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Extreme Heat Signals Climate Crisis in India

बड़े जलवायु संकट की चेतावनी है असामान्य गर्मी

भारत में मार्च 2026 की शुरुआत में ही असामान्य गर्मी दर्ज की गई है। कई शहरों में तापमान सामान्य से 6–7 डिग्री अधिक रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बड़े जलवायु संकट और लंबी हीटवेव का संकेत हो सकता है।


बड़े जलवायु संकट की चेतावनी है असामान्य गर्मी

ज्ञानेन्द्र रावत

भारत में गर्मी का बढ़ता संकट अब केवल भविष्य की आशंका नहीं रह गया है, बल्कि इसके संकेत वर्ष 2026 के मार्च महीने की शुरुआत में ही दिखाई देने लगे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में 10 मार्च को अधिकतम तापमान लगभग 35–37 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया, जो सामान्य से करीब 6-7 डिग्री अधिक है, जबकि न्यूनतम तापमान लगभग 18.8 डिग्री सेल्सियस रहा।

इसी तरह उत्तर भारत के कई शहरों में तापमान असामान्य रूप से बढ़ा हुआ है। आगरा में तापमान 37.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि राजस्थान के कई हिस्सों में मार्च की शुरुआत में ही पारा 40 डिग्री के आसपास पहुंचने लगा है। पश्चिमी भारत में भी हालात अलग नहीं हैं अहमदाबाद में मार्च की शुरुआत में तापमान 41.2 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग सात डिग्री अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी जल्दी तापमान का इस स्तर तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि इस बार गर्मी का मौसम असामान्य रूप से लंबा और तीखा हो सकता है।

दरअसल, यह केवल कुछ शहरों की अस्थायी स्थिति नहीं है। विभिन्न शोध-अध्ययनों से संकेत मिलता है कि भारत के आधे से अधिक जिलों पर अत्यधिक गर्मी का खतरा मंडरा रहा है और देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में इसके जोखिम के दायरे में आ चुकी है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन ‘हाउ एक्सट्रीम हीट इज इंपैक्टिंग इंडिया: असेसमेंट ऑफ डिस्ट्रिक्ट लेवल हीट रिस्क–2025’ तथा ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार देश के 417 जिले उच्च जोखिम और 201 जिले मध्यम जोखिम की श्रेणी में आते हैं।

अत्यधिक गर्मी के सबसे अधिक खतरे वाले राज्यों में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गोवा, केरल, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं। स्थिति का एक नया और चिंताजनक पहलू यह भी है कि उत्तर भारत के पारंपरिक रूप से शुष्क माने जाने वाले क्षेत्रों में अब तटीय इलाकों जैसी उमस महसूस होने लगी है। सिंधु और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में पिछले एक दशक की तुलना में आर्द्रता लगभग 10 प्रतिशत बढ़ गई है। दिल्ली, कानपुर, वाराणसी और जयपुर जैसे शहरों में जहां पहले आर्द्रता का स्तर लगभग 30–40 प्रतिशत के बीच रहता था, वह अब बढ़कर 40–50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इससे तापमान का प्रभाव और अधिक असहनीय हो जाता है।

भारत में अत्यधिक गर्मी से जुड़ा सबसे चिंताजनक रुझान अत्यधिक गर्म रातों, यानी ‘हॉट नाइट्स’, की बढ़ती संख्या है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब रात का तापमान सामान्य से अधिक बना रहता है तो मानव शरीर को दिनभर की थकान से उबरने का अवसर नहीं मिलता। इससे हीट स्ट्रोक और हृदयाघात की आशंका बढ़ जाती है तथा हृदय रोगों से जुड़ी अन्य जटिलताओं का खतरा भी बढ़ जाता है।विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान वृद्धि के ये प्रभाव वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने से पहले ही दिखाई देने लगेंगे। अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में लाखों घरों और कार्यालयों में कूलिंग सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों में वृद्धि हो सकती है।

भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक विकासशील देश भीषण गर्मी के बढ़ते प्रभाव से जूझ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि औद्योगिक युग के बाद वैश्विक औसत तापमान लगभग 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, तो वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग 41 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 3.5 अरब लोग, खतरनाक स्तर की गर्मी का सामना करने के लिए विवश होंगे। वर्ष 2010 में यह आंकड़ा लगभग 23 प्रतिशत था।अध्ययन के अनुसार भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिलीपींस इस संकट से सर्वाधिक प्रभावित हो सकते हैं, जबकि ब्राजील और दक्षिणी सूडान जैसे देशों में तापमान वृद्धि की गति सबसे तेज रहने की आशंका है। एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के अनुसार फिजी, पापुआ न्यू गिनी और मार्शल द्वीप जैसे कई द्वीपीय देशों में भी भविष्य में गर्मी का खतरा मध्यम से उच्च स्तर तक पहुंच सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी केवल तापमान की समस्या नहीं है, बल्कि यह बहुआयामी संकट बनती जा रही है। इससे अंग विफलता, चक्कर, सिरदर्द और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं तथा कई मामलों में यह मृत्यु का कारण भी बन सकती है। शिक्षा, कृषि, श्रम उत्पादकता, आजीविका और विस्थापन पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा है, क्योंकि यह बिना स्पष्ट चेतावनी के धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है।वर्ष 2026 की शुरुआत में ही दुनिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, सूखा और जंगलों में आग की घटनाओं ने इस खतरे की गंभीरता का संकेत दे दिया है। वर्ष 1950 के बाद से हीटवेव या लू की आवृत्ति और तीव्रता में लगातार वृद्धि देखी गई है। इसके साथ ही कई विकासशील देशों में कमजोर बुनियादी ढांचा और सामाजिक-आर्थिक असमानताएं भी जोखिम को बढ़ाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि अत्यधिक गर्मी के कारण भारत में श्रम उत्पादकता में भारी कमी आ सकती है और देश के सकल घरेलू उत्पाद पर लगभग 4.5 प्रतिशत तक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने अमेरिका, चीन और भारत में वर्ष के दौरान 23 से 30 अतिरिक्त अत्यधिक गर्म दिनों की संभावना भी व्यक्त की है।संयुक्त राष्ट्र ने इस बढ़ते संकट को देखते हुए देशों से तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। संगठन के अनुसार मौसम और जलवायु जोखिमों से जुड़ी अधिक सटीक जानकारी को निर्णय प्रणाली और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र में शामिल करना जरूरी है। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के बीच बेहतर योजना और सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देना भी आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। भारत और अन्य उच्च जोखिम वाले देशों के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि कृषि प्रणालियों को बदलकर उन्हें अत्यधिक तापमान के अनुकूल बनाना अब समय की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।

 

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