होली के चंदे पर व्यंग्यात्मक नजर। मोहल्ले की राजनीति, बच्चों की टीम और चंदा लेने-देने का अनकहा मनोविज्ञान।
प्रदीप औदिच्य
इस बार एक फोकटिया-सी यूनिवर्सिटी की परीक्षा में होली के चंदे पर निबंध लिखने को आया। छात्र वे थे, जिन्होंने होली को सिर्फ़ व्हाट्सएप की फोटो में देखा था। उनके पेरेंट्स ने बताया था कि होली गली-मोहल्ले का त्योहार है, हम सोसायटी में रहते हैं।छात्रों ने जो लिखा, वह कुछ ऐसा था। चंदा इस देश की सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्वस्थ परंपरा का हिस्सा है। चंदे से कई काम होते हैं, कई लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में चंदे की बड़ी भूमिका है। चंदा शब्द कहां से आया, इस बात की तो किसी को नहीं पता, पर चंदा कहां से नहीं आया, ये सबको पता रहता है।
सब लोग सब काम नहीं कर सकते, ऐसे ही चंदा लेने का कौशल हर किसी में नहीं होता। चंदे के इतिहास की स्टडी पर ये खोज होनी चाहिए कि किस राजा से किसने सबसे पहले चंदा मांगा था। चंदा को लेकर खराब विचार उनके बीच आते हैं, जो चंदा नहीं देते या एकत्रित करने नहीं जाते।चंदा लेना बहुत मुश्किल कामों में से एक है। चंदा लेने जाने से पहले एक स्पेशल टीम बनानी पड़ती है। जैसे छापे डालने के लिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की टीम होती है। कौन कितने साल का अनुभवी है, पहले उसने कब-कब चंदा उगाया है, ये देखकर ही टीम बनाई जाती है। इसके लिए राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता से रखा जाता है। अगर ट्रैफिक पुलिस का रिटायर्ड सिपाही मिल जाए तो वही टीम लीडर होता है।
अब बात सबसे ज़्यादा चर्चा वाली, होली के चंदे की होती है। होली का चंदा, चंदा एकत्रित करने का प्रशिक्षण स्कूल है। यहां से चंदा कैसे लिया जाए, ये सीखा जाता है। क्योंकि होली जलाने की जिम्मेदारी कई बरस से बच्चों के नाज़ुक कंधों पर आ गई है।बड़े तो होली जलाने को छोटा काम समझते हैं, इसलिए वे पड़ोसी से लेकर दफ्तर तक सहयोगी को मन ही मन जलाने-जलाने का काम करते हैं। कई लोग होली जलाने से लेकर रंग तक से परहेज करते हैं। रंग से इसलिए डरते हैं कि उनके खुद के पास इतने रंग बदलने के कारण हैं, इसलिए वे नए रंग से परहेज करते हैं।
चंदा मांगने वाले और देने वाले, दोनों एक-दूसरे को गंध से पहचान लेते हैं। देने वाला पहचान लेता है कि ये बिना मांगे टलेगा या नहीं, मांगने वाला पहचान लेता है कि ये देगा या नहीं देगा, और देगा तो मन में कितने देने की बात है। फिर उसी हिसाब से चंदे की बात करता है।दो दिन पहले बच्चों की एक टीम मेरे मोहल्ले में चंदा लेने निकली। एक घर का दरवाज़ा खटखटाया। अंकल बाहर आए, बोले क्या चाहिए। बच्चे बोले चंदा। अंकल बोले किस चीज़ का चंदा? होली का चंदा। कहां जलेगी? बच्चे बोले मोहल्ले के कोने पर।अंकल ने फिर चंदे की पूछताछ जारी रखी। कितना लेना है? बच्चों ने जवाब दिया पचास रुपए। लकड़ी कितनी लाओगे? कंडे लाओगे? और क्या-क्या आएगा? मुझे लगा कि अंकल अब बच्चों से आधार कार्ड और ऑडिट रिपोर्ट भी मांग ही लें।अब चंदा लेने में थोड़ा सा बदलाव हुआ है। चंदा लेने जाने वाले बच्चे शातिर नहीं हैं, वरना पहले हालात ऐसे थे कि चंदा कम देने पर घर से लकड़ी-सामान उठाकर होली में रख देते थे।
चंदा नहीं देने वाले भी बहुत शातिर होते हैं। पहले तो बाहर से आई आवाज़ पर ही उनकी छठी इंद्री खुल जाती है। वे अपने बेटे से कहलवा देते हैं पापा घर पर नहीं हैं। ये तीर चला तो ठीक, नहीं तो कोई दूसरा शस्त्र अपनाते हैं, जैसे बाद में ले जाना, हम तो हमेशा ही देते हैं। इसके बाद भी अगर चंदा टीम अड़ी रहे, तो फिर चेहरे के भाव छुपाकर चंदा देना ही पड़ता है। ये चंदा लेने-देने का काम किसी किताब का हिस्सा नहीं है, ये तो अनुभव से सीखा जाता है।