स्लीपर सेल, ड्रोन और डार्क वेब के खतरे के बीच भारत की पहली एंटी टेरर पॉलिसी ‘प्रहार’ लागू, आतंक के नए रूपों पर सख्त वार।
आतंकवाद अब नए-नए रूपों में सामने आ रहा है। आतंकी संगठन अब भारत के अंदर छिपे स्लीपर सेल के जरिए हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। विदेश में बैठे आका स्थानीय अपराधियों का इस्तेमाल लॉजिस्टिक्स और संवेदनशील क्षेत्रों की रेकी के लिए कर रहे हैं। यानी अब आतंकी और अपराधी मिलकर एक बड़ा नेटवर्क बना चुके हैं।
आतंकवाद का विस्तार अब उन नवयुवकों तक पहुंच चुका है, जो मेट्रो सिटीज में रहते हैं, यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं, लैपटॉप चलाते हैं, रासायनिक फार्मूले समझते हैं और डिजिटल नैरेटिव बनाना भी जानते हैं। आतंकी बंदूकधारी हों या फिर लैपटॉपधारी, इन सभी की बुनियाद कट्टरपंथी विचारधारा पर ही टिकी है। यही वह सोच है, जो एंटी इंडिया नैरेटिव बनाती है और गजवा-ए-हिंद जैसे कैंपेन को फ्यूल देती है।भारत सरकार ने अब आतंकवाद के खिलाफ अपनी जंग को नया नाम और नई धार दी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश की पहली एंटी टेरर पॉलिसी जारी की है, जिसे पीआरएएचएआर (प्रहार) नाम दिया गया है। यह उन अदृश्य खतरों के खिलाफ भारत का अभेद्य किला है, जिसमें अब युद्ध के मैदान केवल सरहदें नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट का डार्क वेब भी हैं।
प्रहार पॉलिसी साफ कहती है कि आतंकवाद का न कोई धर्म होता है, न कोई जाति और न ही कोई राष्ट्रीयता। लेकिन खतरे अब बदल गए हैं, इसलिए साइबर अटैक और हैकरों को भी टेरर की श्रेणी में लाया गया है। अब तक आतंकवाद का मतलब हाथ में बंदूक लिए घुसपैठिया था, लेकिन प्रहार पॉलिसी बताती है कि दुश्मन का चेहरा बदल चुका है। अब खतरा पानी, जमीन और हवा तीनों ओर से है।आतंकवाद के खिलाफ केंद्र की बहुस्तरीय रणनीति के तहत अब सीमा पार से केवल आतंकी नहीं आ रहे, बल्कि ड्रोन के जरिए ड्रग्स, हथियार और विस्फोटक भी भेजे जा रहे हैं। दुश्मन देश ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। आज का आतंकी एके-47 से ज्यादा खतरनाक तरीके से क्रिप्टो वॉलेट और एन्क्रिप्शन टूल का इस्तेमाल कर रहा है। पहचान छिपाने वाली तकनीकें एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई हैं।
प्रहार पॉलिसी में डार्क वेब पर भी विशेष फोकस रखा गया है, क्योंकि आतंकी अब फंड जुटाने के लिए बैंकों की बजाय क्रिप्टो वॉलेट का सहारा ले रहे हैं। भर्ती और ट्रेनिंग गाइडेंस के लिए इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हो रहा है। इंटरनेट की दुनिया में पहचान छिपाकर आतंकी हमले की साजिश रचना अब आसान हो गया है। प्रहार पॉलिसी इसी डिजिटल अंधेरे में छिपे शिकारियों को बेनकाब करने की रणनीति है।इस पॉलिसी में सीबीआरएनई (केमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल, न्यूक्लियर और एक्सप्लोसिव) खतरों का भी जिक्र है। गृह मंत्रालय का मानना है कि आतंकी अब ऐसे खतरनाक मैटीरियल तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे बड़े पैमाने पर तबाही मचाई जा सके। चाहे वह जहरीली गैस का हमला हो या डिजिटल वायरस के जरिए पूरे देश का पावर ग्रिड ठप करना, भारत अब इन कल्पना से परे खतरों से निपटने के लिए भी तैयार है।
प्रहार पॉलिसी का एक अहम हिस्सा रेडिकलाइजेशन से निपटना भी है। चूंकि आतंकी संगठन भारतीय युवाओं को गुमराह कर अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए इस पॉलिसी में केवल बंदूक नहीं, बल्कि दिमाग के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। जो युवा भटक गए हैं, उन पर पुलिस चरणबद्ध तरीके से कार्रवाई करेगी। सरकार ने माना है कि कट्टरपंथ के जहर को खत्म करने के लिए उदारवादी प्रचारकों और एनजीओ की मदद लेना जरूरी है। यह पॉलिसी समाज के साथ मिलकर आतंकवाद की जड़ें काटने पर जोर देती है।भारत ने इस पॉलिसी में अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों का नाम लेकर दुनिया को भी आगाह किया है।