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Development’s Axe and the Silent Death of Old Tree

‘विकास’ की आरी से कटे बारी-बारी

विकास की दौड़ में कटते सदियों पुराने पेड़, गांव की स्मृतियां और संवेदनाओं का सवाल। रीवा से गुजरते हाईवे की मार पर भावुक स्तंभ


‘विकास’ की आरी से कटे बारी-बारी

जयराम शुक्ल

हमारे गांव के सीवान में महुआ के दो बड़े दरख्त हुआ करते थे, उम्र कोई दो सौ वर्ष। उन्हीं के बगल से गांव जाने का रास्ता गुजरता था। पहले ढर्रा था, फिर मुरम वाली सड़क, फिर पक्की डामर रोड होती गई और तरक्की ऐसी हुई कि अब शानदार टू-लेन कंक्रीट रोड है, जो मेरे गांव से गुजरते हुए आगे जाकर प्रयागराज और बनारस जाने वाली नेशनल हाईवे में मिल जाती है। पर इस तरक्की में दो सौ सालों से आंधी, तूफान, अकाल-सुकाल झेलते तने रहने वाले ये पुरखे वृक्ष शहीद कर दिए गए।हम लोग जब जबलपुर से रीवा अपने गांव जाया करते थे, तो अम्मा की सख्त हिदायत रहती थी कि वहां पहुंचते ही रुककर उन दोनों महुआ के पेड़ों को प्रणाम कर लिया करें। उनमें ग्राम देवता निवास करते हैं, जो हमारे गांव की रक्षा करते हैं। शादी-ब्याह या संतान होने के बाद गांव में प्रवेश से पहले इनकी पूजा होती थी। कम से कम नारियल और अगरबत्ती तो चढ़ती ही थी।

मैं बचपन से ही इन पेड़ों को बुजुर्ग भाव से देखता था। सचमुच हमेशा यह एहसास रहता था कि इनकी कृपा हम पर है। इन पेड़ों का भी बुजुर्गों की भांति हमसे आत्मिक लगाव सा था। इनके हरे-भरे, फड़फड़ाते पत्ते गांव का कुशल-मंगल, प्रवेश करते ही बता देते थे। वैसे भी ये गांव आने वालों के स्वागत के लिए सजे बंदनवार और बाहरी लोगों के लिए साइनबोर्ड की तरह थे।सरकार की अधोसंरचना विकास के आड़े आ गए और बिना गवाह, बिना सुनवाई के कत्ल कर दिए गए। यही हश्र गांव में घुसते ही तालाब के किनारे खड़े उस पीपल का भी हुआ। अम्मा के अनुसार, उसमें दानव मामा रहा करते थे, जो छोटी-बड़ी निशाचर शक्तियों के प्रशासक माने जाते थे।

हम लोग बचपन में जब गांव में रहते थे, तो दिन में एक बार पीपल के दानव मामा को प्रणाम कर लेते थे और रात भर के लिए निश्चिंत हो जाते थे कि भूत-प्रेत अब हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। कोई दो-ढाई सौ साल का इतिहास अपने में जज्ब किए उस पीपल को भी वहीं आरे से काटकर मृत्युदंड दे दिया गया। हाथ-पांव आरियों से काटकर अलग कर दिए गए।जब गांव जाता हूं, तो कुल्हाड़ी की खटाक और आरा मशीन की खरखराहट अवचेतन मन में गूंजती है। यह सवाल भी गूंजता है कि अम्मा के वे ग्राम देवता और दानव मामा कहां गए होंगे?हमारे देश में विकास ऐसा ही रोबोटिक है। न कोई संवेदना, न किसी रिश्ते की परवाह, न दर्द, न करुणा। विकास के आड़े जो भी आएगा, मारा जाएगा। जीडीपी और ग्रोथ रेट बढ़ाने के लिए यही शर्त है। इसी शर्त के चलते हरे-भरे पुराने दरख्तों का ग्रोथ रेट में तब तक कोई योगदान नहीं, जब तक उन्हें काटकर आरा मिल न भेज दिया जाए।

हरहराती नदियों को बांधना और गांव के गांव डुबो देना ग्रोथ रेट के लिए अनिवार्य है। सीधी खड़ी पहाड़ियों को जब तक सड़कों में न पसरा दिया जाए, तब तक वे निरर्थक हैं। विकास का यह नए जमाने का फलसफा है। यही समूचे देश में चौतरफा चल रहा है।अम्मा के वे महुआ देव, जिनमें ग्राम्य देवता निवास करते थे, और वे दानव मामा वाला पीपल दोनों ही मरकर ग्रोथ रेट के आंकड़े बनकर अमर हो गए होंगे।बड़ी जीडीपी और भारी ग्रोथ रेट वाले यूरोपीय देशों में सुना है कि यदि कोई पेड़ सड़क के आड़े आ जाए, तो इंजीनियर सड़क का नक्शा बदल देते हैं। क्योंकि वे खुद भी संवेदनशील होते हैं और लोकभय भी रहता है। ऐसे मामलों में जनता सड़क पर आ जाती है। यदि किसी पेड़ या प्राकृतिक संरचना को हटाना अनिवार्य ही हो, तो काटने की बजाय उनकी लिफ्टिंग की जाती है। पुराने दरख्तों और यहां तक कि पहाड़ियों तक के लिफ्टिंग एंड प्लांट के उदाहरण मिलते हैं।

हमारे यहां तो सड़क की योजना बाद में बनती है, कुल्हाड़ी पहले चलनी शुरू हो जाती है। कसाई की तरह ताके बैठे रहते हैं टाल, पल्प, पेपर और प्लाई इंडस्ट्री वाले।हमारे रीवा जिले से पांच नेशनल हाईवे गुजरते हैं। छठे का भी नोटिफिकेशन हो गया है। सभी का विस्तारीकरण हो रहा है। चारों तरफ दरख्तों का कत्लेआम हो रहा है। दो सौ-तीन सौ साल पुराने आम, इमली, जामुन, पीपल और नीम के पेड़ लाखों की संख्या में काट डाले गए। जो बचे हैं, वे भी काट दिए जाएंगे। इन बेजुबानों की कौन सुने? ये वोट नहीं हैं।किसी लेख में मैंने मत्स्य पुराण की बात लिखी थी दस तालाब बराबर एक पुत्र, दस पुत्र बराबर एक वृक्ष। गिनिए, इस ग्रोथ रेट की होड़ में कितने पुत्रों की हत्याएं हो गईं।

कंठी माला लेकर धर्म जपने और संस्कृति बचाने वाले कहां गए? रीवा से देश का सबसे पुराना राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है। कहते हैं, इसे शेरशाह सूरी ने उत्तर-दक्षिण को जोड़ने के लिए बनवाया था। पहले इसे ग्रांड ट्रंक रोड कहा जाता था। आजादी के बाद इसे एनएच का नंबर दिया गया, अब कोई नया नंबर अलॉट हुआ है। यह एनएच कश्मीर को कन्याकुमारी से जोड़ता है।अंग्रेजों के जमाने में तैयार किए गए रीवा स्टेट गजेटियर में एक ब्रिटिश ट्रैवलर लेकी की डायरी का जिक्र है। राजा अजीत सिंह के समय लेकी ने इस राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे घने फलदार वृक्षों और निश्चित दूरी पर बने कुओं व बावड़ियों का खूबसूरत वर्णन किया है। बनारस और इलाहाबाद से आने वाले साहित्यकारों ने सड़क किनारे के आम्रकुंजों का अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है।

विद्यानिवास मिश्र, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती और न जाने कितने साहित्यकारों के निबंधों और कथानकों में इनका वर्णन मिलता है। ये सब के सब काट डाले गए। डेढ़ सौ-दो सौ साल पुराने वृक्ष लाखों की संख्या में। इन्हें बचाया जा सकता था, पर वही इसके बारे में सोचता, जिसकी आंखों का पानी बचा हो। विकास की हवस ने आंखों का पानी सोख लिया है और संवेदनाओं को मरुभूमि में बदल दिया है। कौन याचना सुने, कौन इंसाफ करे? ये हमारे पुरखे, कत्ल होने तक मौन रहे।अपने हिस्से आया शोकगीत मैं लिख देता हूं, जब बेचैनी रहने नहीं देती, क्रोध नपुंसक हो जाता है और करुणा बर्फ बनकर आंख के दहाने में जम जाती है।