ईरान-यूएस और इजराइल संघर्ष से होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, दुनिया की तेल और गैस आपूर्ति प्रभावित। भारत ने रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक मार्गों से ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखी।
विवेक शुक्ला
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच खाड़ी में चल रही भयंकर जंग ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। इस जंग ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) को लगभग पूरी तरह बंद कर दिया है। इन दिनों आप यह नाम बहुत सुन-पढ़ रहे होंगे। यह रास्ता दुनिया के कुल तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा ले जाता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, यह इतिहास की सबसे बड़ी ऊर्जा आपूर्ति रुकावट है।
इस जंग से खाड़ी इलाके में तेल-गैस उत्पादन रोजाना कम से कम 1 करोड़ बैरल कम हो गया है। ईरान के हमलों से खाड़ी देशों की तेल-गैस सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। नतीजा यह हुआ कि तेल की कीमतें 100–120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ी और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा है।
दुनिया पर इसका असर कई तरह से पड़ रहा है। यूरोप और एशिया जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, क्योंकि वे अपनी ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा होर्मुज रास्ते से आयात करते हैं। रेड सी में पहले से ही हूती विद्रोहियों के हमलों से जहाजों का रास्ता मुश्किल हो गया था। इससे जहाजों से माल ढुलाई की लागत पहले ही बहुत बढ़ चुकी थी। अब होर्मुज बंद होने से टैंकरों का आवागमन 98 प्रतिशत तक गिर गया है। एलएनजी की आपूर्ति भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। कतर जैसे बड़े निर्यातक देशों की क्षमता कम होने से यूरोप में गैस की कीमतें 45 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। विकासशील देशों में ईंधन महंगा होने से खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हैं और फैक्टरियां प्रभावित हो रही हैं। खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, इराक) में उत्पादन रुकने से पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला में देरी हो रही है। यह जंग साफ दिखाती है कि फॉसिल ईंधन (कोयला, तेल, गैस जैसे पारंपरिक ईंधन) पर इतनी निर्भरता कितनी खतरनाक है। दुनिया की अर्थव्यवस्था सिर्फ एक छोटे से चोकपॉइंट (होर्मुज जैसे संकरे रास्ते) पर टिकी है, जो कभी भी हिल सकती है।
अब बात भारत की। भारत 85–90 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से लाता है, जिसमें से 45–50 प्रतिशत (रोजाना 2.5–2.7 मिलियन बैरल) खाड़ी से होर्मुज रास्ते से आता है। एलपीजी का 90 प्रतिशत और एलएनजी का बड़ा हिस्सा भी यहीं से आता है। जंग से आयात रुकने पर ईंधन की कमी का डर है। भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) में सिर्फ कुछ दिनों का स्टॉक है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी, रुपया कमजोर होगा और सरकारी बजट का घाटा बढ़ेगा। हवाई यात्रा और ट्रांसपोर्ट क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित होंगे। इसका असर दिख रहा है। देशभर के छोटे होटल, रेस्तरां और ढाबे बंद होने लगे हैं। फिर भी भारत ने समझदारी से कदम उठाए हैं रूसी तेल का आयात 40 प्रतिशत तक बढ़ाया।
स्पॉट मार्केट, यानी तुरंत खरीद-बिक्री का बाजार, जहां जरूरत पड़ने पर तुरंत तेल खरीदा जाता है (लंबे अनुबंध के बजाय)। भारत ने ऐसे बाजार से 3 करोड़ बैरल तेल खरीदा। सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन और अबूधाबी-फुजैरा पाइपलाइन जैसे वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल बढ़ाया।आगे क्या विकल्प हैं? अगर बात अल्पकाल की करें तो आयात को विविध बनाना जरूरी है। भारत और दुनिया को रूस, अमेरिका, अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) और दक्षिण अमेरिका से अधिक तेल-गैस लानी होगी।
मेगावॉट देखें नवीकरणीय ऊर्जा (साफ ऊर्जा) ही असली समाधान है। सौर, पवन और हाईड्रोजन ऊर्जा से फॉसिल ईंधन की राजनीतिक कमजोरियों से बचा जा सकता है। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करना है। इसमें सौर पार्क, पवन फार्म और इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार शामिल है, जिससे तेल पर निर्भरता कम होगी। परमाणु ऊर्जा (छह नए रिएक्टर प्रस्तावित), घरेलू गैस उत्पादन (KG बेसिन) को बढ़ावा दिया जाएगा। हाईड्रोजन मिशन और बैटरी स्टोरेज से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
जानकार कहते हैं कि साफ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए। यह पर्यावरण और सुरक्षा दोनों के लिए अच्छा है। एशिया को एलएनजी पर ज्यादा निर्भरता कम करके साफ ऊर्जा अपनानी चाहिए।यह खाड़ी की जंग दिखा गई कि ऊर्जा सुरक्षा कितनी नाजुक है। दुनिया को ऐसे संकरे रास्तों पर निर्भरता खत्म करनी होगी। भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की राह पर तेजी से चलना चाहिए। विविध स्रोतों से आपातकालीन भंडारण और हरित ऊर्जा में निवेश ही स्थायी रास्ता है। अगर सही कदम उठाए जाएं, तो यह संकट एक बड़ा अवसर बन सकता है एक मजबूत और स्वतंत्र ऊर्जा भविष्य का।