1975 के आपातकाल में मीसा के तहत गिरफ्तारी, आर्थिक संकट और संघर्ष की यह सच्ची कहानी भोपाल के पालीवाल परिवार की आपबीती बयान करती है।
विनोद दुबे
भोपाल। 1975 में आपातकाल लागू होते ही सरकार की नीतियों का विरोध करना और राष्ट्रवाद की बात करना अपराध माना जाने लगा। नरेन्द्र पालीवाल और उनके पिता को मीसा के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। पति बीएचईएल में कार्यरत थे और ससुर जनसंघ के कोषाध्यक्ष रह चुके थे। भारतीय मजदूर संघ से भी उनका जुड़ाव था।
श्रीमती सुशीला पालीवाल बताती हैं कि गिरफ्तारी के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। दो ननद, बुजुर्ग सास और तीन छोटे बच्चों की देखभाल के साथ आर्थिक संकट भी सामने था। कई बार बच्चों के भोजन की व्यवस्था करना तक कठिन हो गया। दोनों बेटों राजेन्द्र और दीपक की पढ़ाई प्रभावित हुई।
घर के बाहर सीआईडी की निगरानी रहने लगी। पड़ोसी कांग्रेसी के घर से लगातार नजर रखी जाती थी। ऐसा लगता था मानो हम अपराधी हों। एक बार सास को हृदयाघात आया। कांग्रेसियों ने बीएचईएल के चिकित्सकों को चेतावनी दी कि मीसाबंदी परिवारों का इलाज न करें, लेकिन डॉक्टरों ने मानवता निभाई और उनका उपचार किया।
एक दिन उन्होंने अपनी परेशानी कलेक्टर के सामने रखी। कलेक्टर ने लिखित माफीनामा देकर रिहाई का संकेत दिया। जब जेल में मिलाई के दौरान यह बात पति को बताई तो उनका उत्तर स्पष्ट था गोलियों से भून देंगे तब भी माफी नहीं मांगेंगे। संघर्ष के बीच भी सेवा भाव बना रहा। एक बार पैरोल पर बाहर आए तो सबसे पहले मीसाबंदी परिवारों की सहायता में जुट गए। इसी दौरान सड़क दुर्घटना में घायल हुए, फिर भी पैरोल समाप्त होते ही पुनः जेल चले गए। श्रीमती पालीवाल एक भावुक प्रसंग सुनाते हुए रुक जाती हैं। जेल में बच्चों को मिलने की अनुमति नहीं थी। वे ढाई साल की बेटी को लेकर गई। बेटी पिता से मिलने की जिद करने लगी। जेलर के मना करने पर भी वह दौड़कर पिता से लिपट गई। उस क्षण ने जेल के कठोर वातावरण को भी पिघला दिया।
नरेन्द्र पालीवाल हमेशा कहा करते थे कि देश के लिए जीना है तो समर्पण के साथ जियो। जीवन भर उसी विचार पर चले। अचानक हृदयाघात से निधन के बाद भी उन्होंने अपने विचारों को कर्म में बदला। उन्होंने दाह संस्कार के बजाय देहदान का निर्णय लिया था। उनके निधन के बाद उनकी देह एम्स को समर्पित कर दी गई।
श्रीमती पालीवाल कहती हैं कि वे उन्नीस महीने जीवन की सबसे कठिन घड़ी थे, पर उन्हीं दिनों ने उन्हें मजबूत भी बनाया। पति और ससुर ने जेल में रहकर जो संकल्प निभाया, उसने पूरे परिवार को संघर्ष और स्वाभिमान की सीख दी।
आपातकाल का वह अध्याय उनके लिए केवल पीड़ा की स्मृति नहीं, बल्कि आत्मबल और अडिगता का प्रतीक भी है। जब परिवार का सहारा जेल में था, तब एक स्त्री ने घर को संभाला, बच्चों को सम्भाला और विश्वास को टूटने नहीं दिया। यही उस दौर की सच्ची गाथा है।