईरान ने अमेरिका की शर्तों पर युद्धविराम को पूरी तरह नकार दिया है और अपनी शर्तों पर ही युद्ध समाप्त करने की बात कही है।अमेरिका ने कई बार युद्धविराम या बातचीत का प्रस्ताव दिया है, लेकिन ईरान ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके पीछे कई कारण हैं।
1. रणनीतिक प्रतिरोध की नीति
ईरान की सैन्य रणनीति 'दीर्घकालिक प्रतिरोध' पर आधारित है। उसका मानना है कि यदि वह जल्दी युद्ध रोक देता है तो अमेरिका और इस्राइल भविष्य में फिर हमला कर सकते हैं। इसलिए वह यह दिखाना चाहता है कि युद्ध की कीमत बहुत महंगी होगी।
2. सुरक्षा गारंटी की मांग
ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह तब तक युद्धविराम पर विचार नहीं करेगा, जब तक अमेरिका भविष्य में हमला न करने की स्पष्ट सुरक्षा गारंटी न दे।
3. आर्थिक दबाव की रणनीति
ईरान ने तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार को बाधित करके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव डालने की रणनीति अपनाई है। इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
4. घरेलू राजनीति
युद्ध के दौरान अक्सर राष्ट्रवाद बढ़ता है। ईरान के नेतृत्व के लिए यह संघर्ष आंतरिक समर्थन बनाए रखने का भी एक साधन है।
5. क्षेत्रीय शक्ति संतुलन
ईरान मानता है कि यदि वह पीछे हटता है तो मध्य-पूर्व में उसका प्रभाव कम हो जाएगा और इस्राइल तथा अमेरिका की शक्ति और बढ़ जाएगी। इसलिए वह अपने क्षेत्रीय नेटवर्क (हिजबुल्लाह, हूथी, हमास आदि) के माध्यम से संघर्ष को जारी रखे हुए है।
निष्कर्ष यह है कि अमेरिका-इस्त्राइल-ईरान युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। इस युद्ध में ईरान को भारी जनहानि हुई है, लेकिन अमेरिका और इस्राइल भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहे हैं। अमेरिकी सैनिकों की मौत, सैन्य उपकरणों का नुकसान और तेल बाजार में अस्थिरता अमेरिका के लिए चुनौती है, जबकि इस्राइल को मिसाइल हमलों और आर्थिक बाधाओं का सामना करना पड़ा है।
ईरान के युद्ध जारी रखने का मुख्य कारण उसकी रणनीतिक सोच है वह मानता है कि यदि वह दृढ़ता दिखाएगा तो अमेरिका और इस्राइल को दीर्घकाल में पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। इसी कारण युद्धविराम के प्रस्तावों के बावजूद संघर्ष जारी है। ईरान यह भी समझता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले इस्राइल और अमेरिका में जनमत महत्वपूर्ण होता है। अमेरिका में युद्ध का विरोध अधिक और समर्थन बहुत कम है। ईरान यह संदेश भी देना चाहता है कि भविष्य में उसे कम आंकने की भूल न की जाए और अमेरिका इस तरह के दुष्चक्र में फंसने के भय से ग्रस्त रहे। अमेरिका युद्ध के पहले सप्ताह में ही लगभग 12 खरब डॉलर का नुकसान उठा चुका है।यदि इस युद्ध का समाधान ईरान की संवेदनाओं को ध्यान में रखकर नहीं होता, तो यह संघर्ष पूरे मध्य-पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय तक अस्थिरता का कारण बन सकता है।