पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की कूटनीति चर्चा में है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दे रहा है।
बलबीर पुंज
पिछले दो सप्ताह से पश्चिमी एशिया भीषण युद्ध की आग में धधक रहा है। एक ओर इजराइल-अमेरिका का गठबंधन है, तो दूसरी ओर ईरान, जिसे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रूस और चीन की रणनीतिक सहानुभूति प्राप्त है। सभी पक्षों से भारत के कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए और किसका पक्ष लेना चाहिए इस प्रकार के प्रश्न देश के एक राजनीतिक वर्ग द्वारा उठाए जा रहे हैं।इस संदर्भ में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी का एक अंग्रेजी समाचार-पत्र में आलेख प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता अली हुसैनी खामेनेई की ‘लक्षित हत्या’ पर मोदी सरकार की तथाकथित ‘चुप्पी’ को ‘परेशान करने वाला’, ‘कर्तव्यहीनता’ और ‘न्याय का त्याग’ करने वाला बताया। क्या वाकई ऐसा है? क्या यह सच नहीं कि इस पूरे घटनाक्रम में मोदी सरकार केवल राष्ट्रहित और अपने लोगों (प्रवासी भारतीयों सहित) की सुरक्षा, विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा, को प्राथमिकता दे रही है?
खाड़ी देशों में जारी तनाव को लेकर दो बातें स्पष्ट हैं। पहली, इसमें नैतिकता की बात करना बेमानी है। दूसरी, युद्ध में दोनों ही पक्ष कोई संत नहीं हैं। भारतीय परंपरा में महाभारत का युद्ध केवल वीरता का ही नहीं, बल्कि युद्ध नियमों के टूटने का भी उदाहरण है। कौरवों ने चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु पर कई योद्धाओं ने मिलकर हमला किया, जो युद्ध नीति के विरुद्ध था। वहीं पांडवों ने भी भीष्म पितामह के सामने शिखंडी को खड़ा करके उनका वध किया और द्रोणाचार्य को रोकने के लिए ‘अश्वत्थामा हतः’ का सहारा लिया। इसी तरह भीम ने दुर्योधन की जांघ पर और अर्जुन ने कर्ण के असहाय होने पर प्रहार किया।ऐसे ही अमेरिका-नीत गठबंधन और ईरान भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। ईरान की मौजूदा सत्ता लंबे समय से देश के अंदर दमन और बाहर अस्थिरता फैलाने के आरोपों से घिरी रही है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद बनी इस्लामी व्यवस्था ने अपने कट्टरपंथी विचारों को शेष विश्व पर थोपने की नीति अपनाई। उसकी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) की कुद्स फोर्स ने पश्चिम एशिया में कई जिहादी संगठनों को सहारा दिया। लेबनान में हिज्बुल्लाह और फिलिस्तीन में हमास जैसे संगठन वर्षों से ईरान के समर्थन से सक्रिय रहे हैं। वर्तमान ईरान का ध्येय समस्त विश्व का इस्लामीकरण बताया जाता रहा है। इसलिए जब उसकी इस्लामी सत्ता के खिलाफ देश में महिला अधिकारों को लेकर प्रदर्शन हुए, तो उन्हें कठोरता से दबा दिया गया। स्वयं खामेनेई ने इस वर्ष हजारों प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतारने की पुष्टि की थी।
दूसरी ओर, अमेरिका का इतिहास भी पूरी तरह नैतिकता से युक्त नहीं रहा है। 1955 में उसने अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वियतनाम में युद्ध शुरू किया, जो लगभग 20 वर्षों तक चला और लाखों लोगों की जान जाने के बाद भी वह विजयी नहीं हो पाया। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में बड़े पैमाने पर हिंसा और अत्याचार हो रहे थे, फिर भी अमेरिका ने पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) का समर्थन किया और भारत के खिलाफ अपना विमानवाहक पोत बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया। बावजूद इसके पाकिस्तान को भारत के हाथों शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।1979 से 1989 के बीच सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में अमेरिका ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के समर्थन से इस्लाम के नाम पर मुजाहिदीनों (ओसामा बिन लादेन सहित) को खड़ा किया। बाद में यही समूह तालिबान के रूप में उभरा, जिसके खिलाफ अमेरिका ने न्यूयॉर्क के भीषण 9/11 आतंकी हमले (2001) के बाद अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किया। लेकिन 20 वर्ष बाद उसी तालिबान से समझौता कर वह वापस लौट गया। यानी अमेरिका ने भी अपने रणनीतिक हितों को नैतिकता से ऊपर रखा। वेनेजुएला प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है। यदि वास्तव में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को कट्टरपंथी इस्लामी सत्ता से मुक्त करना चाहते हैं, तो वे पाकिस्तान की कट्टरपंथी सेना के साथ इतनी नजदीकी क्यों बढ़ा रहे हैं?
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में तनाव और टकराव की स्थिति है, तब भारत में इस विषय पर राजनीतिक बहस नाटकीय रूप लेती दिखाई देती है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मध्यपूर्व की स्थिति पर मोदी सरकार की कथित ‘चुप्पी’ की लच्छेदार शब्दों में आलोचना कर रहा है। लेकिन तथ्य कुछ और ही कहानी बताते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर युद्ध से पहले और बाद में भी अपने ईरानी समकक्ष से संपर्क बनाए हुए हैं। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन और बहरीन जैसे इस्लामी देशों के नेताओं से भी बातचीत की है।भारत ने इस युद्ध में संयम बरतने, तनाव कम करने और आम नागरिकों की सुरक्षा पर बल दिया है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते हैं। ऐसे में जल्दबाजी में कोई कठोर बयान देना ‘आग में घी डालने’ जैसा हो सकता था। इसलिए भारत संतुलित और सोच-समझकर कदम उठा रहा है।
विडंबना यह भी है कि जिस खामेनेई के लिए आज कांग्रेस सहित एक राजनीतिक-वैचारिक कुनबे का कलेजा फटा जा रहा है, वे कई बार कश्मीर सहित कई विषयों पर भारत-विरोधी रुख अपना चुके हैं। यह भी दिलचस्प है कि जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग गठबंधन (2004–2014) सरकार सत्ता में थी, तब भारत ने तीन बार अमेरिकी-यूरोपीय दबाव में ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में मतदान किया था।दरअसल, पिछले दशक में भारत की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है। प्रधानमंत्री मोदी यहूदी राष्ट्र इजराइल की दो बार (2017 और 2026) ऐतिहासिक यात्रा कर चुके हैं और इसी दौरान खाड़ी के इस्लामी देशों के साथ भी उनके रिश्ते उच्चतम स्तर पर पहुंचे हैं। संदेश स्पष्ट है भारत अब किसी एक खेमे का मोहरा नहीं है, बल्कि अपने हितों को सर्वोपरि रख रहा है।कोई संदेह नहीं कि अमेरिका-इजराइल और ईरान अपने-अपने उद्देश्यों को साधने में लगे हैं, जिस पर वैश्विक शांति, स्थिरता, नैतिकता, लोकतंत्र और मानवता का दिखावा रूपी मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है। भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वह राष्ट्रहित, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखे। यही व्यवहारिक और जिम्मेदार कूटनीति है।