भारत में लागू चार नई श्रम संहिताएं मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और कार्य सुरक्षा को मजबूत करने के साथ उद्योगों के लिए भी स्थिर विकास का मार्ग तैयार कर रही हैं।
डॉ. नंद किशोर गर्ग
भारत में चार नई श्रम संहिताओं ने श्रमिकों के जीवन को सुरक्षित और समृद्ध बनाते हुए कॉर्पोरेट जगत के लिए दीर्घकालिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। 21 नवंबर 2025 से देशव्यापी रूप से लागू इन संहिताओं मजदूरी संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यस्थिति संहिता ने 29 पुराने जटिल कानूनों को एकीकृत कर श्रम सुधारों का स्वर्णिम अध्याय शुरू किया है। इनसे 77 लाख नई नौकरियां सृजित होने और 85 प्रतिशत श्रमिकों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलने का अनुमान है।
आर्थिक सुरक्षा के मजबूत स्तंभ
नई श्रम संहिताओं ने श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान की है। मजदूरी संहिता के तहत न्यूनतम वेतन की पुष्टि के साथ मूल वेतन को कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50 प्रतिशत अनिवार्य किया गया है, जिससे भविष्य निधि, पेंशन और ग्रेच्युटी पर अंशदान बढ़ेगा और 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।ग्रेच्युटी का अधिकार अब मात्र एक वर्ष की सेवा के बाद मिल सकेगा, पहले की पांच वर्ष की शर्त समाप्त कर दी गई है। फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी समान अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं। ओवरटाइम पर दोगुना भुगतान (8 घंटे से अधिक काम पर प्रति घंटा दोगुनी मजदूरी) ने विशेषकर रियल्टी, इंफ्रास्ट्रक्चर और विनिर्माण क्षेत्रों के मजदूरों को आर्थिक सशक्तिकरण दिया है। लचीले कार्य घंटे लिखित सहमति से प्रतिदिन 8 से 12 घंटे (अधिकतम 48 घंटे साप्ताहिक) ने कार्य संस्कृति को अधिक मानवीय बनाया है। नियुक्ति पत्र अनिवार्य होने से वेतन पारदर्शिता बढ़ी है और हर महीने की 7 तारीख तक भुगतान सुनिश्चित किया गया है।
सामाजिक सुरक्षा का व्यापक जाल
ठेका श्रमिकों, गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म श्रमिकों (जैसे उबर और जोमैटो के डिलीवरी कर्मी) को पहली बार पूर्ण कानूनी मान्यता मिली है, जो असंगठित क्षेत्र के लगभग 50 करोड़ श्रमिकों के लिए ऐतिहासिक कदम है।सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत चिकित्सा बीमा, मातृत्व लाभ, पेंशन, मृत्यु या अपंगता सहायता तथा ई-श्रम पोर्टल आधारित कौशल विकास की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। 90–120 दिन काम करने के बाद ही कई लाभ लागू हो जाते हैं।ठेका कर्मचारियों को भी स्थायी कर्मचारियों के समान सुविधाएं जैसे छुट्टी और चिकित्सा लाभ मिलने लगे हैं। सालाना मुफ्त स्वास्थ्य जांच अनिवार्य की गई है। परिवार की परिभाषा का विस्तार कर अधिक आश्रितों को भी सुरक्षा कवरेज में शामिल किया गया है।व्यावसायिक सुरक्षा संहिता के तहत उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मुफ्त वार्षिक स्वास्थ्य जांच, पीपीई किट, सुरक्षित उपकरण और 100 प्रतिशत दुर्घटना कवरेज (आवागमन के दौरान होने वाली दुर्घटनाएं भी शामिल) अनिवार्य किया गया है।
समावेशिता और सशक्तिकरण का नया युग
इन संहिताओं का प्रमुख उद्देश्य महिलाओं, ट्रांसजेंडर और कमजोर वर्गों का सशक्तिकरण भी है। महिलाओं को सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति, समान कार्य के लिए समान वेतन और खनन, निर्माण तथा मशीनरी क्षेत्रों में कार्य का अवसर दिया गया है।ट्रांसजेंडर श्रमिकों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। निरीक्षक-सुविधाप्रदाता प्रणाली के तहत दंडात्मक व्यवस्था की जगह सहयोगी मार्गदर्शन की व्यवस्था की गई है। डिजिटल अनुपालन जैसे सिंगल रिटर्न और सिंगल लाइसेंस से प्रशासनिक प्रक्रियाएं सरल हुई हैं।
कंपनियों पर प्रारंभिक निवेश, लेकिन स्थायी लाभ
कॉर्पोरेट क्षेत्र ने इन संहिताओं को अवसर के रूप में अपनाया है। आईटी कंपनी टीसीएस ने लगभग 2,128 करोड़ रुपये (1,800 करोड़ ग्रेच्युटी और 300 करोड़ अवकाश नकदीकरण) का प्रावधान किया है। इंफोसिस ने 1,289 करोड़, एचसीएल टेक ने 956 करोड़ और विप्रो ने 303 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।टेक महिंद्रा और एलटीआईमाइंडट्री सहित पूरे आईटी सेक्टर ने 5,400 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर ठेका कर्मचारियों को स्थायी सुविधाएं प्रदान की हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह निवेश कर्मचारी निष्ठा और प्रतिभा प्रतिधारण को बढ़ाता है, जिससे दीर्घकाल में उत्पादकता 20–25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
व्यापार सरलीकरण और आर्थिक गति
सिंगल रजिस्ट्रेशन, लाइसेंसिंग, पारदर्शी नियम और संरचित सुलह प्रक्रिया ने कंपनियों का प्रशासनिक बोझ कम किया है। कंपनियां हर तिमाही 0.10 से 0.15 प्रतिशत तक की बचत कर अनुसंधान, प्रशिक्षण और तकनीकी उन्नयन पर अधिक निवेश कर पा रही हैं।निश्चित अवधि रोजगार व्यवस्था ने श्रमिकों को नियमित शर्तों पर रोजगार दिया है, जबकि विवादों में कमी से कारोबारी स्थिरता बढ़ी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये सुधार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के अनुरूप प्रतिभा आकर्षण को बढ़ावा देंगे।
समृद्धि का स्वर्णिम भविष्य
2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में नई श्रम संहिताएं मील का पत्थर साबित हो सकती हैं। ये सुधार श्रमिकों को सशक्त बनाते हुए आर्थिक वृद्धि को गति दे रहे हैं, जहां उत्पादकता में वार्षिक 7.8 प्रतिशत की वृद्धि का लक्ष्य तय किया गया है।सशक्त श्रमबल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति को मजबूत कर रहा है। वहीं गिग इकोनॉमी को मान्यता मिलने से युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। श्रमिक और उद्यमी के बीच साझेदारी आर्थिक और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक बनती जा रही है, जिससे आत्मनिर्भर से विकसित भारत की यात्रा और आसान हो सकेगी।