आपातकाल के दौरान भोपाल के लोकतंत्र सेनानी बिहारी लाल ने नौकरी, परिवार और सुरक्षा दांव पर लगाकर लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी। पढ़िए उनकी संघर्ष गाथा।
विनोद दुबे
भोपाल। आपातकाल के दिनों को याद करते हुए भोपाल के लोकतंत्र सेनानी बिहारी लाल बताते हैं कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें बेगमगंज जेल में बंद जनसंघ नेता लक्ष्मीनारायण शर्मा के माध्यम से स्व. कुशाभाऊ ठाकरे का संदेश मिला था। ठाकरे जी ने कहलवाया था कि संघर्ष का मार्ग कठिन अवश्य है, पर जो लोग राष्ट्र और लोकतंत्र की रक्षा के लिए खड़े होते हैं, वे कठिनाइयों से घबराते नहीं, बल्कि उन्हें धैर्य और साहस के साथ स्वीकार करते हैं।
इस संदेश के उत्तर में बिहारी लाल ने जो पत्र भेजा, वह उनके दृढ़ संकल्प का परिचायक था। उन्होंने लिखा, ठाकरे जी से कहियेगा कि एक साधारण राजनेता पांच वर्ष की सोचता है, एक दूरदर्शी राष्ट्रभक्?त दस वर्ष की और एक राष्ट्र निर्माता सौ वर्ष की। हम राष्ट्र निर्माण के संकल्प के साथ मैदान में उतरे हैं और आवश्यकता पड़ी तो सौ वर्षों तक चलने वाले संघर्ष के लिए भी तैयार हैं।
नवजात बेटे को लेकर जेल पहुंच गई पत्नी गिरफ्तारी के समय बिहारी लाल की उम्र 36 वर्ष थी। परिवार में माता पिता, भाई, गर्भवती पत्नी और दो बेटियां थीं। जेल में रहते हुए ही 5 मई को उनके बेटे का जन्म हुआ।पत्नी शक्ति देवी, जिन्हें पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता है, बेटे के जन्म के बाद इतनी भावुक हो गईं कि नवजात बच्चे को गोद में लेकर जेल पहुंच गईं। वहीं पहली बार बिहारी लाल ने अपने बेटे का चेहरा देखा। इस भावनात्मक मुलाकात के बाद पत्नी की तबीयत भी खराब हो गई थी।
गांव की बैठक के बाद गिरफ्तारी आपातकाल के विरोध में बिहारी लाल लगातार गांव गांव जाकर लोगों को संगठित कर रहे थे। 25 दिसंबर 1975 को भोपाल के एक गांव में कार्यकर्ता टीकाराम सेन के घर बैठक हो रही थी। गांव के चौकीदार ने इसकी सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर उन्हें गिरफ्तार किया और पहले थाने, फिर जेल भेज दिया।जेल में शुरू में उन्हें मानसिक रूप से विक्षिप्त बंदियों के साथ रखा गया, बाद में राजनीतिक बंदियों की बैरक में स्थानांतरित कर दिया गया। बिहारी लाल बताते हैं कि गिरफ्तारी के बाद उन पर एक बार डीआईआर और दो बार मीसा की धाराएं लगाई गईं। इसी कारण आपातकाल समाप्त होने के बाद भी वे तीन महीने जेल में रहे।
तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के आदेश के बाद उनकी रिहाई हुई। वे याद करते हैं कि जेल में समाजवादी नेता मधु लिमिये के साथ समय बिताने का अवसर मिला। बातचीत के दौरान लिमिये ने कहा था कि अब हर आदमी को सही गलत समझ आ गया है।
संघ और समाज के लिए सक्रियता- आपातकाल के समय बिहारी लाल नगर एवं ग्राम निवेश विभाग में सहायक संचालक पद पर कार्यरत थे। इसके साथ ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला कार्यवाह भी थे।
जेल से छूटने के बाद उन्होंने सह विभाग कार्यवाह, शारीरिक प्रमुख और बौद्धिक प्रमुख जैसे संगठनात्मक दायित्व निभाए। 1985 में उन्होंने शासकीय सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वयं को सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। वे लंबे समय तक सिख संगत के राष्ट्रीय महासचिव रहे और हिमालय परिवार के मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ संयोजक के रूप में भी सक्रिय रहे।
आज भी समाजसेवा में सक्रिय 86 वर्ष की आयु में भी बिहारी लाल समाजसेवा में लगे हुए हैं। उनका मानना है कि किसानों और जनजातीय समाज को उनके कृषि उत्पादों का उचित मूल्य मिलना चाहिए। वे स्थानीय स्तर पर कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग और पैकिंग इकाइयां स्थापित करने की वकालत करते हैं ताकि किसानों को लाभ और ग्रामीणों को रोजगार मिल सके। जनजातीय समाज के लगभग 200 लोगों को प्रशिक्षण के लिए वे अपने खर्च पर गुजरात भी ले जा चुके हैं। बिहारी लाल आज भी मानते हैं कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देना है।
आपातकाल का दौर केवल राजनीतिक नेताओं के लिए ही नहीं, बल्कि उन साधारण लोगों के लिए भी परीक्षा की घड़ी था जिन्होंने अपने परिवार, करियर और सुरक्षा को दांव पर लगाकर लोकतंत्र की रक्षा का रास्ता चुना। भोपाल के 86 वर्षीय लोकतंत्र सेनानी बिहारी लाल ऐसे ही लोगों में हैं, जिन्होंने शासकीय सेवा में रहते हुए भी सत्ता के दबाव से समझौता नहीं किया और लोकतंत्र की लड़ाई में जेल जाना स्वीकार किया