1975 के आपातकाल में भोपाल के छात्र अरुण पालनीकर ने इंजीनियरिंग छोड़ लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी। जानिए जेल और संघर्ष की उनकी कहानी।
विनोद दुबे
भोपाल। 25 जून 1975 की आधी रात को जब देश पर आपातकाल थोप दिया गया, तब 26 वर्षीय अरुण पालनीकर विदिशा में रहकर इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय प्रचारक थे और विभिन्न स्थानों पर शाखाएं लगाकर संगठन विस्तार का कार्य करते थे। यही सक्रियता उन्हें पुलिस की नजर में ले आई।
आपातकाल लागू होते ही उनकी तलाश शुरू हो गई। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने लगभग पांच महीने अज्ञातवास में बिताए। इस दौरान वे लगातार पोस्टर चिपकाने, पर्चे बांटने और मीसाबंदी परिवारों की सहायता जैसे कार्य करते रहे। पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी के लिए एक खास योजना बनाई और इंजीनियरिंग परीक्षा के दौरान उन्हें पकड़ने की तैयारी की। यह खबर मिलते ही उन्हें अपनी पढ़ाई और परीक्षा छोड़नी पड़ी।
भेष बदलकर वे लटेरी, अशोक नगर और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय रहे। इसी बीच संघ की ओर से सत्याग्रह का आह्वान हुआ। उन्होंने भोपाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी के कार्यक्रम में काले झंडे दिखाकर और पर्चे बांटकर गिरफ्तारी देने का उस दौर में पर्चे छपवाना आसान नहीं था। आधुनिक मशीनें उपलब्ध नहीं थीं और प्रिंटिंग प्रेस पर छपवाना जोखिम भरा था। इसलिए वे खुद ही हाथ से नारे लिखते, कपड़े पर स्याही लगाकर और ट्रेसिंग पेपर की मदद से पर्चे तैयार करते। रात डेढ़ बजे से लेकर तड़के चार बजे तक वे शहर की दीवारों पर इन्हें चिपकाते।
दिसंबर 1975 में भारत टॉकीज पुल के उद्घाटन के दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ योजना को अंजाम दिया। कड़ी सुरक्षा के बीच वे एक समूह के पीछे छुपकर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे। जैसे ही मुख्यमंत्री का भाषण शुरू होने वाला था, अचानक बिजली चली गई। इसी मौके का फायदा उठाकर उन्होंने नारे लगाए और पर्चे उछाल दिए।
पुलिस ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया और कार्यक्रम स्थल से थाने तक पीटते हुए ले गई। चार दिन तक थाने में पूछताछ के बाद मीसा के तहत उन्हें जेल भेज दिया गया। वे 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त होने के बाद ही रिहा हो सके। भोपाल केंद्रीय जेल में उनके साथ कुशाभाऊ ठाकरे और कैलाश नारायण सारंग जैसे कई वरिष्ठ नेता भी बंद थे। जेल के भीतर भी जीवन अनुशासित और सक्रिय बना रहा। सुबह चार बजे से रात दस बजे तक का नियमित कार्यक्रम चलता था। स्वयंसेवकों ने जेल में शाखा लगाना शुरू किया, साथ ही भजन, प्रवचन और खेलकूद जैसे कार्यक्रम भी होते थे।
अरुण पालनीकर बताते हैं कि जेल में सांप्रदायिक सौहार्द का अनोखा दृश्य देखने को मिला। एक और संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रवचन करते थे, तो दूसरी ओर जमाते इस्लामी के नेता कुरान का अर्थ समझाते थे। सभी लोग साथ बैठकर एक दूसरे को सुनते थे।
जेल से रिहा होने के बाद जब वे विदिशा पहुंचे, तो उनका भव्य स्वागत हुआ। स्टेशन पर हजारों लोगों की भीड़ उन्हें देखने उमड़ पड़ी। लोगों ने फूल मालाओं से लादकर उन्हें कंधों पर उठाया और पूरे शहर में जुलूस निकाला।जेल के दौरान उन्होंने संघ के प्रचारक के रूप में जीवन समर्पित करने का संकल्प लिया था, लेकिन परिवार के आग्रह पर विवाह किया। इसके बाद भी उन्होंने लंबे समय तक संगठन के लिए कार्य किया। विदिशा और सागर में प्रचारक के रूप में दायित्व निभाए और बाद में विभिन्न सामाजिक संगठनों में सक्रिय रहे।
उनकी यह यात्रा केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की कहानी है, जिसने अपने सपनों से बड़ा लक्ष्य चुना। यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि त्याग, साहस और प्रतिबद्धता से होती है।
आपातकाल ने केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ही नहीं, बल्कि सपनों से भरे युवाओं के जीवन को भी झकझोर दिया। भोपाल के अरुण पालनीकर की यह कहानी एक ऐसे छात्र की है, जिसने इंजीनियर बनने का सपना छोड़कर लोकतंत्र की लड़ाई को चुना और उसके लिए जेल की यातनाएं भी सहीं।