होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की चेतावनी के बाद तेल बाजार में उथल-पुथल। कच्चा तेल 100 डॉलर पार जाने का खतरा, भारत और यूरोप पर बढ़ता दबाव।
सुभाष सिंह सुमन
ये है होर्मुज जलडमरूमध्य। ईरान का सबसे बड़ा हथियार। तेल-गैस से अमीर बने अरब के जितने देश हैं, सबकी गर्दन इसमें फंसी है। सबका तेल-गैस इसी रास्ते से जाता है। रास्ता बंद, तेल-गैस का व्यापार बंद। यह जलडमरूमध्य एक जगह सिर्फ 33 किलोमीटर चौड़ा है। मतलब इसको बंद करने के लिए ईरान को मिसाइल चलाने की भी जरूरत नहीं है। सस्ते ड्रोन ही यह काम बड़े आराम से कर सकते हैं, जो ईरान के पास भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं।
ईरान ने कल धमकाया कि कोई गुजर मत जाना इस रास्ते से। जो जहाज आयेगा इधर, उसमें आग लगा दिया जायेगा। अमेरिका वाले इसका खंडन कर रहे हैं। अमेरिकी सेना का कहना है होर्मुज बंद नहीं है। पहले की तरह खुला है। कोई दिक्कत नहीं है। सब आम दिनों की तरह आयें-जायें।
लेकिन मजे की बात है कि अमेरिकी सेना के इस दावे पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा है। ईरान ने पहले रेडियो से चेतावनी दी थी, तो उसके बाद 70% आवाजाही बंद हुई। अब ईरानी सेना के अधिकारी ने टीवी पर आकर चेतावनी दी है, तो ऑलमोस्ट 100% आवाजाही बंद हो गयी है।
अब इसका असर दूर-देश तक हो रहा है। कच्चा तेल 80 डॉलर पर है। होर्मुज एक सप्ताह भी बंद रहा तो कच्चा तेल 100 डॉलर बिना किसी हिचक के पार करेगा। यह ट्रंप चचा के ईगो पर अटैक होगा। चचा के लिए कच्चे तेल को सस्ता रखना टैरिफ की तरह प्रतिष्ठा का प्रश्न है। ओपेक प्लस के देश बोल रहे थे उत्पादन बढ़ाने के लिए। निश्चित ट्रंप चचा के कहने पर योजना बनी होगी। लेकिन मुद्दा है कि ओपेक प्लस उत्पादन तो बढ़ा लेगा, लेकिन तेल-गैस भेजेगा किस रास्ते से? फिर ट्रंप चचा के पास विकल्प बचता है कि सबको रूस से तेल खरीदने के लिए बोलें।
ट्रंप चचा की इस ग्रैंड मस्ती में सबसे बुरी तरह कट रही है यूरोप की। चचा के कहने पर यूरोप ने रूसी गैस खरीदना बंद किया। अब यूरोप को गैस मिल रही है या तो अमेरिका से या गल्फ से। गैस सबसे अधिक निकालता और बेचता है कतर। कतर के कुछ सबसे बड़े गैस संयंत्रों पर ईरान ने ड्रोन गिराये हैं। संयंत्र बंद हो गये हैं। जो छोटे-मोटे चल रहे हैं, उसका भी फायदा नहीं है, क्योंकि गैस बाहर जा नहीं सकता। तो यूरोप में कल गैस के भाव एक दिन में 50% चढ़ गये।
बची भारत की बात, तो हमारी यूरोप से कम नहीं कट रही है। चचा के आदेश पर आदर्श बालक की तरह हमने रूसी तेल खरीदना बहुत कम कर दिया है। जनवरी में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद 44 महीने के निचले स्तर पर आ गयी। फरवरी के आँकड़े आयेंगे तो और कम मिलेंगे। अब हमारा तेल आ रहा अमेरिका (वेनेजुएला वाला भी अमेरिका का ही है) से या गल्फ से। नोमुरा का विश्लेषण बता रहा है- अभी भारत जो तेल खरीदा रहा, उसमें आधे से अधिक होर्मुज के रास्ते आ रहा था। यह आ नहीं सकेगा। भारत के पास नहीं खरीदने का विकल्प नहीं है। हम अपनी जरूरत का 85% तेल बाहर से खरीदते हैं। तो इसपर आ गयी आफत। कच्चा तेल 100 डॉलर जायेगा, ये अलग आफत। अब ट्रंप चचा थोड़ी दया दिखायें और कुछ समय रूसी तेल खरीदने पर डंडा न चलायें, तभी भारत को राहत मिल सकती है।