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Holi Special: Phagun Ke Aangan Se Shubh Holi

फागुन के आंगन से सबको शुभ होली

फागुन के रंग, बासंती बयार और फाग-उमंग के बीच होली का उत्सव. रंग, गुलाल, गुझिया और गीतों से सजी शुभ होली की कहानी.


फागुन के आंगन से सबको शुभ होली

पंकज तिवारी

शीत शरीर को सिकोड़कर रख देता है। मन बेचारा चहलकदमी करते हुए कुछ करना तो चाहता है, जिसके सहारे तन उछल-कूद कर धरा के दामन पर अपनी छाप छोड़ते हुए हसीन हो जाना चाहता है, पर वही शीत और सिकुड़न प्रतिफल यह कि सारे अरमानों पर पानी फिर जाता है। वैसे ठंड में पानी? ना बाबा ना..! आंखों में गलन का एहसास, तन-मन में ठिठुरन का भय, अलाव के साथ को व्याकुल हाथों को इन सबसे इतर कुछ और करने, रचने की कहां सुधि होती है। क्रियात्मक कलापों को आतुर मनुष्य द्वंद्व के थपेड़ों से जूझता जान पड़ने लगता है, जूझता भी है। इच्छाओं पर पहरा लग जाता हो जैसे। पर समय है, चलता रहता है कहां रुकता है? कहां कोई स्थिर रह सकता है एक जगह। फिर शीत की क्या बिसात।

बेचारे को ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कुंचे से हम निकले’ वाली शैली में भागना पड़ा, बेआबरू होकर, हर वर्ष की भांति। दुखी आंखों को उम्मीद की लहलहाती लौ दिखने लगी। भास्कर खिले हुए ललाटों के साथ अधरों पर खूबसूरत मुस्कान लिए धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति को और अधिक प्रभावशाली बनाते हुए, मदमस्त, मलंग चाल में दिन-ब-दिन बढ़ने लगते हैं। हरियाली, जो सूखकर लकड़ी हो गई थी, धीरे-धीरे प्रफुल्लित, स्फुटित होने को तैयार होने लगी। पीले, लाल, गुलाबी फूलों के साथ बेचैन शाखाएं मुस्कराते हुए वसंत के स्वागत को आतुर हो, रंग-बिरंगे, महकते गुलदस्तों से भरी थाल के साथ दिवाकर के स्वागत में तत्पर दिखने लगी हैं।

बांह फैलाए पक्षियों के मानिंद, रंग-बिरंगे, खुले आसमान में महकते हुए दूर तक फैल जाना चाहते हैं। खेत-खलिहान, जहां अभी तक बस उजाड़ ही उजाड़ नजर आ रही थी, रंगों की थाप पर बासंती हवा के साथ थिरकने को आतुर खड़े हों जैसे। समय के साथ धरा रंग-बिरंगे, मखमली फूल-पत्तियों, पेड़ों के साथ सज-धज कर खड़ी हो गई है, सजी-धजी नववधू की भांति जिसके कानों में कुंडल, बालों में जूड़ा, हाथों में कंगन, पांवों में पायल, सब के सब फूल-पत्तियों के संयोग से बने हैं।

वृक्षों की लचकती शाखाओं में बांसुरी बजाते, नाचते-झूमते मोहक मुस्कान के साथ मोहन की छवि नजर आने लगती है। गोपिकाओं के रूप में हवाओं की बासंती बयार चहुंओर नाचती, झूमती, इठलाती, गाती मगन मन से सरसों के पीले फूलों को छेड़ते-छाड़ते, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले घूमने लगी है।समय फिर बदला। नीरस से वातावरण में रंगों की महत्ता धरा को महकते माहौल में तब्दील करने लगी है। लोगों में उत्साह, प्रेम, उजास भरे मटके से छलकते जल की भांति दिखने लगा है। रंग-उमंग लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा है। गाय-गोरु सहित सभी के तन-मन में एक अजीब-सी सिहरन, छुअन का एहसास होने लगा है। वैमनस्यता भूलकर सभी आपस में बतियाना, गपियाना चाहते हैं। रंगों से खेलना और हंसी-ठिठोली करना चाहते हैं।

‘होरी खेले रघुबीरा अवध में होरी खेले रघुबीरा’ प्रभु श्रीराम की भांति कनक पिचकारी से एक-दूसरे पर रंग उड़ाना चाहते हैं। तो नंदलाल किशन की भांति बिरज में होली खेलना चाहते हैं, जहां ग्वाल-बाल सखाओं की मस्ती की सारी हदों को फांद कर पूरे फाग का आनंद लेना चाहते हैं। वहीं सखियों के गालों पर रंग-बिरंगे अबीर को मलकर, रंग-अबीर-गुलाल से पूरे गोकुल, बरसाना, वृंदावन को सराबोर कर देना चाहते हैं।सखियों का झुंड भीगे भागे वस्त्रों में ‘मन मोहन लाल बरसाने कब अइबऽ’ जैसे फाग गानों के साथ पूरे गली-मोहल्ले, गांवों तक घूम-झूम आना चाहता है। सभी लोग रात-रात भर जागकर बनाई गईं गुजियाें की मिठास लिए, लोगों के अधरों से मस्त, मदमस्त, मुकम्मल फागों के साथ झूम लेना चाहते हैं। बच्चे-बूढ़े सभी जवान बन जाना चाहते हैं। बाल्टी भर-भर रंगों से आते-जाते लोगों को नहला कर रंगों में डुबो देना चाहते हैं।

देवर-भउजी का तो पर्व ही है होली। होली आ गई है। लोग झूम रहे हैं। होलिका दहन में सारे गिले-शिकवे, पाप आदि का दहन हो रहा है। हर जगह उत्सव है, उत्साह है, उमंग है, रंग-अबीर का संगम है। हंसते-खिलखिलाते, झूमते-नाचते चेहरे हैं, तो मदमस्त चाल में ठंडई के प्रभाव से लड़खड़ाते कदम भी हैं। गले से लटकती ताल पर ताल मिलाती जोर आवाज में बजती ढोलक है, तो दोनों हाथों से बजती झांझ है।हाथ फैलाकर फगुआ गाते लोगों का झुंड है, तो श्रोतादीर्घा में बैठे लोग भी झूमने को मजबूर, बल्कि नाचते-पगलाते दिखते हैं। हर जगह बस और बस खुशियों का रेला है। हंसते-गाते-नाचते लोगों का मेला है। रंग-अबीर-गुलालों का उड़ता बादल है, तो सिर चढ़कर बोलते अबीर से बहका-बहका लोगों का मन है। हर तरफ बस और बस धूम है।

कहीं काशी के मशान की बात है, तो कहीं वृंदावन-बरसाने की ही रौनक। कहीं लट्ठमार होली है, तो कहीं कपड़ा-फाड़ होली। कहीं गोबर, तो कहीं मिट्टी से सने बिना होली को अधूरा मानने वाले लोग। हर अधर पर ‘होलिया में उड़े रे गुलाल..’ उड़ता हुआ-सा दिख रहा है उड़ते रंग, अबीर-गुलाल की भांति। हवा में एक ही शब्द की अधिकता है  ‘बुरा न मानो होली है, होली है भई होली है।’