ईरान-इजराइल तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल है। भारत को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से टैंकरों के गुजरने की अनुमति मिली है। बढ़ती कीमतों और एलपीजी आपूर्ति को लेकर सरकार निगरानी कर रही है।
युद्ध कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, बल्कि यह विनाश, मानवीय संकट और आर्थिक तबाही लाता है। हाल के दिनों में ईरान-इजराइल और मध्य एशिया में चल रहे तनाव के बीच समूचा विश्व सकते में है। युद्ध का ऊंट किस करवट बैठेगा, इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
संकट के हालात के बीच भारत को आज राहत तब मिली, जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से भारतीय तेल टैंकरों को जाने की अनुमति दे दी। इस सफलता के लिए निश्चित रूप से भारत को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरगची से तीन बार बातचीत की, जिसके बाद यह ऐलान हुआ।ईरान ने जो सहूलियत भारत को दी है, उससे अमेरिका, यूरोप और इजराइल वंचित हैं। यही कारण है कि गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर के पार चला गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़शकियान ने जंग रोकने के लिए तीन शर्तें रखी हैं पहली, ईरान को युद्ध का हर्जाना दिया जाए; दूसरी, अमेरिका भविष्य में हमला न करने की गारंटी दे; और तीसरी, ईरान के वैध अधिकारों को मान्यता दी जाए।
ईरान-इजराइल युद्ध के बीच खाड़ी देशों में भी पैनिक का माहौल है। ईरान के हमलों से पहले इन देशों को बेहद सुरक्षित माना जाता था। दुबई, दोहा और अबूधाबी जैसे शहरों की ब्रांडिंग सबसे सुरक्षित और सबसे ज्यादा ऐशो-आराम वाले शहरों के रूप में की गई थी। जब लंदन में बड़े भारतीय उद्योगपतियों पर टैक्स बढ़ा दिया गया, तो कई अरबपतियों ने दुबई को अपना आशियाना बनाया। लेकिन ईरान की बमबारी ने दुबई की इस छवि को झटका दिया है। अब कुछ भारतीय उद्योगपति दुबई छोड़कर या तो यूरोप जा रहे हैं या भारत लौट रहे हैं।भारत में घरेलू इस्तेमाल के लिए रसोई गैस की कमी नहीं है, लेकिन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति में दिक्कत सामने आ रही है। इसका होटल उद्योग पर बुरा असर पड़ा है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली से लेकर पंजाब और महाराष्ट्र तक हजारों छोटे रेस्तरां और होटल बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं। होटल और ढाबे चलाने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
सरकार ने एलपीजी और तेल आपूर्ति की निगरानी के लिए गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में तीन मंत्रियों की एक कमेटी बनाई है, जिसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी शामिल हैं। फिलहाल जमीनी स्तर पर सरकारी कदमों का असर दिखने लगा है। हालांकि होटल मालिकों की शिकायत है कि उन्हें समय पर सिलेंडर नहीं मिल रहे हैं और गैस एजेंसी वाले कालाबाजारी कर रहे हैं।दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में व्यावसायिक सिलेंडर की आपूर्ति में कमी की वजह से होटल और रेस्तरां बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय न तेल की कमी है और न ही गैस की। सरकार ने कहा है कि गैस और तेल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। यह भी बताया गया है कि जरूरत पड़ने पर बाहर से और गैस मंगवाई जा रही है।
इसके बावजूद अफवाहों का बाजार गर्म है, जिसकी वजह से लोग घबराहट में खरीदारी कर रहे हैं। वैसे भी हमारे देश में अफवाहें बहुत तेजी से फैलती हैं और लोग उन पर आसानी से यकीन भी कर लेते हैं। अब तो सोशल मीडिया और एआई का दौर है, ऐसे में सच और झूठ के बीच फर्क करना और मुश्किल हो गया है।लोगों को नरेंद्र मोदी सरकार के संकटकालीन प्रबंधन के रिकॉर्ड को भी देखना चाहिए। कोरोना महामारी से लेकर अनाज संकट तक, हर बार सरकार ने अग्रिम तैयारी की और संकट को आने से पहले रोकने की कोशिश की। इसलिए न पैनिक की जरूरत है और न घबराने की।अभी किसी को पता नहीं कि जंग कब रुकेगी। ईरान ने कहा है कि अगर अमेरिका ने हमले जारी रखे, तो वह खाड़ी से एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने देगा। ट्रंप और पूरा यूरोप तेल की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं और ट्रंप पर जंग रोकने का दबाव भी बढ़ रहा है।
संभव है कि अमेरिका कहे कि उसने ईरान को काफी नुकसान पहुंचा दिया है और अब आगे हमले की जरूरत नहीं है। इससे ईरान को भी अपने घावों पर मरहम लगाने का मौका मिलेगा और वह पड़ोसी देशों पर हमले रोक सकता है। हालांकि यह युद्धविराम अस्थायी हो सकता है। बेहतर यही होगा कि संवाद और कूटनीति के जरिए कोई स्थायी समाधान निकाला जाए।