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Delhi Tarun Kumar Murder During Ramzan Shocks Nati

रमजान में हिंसा: इस्लाम की तालीमात व जिम्मेदारी

दिल्ली में रमजान के महीने में तरुण कुमार की हत्या ने समाज को झकझोर दिया। इंसानियत और धर्म की असली शिक्षा के खिलाफ यह कांड।


रमजान में हिंसा इस्लाम की तालीमात व जिम्मेदारी

हाजी शीराज कुरैशी

यह लेख बहुत दुख और शर्म के साथ लिख रहा हूं और खुद को कट्टरपंथियों के निशाने पर ला रहा हूं, पर डरूंगा नहीं, सही बोलूंगा और सत्य लिखूंगा।

रमजान का महीना इस्लाम में रहमत, बरकत, इबादत और इंसानियत का महीना माना जाता है। यह वह पाक वक्त होता है जब मुसलमान अपने रूहानी इबादत में ज्यादा से ज्यादा मशगूल रहते हैं, रोजा रखकर अपने नफ्स पर काबू पाना सीखते हैं और समाज में अमन, मोहब्बत और इंसाफ का पैगाम देते हैं। कुरान और हदीस की तालीमात बार-बार इस बात पर जोर देती हैं कि इंसानियत की हिफाजत सबसे बड़ा फर्ज है। किसी बेगुनाह इंसान की जान लेना इस्लाम की रूह के बिल्कुल खिलाफ है। इसी संदर्भ में दिल्ली के उत्तमनगर इलाके में तरुण कुमार नामक युवक की हत्या बेहद दुखद और चिंताजनक है। यह घटना न केवल इंसानियत के खिलाफ है, बल्कि इस्लाम की बुनियादी तालीमात का भी सरासर उल्लंघन है। रमजान जैसे पाक महीने में इस प्रकार की हिंसा और कत्ल का होना समाज के लिए गहरी चिंता का विषय है। एक मुसलमान होने के नाते और एक अधिवक्ता के रूप में मेरा यह फर्ज बनता है कि मैं इस घटना की स्पष्ट और खुलकर निंदा करूं।

इस्लाम की बुनियाद कुरान और हदीस पर है। कुरान शरीफ में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि "जिसने किसी एक बेगुनाह इंसान की हत्या की, उसने मानो पूरी इंसानियत की हत्या की।" यह आयत इस्लाम के उसूलों की बुनियादी समझ देती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इंसान की जान की हिफाजत इस्लाम में सबसे बड़ा कर्तव्य है। किसी भी हालत में निर्दोष व्यक्ति की हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता। हदीस शरीफ में भी पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया कि एक सच्चा मुसलमान वह है जिसके हाथ और जबान से दूसरे लोग महफूज रहें। इसका मतलब साफ है कि मुसलमान का आचरण ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में अमन कायम रहे। अगर किसी मुसलमान के हाथ से किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या हो जाती है तो वह इस्लाम की असली तालीमात के खिलाफ काम कर रहा है।

रमजान के महीने की खास अहमियत इसलिए भी है क्योंकि यह महीना आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का प्रतीक है। रोजा रखने का असली मकसद यही है कि इंसान अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करे और अच्छाइयों को बढ़ाए। गुस्सा, नफरत और हिंसा से दूर रहना ही रोजे की असली रूह है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया कि अगर कोई रोजेदार गाली-गलौज करे या लड़ाई-झगड़ा करे तो उसका रोजा अधूरा हो जाता है। ऐसे में रमजान के दौरान किसी की हत्या होना केवल एक आपराधिक घटना ही नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत गंभीर मामला है। यह घटना इस्लाम की उस शिक्षा के विपरीत है जो शांति, सहिष्णुता और मानवता पर आधारित है।

भारत एक बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश है, जहां सदियों से अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं। हमारे देश की यही खूबसूरती है कि यहां विविधता में एकता दिखाई देती है। लेकिन जब भी किसी समुदाय के नाम पर हिंसा होती है, तो वह केवल उस समुदाय को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को नुकसान पहुंचाती है। दिल्ली के उत्तमनगर में हुई यह हत्या केवल एक व्यक्ति की जान जाने की घटना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द के लिए भी एक चुनौती है। अगर समाज में ऐसे अपराध होते रहेंगे और हम चुप रहेंगे तो इससे नफरत और अविश्वास का माहौल पैदा होगा।

दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे देश के कुछ तथाकथित मुस्लिम नेता इस तरह की घटनाओं पर खामोशी अख्तियार कर लेते हैं। जब भी किसी घटना में मुसलमान आरोपी होते हैं, तो कई नेता या तो चुप रहते हैं या सफाई देने लगते हैं। यह रवैया सही नहीं है। अगर हम सच में इंसाफ और अमन के पक्षधर हैं, तो हमें हर प्रकार की हिंसा का विरोध करना चाहिए, चाहे अपराधी कोई भी हो। खामोशी कई बार गलत संदेश देती है। समाज यह समझने लगता है कि शायद समुदाय के लोग अपराधियों का समर्थन कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि अधिकांश मुसलमान शांति और कानून के पालन में विश्वास रखते हैं। इसलिए जरूरी है कि समाज के जिम्मेदार लोग और धार्मिक नेता खुलकर ऐसी घटनाओं की निंदा करें।

इस्लाम हमें न्याय और सत्य का साथ देने की शिक्षा देता है। कुरान में यह भी कहा गया है कि "न्याय पर डटे रहो, चाहे वह तुम्हारे अपने खिलाफ ही क्यों न हो।" इसका मतलब यह है कि मुसलमान को हमेशा सच्चाई और इंसाफ का साथ देना चाहिए। अगर कोई मुसलमान अपराध करता है, तो उसे बचाने की कोशिश करना इस्लाम की शिक्षा के खिलाफ है। बल्कि सही रास्ता यह है कि कानून अपना काम करे और दोषी को सजा मिले। एक अधिवक्ता होने के नाते मैं यह भी मानता हूं कि कानून के सामने सभी बराबर हैं। भारत का संविधान हर नागरिक को न्याय और सुरक्षा का अधिकार देता है। किसी भी व्यक्ति की हत्या एक गंभीर अपराध है और इसके दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

इस मामले में भी यही उम्मीद की जानी चाहिए कि पुलिस निष्पक्ष जांच करे और दोषियों को कानून के अनुसार सजा दिलाए। न्याय केवल पीड़ित परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए जरूरी है। आज जरूरत इस बात की है कि मुसलमान समाज अपने अंदर आत्ममंथन करे। हमें यह सोचना होगा कि क्या हम इस्लाम की असली तालीमात को सही तरीके से समझ और लागू कर रहे हैं। अगर कहीं कमी है, तो उसे सुधारना हमारी जिम्मेदारी है। मस्जिदों के इमाम, मदरसों के उलेमा और समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को चाहिए कि वे लोगों को इस्लाम की असली शिक्षाओं के बारे में जागरूक करें। युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि गुस्सा और हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है।

साथ ही मीडिया और समाज को भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। किसी अपराध को पूरे समुदाय से जोड़कर देखना उचित नहीं है। अपराधी की पहचान उसके अपराध से होती है, उसके धर्म से नहीं। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि समुदाय के अंदर से भी गलत कामों के खिलाफ आवाज उठे। अगर हम खुद गलतियों की आलोचना करेंगे, तो समाज में भरोसा बढ़ेगा और साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत होगा। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब हमेशा से अमन और भाईचारे का प्रतीक रही है। इस परंपरा को बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी को मिलकर समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखना होगा।

उत्तमनगर की यह दुखद घटना हमें एक बार फिर यह याद दिलाती है कि हिंसा का कारण सिर्फ कट्टरता होती है। धर्म का उद्देश्य इंसान को बेहतर इंसान बनाना होता है, न कि उसे नफरत और हिंसा की राह पर ले जाना। इस्लाम की असली पहचान दया, करुणा और न्याय है। अगर कोई व्यक्ति इन मूल्यों के खिलाफ जाकर हिंसा करता है, तो वह इस्लाम की शिक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता।एक मुसलमान और एक भारतीय नागरिक होने के नाते मैं यह स्पष्ट कहना चाहता हूं कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या अस्वीकार्य है, चाहे वह तरुण कुमार हों या कोई और। हर इंसान की जान की कीमत बराबर है। मैं इस घटना की कड़ी निंदा करता हूं और उम्मीद करता हूं कि दोषियों को जल्द से जल्द कानून के अनुसार सजा मिलेगी। साथ ही मैं देश के मुस्लिम नेताओं, उलेमा और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी अपील करता हूं कि वे ऐसी घटनाओं पर खुलकर बोलें। खामोशी समस्या का समाधान नहीं है। सच बोलना और न्याय का साथ देना ही इस्लाम की असली शिक्षा है।

रमजान का महीना हमें यही सिखाता है कि हम अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करें और समाज में अच्छाई फैलाएं। अगर हम इस महीने की रूह को समझ लें, तो दुनिया में अमन और इंसाफ का माहौल कायम हो सकता है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। अगर हम इंसानियत की रक्षा करेंगे, तो हर धर्म का सम्मान अपने आप सुरक्षित रहेगा। अल्लाह से दुआ है कि वह हमें सही रास्ते पर चलने की तौफीक दे और हमारे देश में हमेशा अमन और भाईचारा कायम रहे।

जय हिन्द। वन्दे मातरम्।

 

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