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Ekatma Dham Omkareshwar: Advaita Vedanta Hub

ओंकारेश्वर में एकात्म धाम: अद्वैत वेदांत की सबसे बड़ी साधनास्थली

धर्मेन्द्र सिंह लोधी


ओंकारेश्वर में एकात्म धाम अद्वैत वेदांत की सबसे बड़ी साधनास्थली

आज से लगभग 1200–1500 वर्ष पहले भारत की स्थिति को याद कीजिए। समाज अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था, दर्शन के नाम पर भ्रम था और देश सांस्कृतिक रूप से खंडित हो रहा था। ऐसे समय में दक्षिण के केरल राज्य के कालड़ी नामक स्थान पर शिव के अंश के रूप में बालक शंकर का प्राकट्य हुआ। उस बालक ने बुझते हुए सनातन धर्म के दीपक में अपने ज्ञान का घी डालकर उसे पुनः प्रज्वलित किया। वह कोई साधारण बालक नहीं थे। 8 वर्ष की आयु में चारों वेदों का ज्ञान, 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, और 16 वर्ष की आयु में ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ की रचना—यह उनके अद्भुत व्यक्तित्व का प्रमाण है।

जब बालक शंकर संन्यास लेकर गुरु की खोज में निकले, तो उनके कदम मध्य प्रदेश की पावन धरा ओंकारेश्वर की ओर बढ़े। नर्मदा के तट पर गुरु गोविंद भगवत्पाद ने जब उनसे पूछा “तुम कौन हो?” तब शंकर ने जो उत्तर दिया, वही अद्वैत का सार है। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैं एक बालक हूँ या संन्यासी हूँ, बल्कि उन्होंने कहा
“न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेद… चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।”
अर्थात मैं आनंदस्वरूप शिव हूँ।

ओंकारेश्वर की गुफाओं में अद्वैत वेदांत का वह बीज बोया गया, जिसने आगे चलकर पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया। आज ओंकारेश्वर में बन रहा ‘एकात्म धाम’ इसी ऐतिहासिक घटना का जीवंत स्मारक है। आचार्य शंकर केवल एक दार्शनिक ही नहीं थे, वे भारत के प्रथम सांस्कृतिक राष्ट्रनिर्माता थे। उन्होंने शस्त्र नहीं, बल्कि शास्त्र उठाए। उन्होंने पैदल पूरे भारत की यात्रा की और शास्त्रार्थ के माध्यम से मतभेदों को समाप्त किया।

उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में उत्तर में बद्रिकाश्रम, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारका मठ स्थापित किए। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल भौगोलिक रूप से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी एक अखंड इकाई है। उन्होंने अद्वैत का संदेश दिया और सिखाया कि ‘जीव’ और ‘ब्रह्म’ अलग नहीं हैं। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” अर्थात सब कुछ ईश्वर ही है। जब सब ईश्वर है, तो समाज में छुआछूत, भेदभाव और घृणा का कोई स्थान नहीं रहता।

‘एकात्म धाम’ जब पूर्ण रूप से क्रियाशील हो जाएगा, तब यह केवल एक दर्शनीय स्थल नहीं रहेगा, बल्कि एक ‘जीवंत विश्वविद्यालय’ और ‘सांस्कृतिक केंद्र’ के रूप में विकसित होगा। आने वाले समय में यहाँ आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान दुनिया भर के विचारकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा। यहाँ अद्वैत वेदांत पर आधारित अल्पकालिक और दीर्घकालिक पाठ्यक्रम प्रारंभ होंगे। वर्ष भर देश-विदेश के शीर्ष दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के बीच संवाद होंगे, जहाँ ‘चेतना’ और आधुनिक विज्ञान के संबंधों पर शोध किया जाएगा।

यहाँ एक डिजिटल और भौतिक पुस्तकालय होगा, जिसमें हजारों दुर्लभ पांडुलिपियाँ और वेदांत ग्रंथ उपलब्ध होंगे। आने वाले समय में यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करेंगे, बल्कि ‘अद्वैत’ को साक्षात अनुभव करेंगे।

एकात्म धाम पूर्ण होने पर यहाँ के प्रमुख आकर्षण इस प्रकार होंगे
आभासी यात्रा ‘अद्वैत लोक’ संग्रहालय: 3D होलोग्राम और वीआर तकनीक के माध्यम से श्रद्धालु आदि गुरु शंकराचार्य के साथ उनकी भारत यात्रा का अनुभव करेंगे।
लेजर और साउंड शो: प्रतिदिन संध्या काल में माँ नर्मदा की महिमा और अद्वैत दर्शन पर आधारित भव्य लेजर शो आयोजित किया जाएगा, जो मान्धाता पर्वत की पहाड़ियों को अपनी रोशनी से आलोकित करेगा।
नौका विहार: नर्मदा के जल में नौका विहार करते हुए श्रद्धालुओं को ऑडियो गाइड के माध्यम से इस क्षेत्र के आध्यात्मिक महत्व की जानकारी दी जाएगी।

ध्यान और साधना केंद्र: यहाँ विशेष ध्यान कक्ष होंगे, जहाँ मौन साधना की व्यवस्था होगी। लोग अपनी व्यस्त जीवनशैली से विराम लेकर यहाँ साधना कर सकेंगे। प्रतिदिन प्रातःकाल सामूहिक योग शिविर आयोजित किए जाएंगे, जो शारीरिक और मानसिक शांति पर केंद्रित होंगे।

सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियाँ: यहाँ भव्य अद्वैत कलाग्राम स्थापित किया जाएगा, जहाँ स्थानीय और राष्ट्रीय कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। पारंपरिक चित्रकला, मूर्तिकला और संगीत की कार्यशालाएँ आयोजित होंगी। प्रतिवर्ष ‘एकात्म यात्रा’ का आयोजन होगा, जो समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का कार्य करेगा। यहाँ एक आधुनिक गुरुकुल की झलक भी मिलेगी, जहाँ विद्यार्थियों को वेदों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा प्रदान की जाएगी।

स्थानीय आर्थिक विकास: एकात्म धाम के पूर्ण होने पर जब यहाँ देश-विदेश से पर्यटक आएंगे, तो होटल, होमस्टे, गाइड और हस्तशिल्प के माध्यम से हजारों स्थानीय युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होगा। स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार ‘नर्मदा प्रसाद’ और स्मृति-चिह्नों का एक बड़ा बाजार विकसित होगा।

आने वाले समय में एकात्म धाम का स्वरूप ऐसा होगा कि यहाँ से कोई भी व्यक्ति केवल फोटो लेकर नहीं जाएगा, बल्कि अपने भीतर एक ‘रूपांतरण’ लेकर जाएगा। यह स्थान भारत के उस गौरव को पुनः स्थापित करेगा, जिसमें कहा गया है—“वसुधैव कुटुम्बकम्।” यह धाम दुनिया को सिखाएगा कि संघर्ष का समाधान युद्ध नहीं, बल्कि ‘एकात्मता’ का बोध है।

आज के इस उथल-पुथल भरे विश्व में हमारा देश, यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में, संपूर्ण विश्व को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उन्नति का मार्ग दिखा रहा है। प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी राज्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को उच्चतम शिखर पर ले जाने के लिए कार्य कर रहे हैं। भव्य ‘एकात्म धाम’ उसी पावन चिंतन का परिणाम है।

आचार्य शंकर मात्र 32 वर्ष तक जीवित रहे, लेकिन अपनी अल्पायु में उन्होंने वह कार्य किया, जो हजारों वर्षों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा। उनके प्रकटोत्सव पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम जाति-पाति के भेदों को भुलाकर ‘एकात्म’ समाज का निर्माण करेंगे और आदिगुरु के आदर्शों के अनुरूप संपूर्ण भारतवर्ष को एकसूत्र में पिरोने का कार्य करेंगे।

‘विवेक चूडामणि’ में वे कहते हैं कि मनुष्य जन्म दुर्लभ है, और उससे भी दुर्लभ है मोक्ष की इच्छा तथा महापुरुषों का सान्निध्य। हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि हमें आदिगुरु शंकराचार्य की परंपरा का सान्निध्य प्राप्त है, जो हजारों वर्षों से निरंतर प्रवाहित हो रही है।

(लेखक मध्यप्रदेश शासन में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं)

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