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Cultural Unity vs Political Strategy in India

सांस्कृतिक एकात्मता बनाम राजनीतिक प्रबंधन

सांस्कृतिक एकात्मता और चुनावी राजनीति के बीच बढ़ते टकराव पर विचार। जाति, समरसता और सत्ता की राजनीति भारतीय समाज को किस दिशा में ले जा रही है।


सांस्कृतिक एकात्मता बनाम राजनीतिक प्रबंधन

प्रो. आनन्द पाटिल

गतांक में हमने जाना समझा की मूल चुनौती केवल राजनीतिक रणनीति को नहीं है विशेषतः उस प्रवृत्ति की, जो समाज को एक 'जीवित सांस्कृतिक एकक' के रूप में देखने के बजाय उसे चुनावी गणनाओं के 'मतवता-खण्डों में विभाजित कर देती है। वास्तविक प्रश्न आत्मपरीक्षण और आत्मपरिभाषा का है। यदि 'हिन्दू' को अवधारणा अपनी सांस्कृतिक स्थिरता बनाए रखने के बजाय चुनावी परिस्थितियों के अनुसार बदलती योगी, तो हिन्दू एकता' 'स्थायी सामाजिक चेतना' नहीं रह पाएगी, वह एक उपयोगी राजनीतिक उपकरण में सिमट जाएगी। ऐसा लचीलापन अल्पकाल में लाभपहुंचा सकता है, परन्तु दीर्घकाल में वही वैचारिक विश्वसनीयता को क्षीण करता है। अतः आवश्यक है कि संगठन और उसकी राजनीतिक अभिमानित के बीच सिद्धान्ताधारित और मर्यादित भेद स्पष्ट बना रहे। जाति को सामाजिक यथार्थ के रूप में स्वीकार करना परिपक्व दृष्टि है, किन्तु उसे राज्जनीतिक सथियार बनाना विभाजन को स्थायी रूप देना है।

हम दीर्घकाल से यह जानते स्वीकारते रहे हैं कि संगठन की मूल वैचारिकी सांस्कृतिक राष्ट्रबाद, सामाजिक समन्वय (समरसता) और 'एकात्म मानवतावाद की अवधारणा पर आधारित रही है। संगठन ने अपने आरम्भ से ही 'समाज-आधारित राष्ट्र-निर्माण' को कार्य का केन्द्र माना। भाजपा उस वैचारिक धारा की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में उभरी। इसमें संरचना स्पष्ट थी, राजनीति साधन है, समाज-निर्माण साध्यः सत्ता का मूल्य तभी है, जब यह सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बने, किन्तु 2014 के पश्चात् प्राप्त निरन्तर चुनावी सफलता ने इस समीकरण को क्रमशः परिवर्तित कर दिया। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं था, जानिए कि वह सत्ता की निरन्तरता से उत्पन्न मनोविज्ञान का परिणाम था। जब राजनीतिक सफलता स्थायी प्रतीत होने लगती है, तब सत्ता सन्तुलन स्वयं एक लम्क्ष्य के रूप में उभरने लगता है। वहीं से. प्रश्न उलटता है समाज के माध्यम से सत्ता नहीं, सत्ता के माध्यम माध्यम से समाज का पुनर्सयोजन। यह सूक्ष्म परिवर्तन ही समरसता को 'नैतिक प्रतिज्ञा से राजनीतिक परियोजना में रूपान्तरित करता है.

इस विमर्श के केन्द्र में 'जाति' का प्रश्न स्वाभाविक रूप से उपस्थित होता है। या स्वोंकार करना होगा कि भारतीय समाज में 'जाति' एक 'ऐतिहासिक सांस्कृतिक संरचना' रही है। यह भी कि वह एकरेखीय या स्थिर नहीं थी, उसमें शक्ति-सन्तुलन समय-समय पर बदलते रहे। जो समुदाय आज पिछड़ कहा जाता है, इतिहास में वाह कभी प्रभावशाली रहा है, और जिन पर आज वर्चस्व का आरोप है, वे किसी काल में सीमित संसाधनों पर निर्भर रहे। अतः जाति को स्थायी नैतिक श्रेणियों में चांधना बौद्धिक सरलीकरण है, किन्तु आधुनिक लोकतान्त्रिक राजनीति ने जाति को प्रतिनिधित्व, आरक्षण और जनगणना की भाषा में पुनर्परिभाषित किया। जैसे ही जाति-आधारित गणना और सामाजिक न्याय की नीतियां चुनावी विमर्श का केन्द्रीय उपकरण बनी, जाति सांस्कृतिक संरचना से अधिका राजनीतिक इकाई बन गई। इसका तार्किक परिणाम तीन स्तरों पर प्रकट होता है, पहला, समूह अपनी अस्मिता को राजनीतिक शक्ति में रूपान्तरित करने का प्रयास करता है। दूसरा, अन्य समूहों में प्रतिस्पर्धात्मक असुरक्षा जन्म लेती है, क्योंकि संसाधनों और प्रतिनिधित्व की प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है। तीसरा, व्यापक 'हिन्दू एकता' की अवधारणा पर वैचारिक लचीलेपन का दबाव बढ़ता है, क्योंकि उपसमूहों की आकांक्षाएं पृथक-पृथक राजनीतिक अभिव्यक्तियां खोजने लगती है।

यहीं, समरसता की अवधारणा परीक्षाधीन हो जाती है। यदि समरसता का लक्ष्य सामाजिक सांस्कृतिक एकात्मता' है, तो उसे समूह-आधारित सौदेबाजी की भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता, परन्तु यदि वह चुनावी गणित का उपकरण बन जाए, तो संवाद का स्थान प्रतिनिधित्व के मोल-भाव की प्रक्रिया ले लेती है और समन्वय की जगह प्रबन्धन आ जाता है। वर्तमान परिदृश्य में यही प्रवृत्ति उभार पर दिखलाई पड़ती है। यहां राजनीति और संगठन के स्वभावगत भेद को स्पष्ट समझना आवाश्यक है। राजनीति तात्कालिक है, वह समीकरणों, गठबन्धनों और चुनावी चक्रों से संचालित होती है। इसलिए वह अवसरानुकूल माक्तियों या समूहों को अपने साथ जोड़ने में संकोच नहीं करती। संगठन का स्वभाव भिन्न है, उसका कार्य दीर्घकालिक संस्कार-निर्माण' है। यह व्यक्ति को साधन नहीं, ध्येयं का सहभागी मानता है। जब ये दोनों स्तर मिश्रित हो जाते हैं, तब सन्देश और व्यवहार के मध्य द्वैत उत्पन्न होता है। 'सबका साथ, सबका विकास' जैसे सूत्र व्यापक नैतिक आश्वासन देते हैं, परन्तु यदि समानान्तर जातीय ध्रुवीकरण सक्रिय हो, तो कार्यकर्ता स्वयं इंद्र का अनुभव करता है, वह शाखा में समरसता का पाठ पढ़ाता है और चुनाव में वर्गीकरण की रणनीति का अंग बनता है।

किसी भी आन्दोलन के समक्ष यही निर्णायक क्षण होता है। यदि वैचारिकी और रणनीति के मध्य दूरी बढ़ती है, तो या तो वह आन्दोलन वैचारिक शुद्धताबाद में सिमट जाता है, जिससे उसका विस्तार रुक जाता है, या वह पूर्ण राजनीतिक व्यवहारवाद में कल जाता है, जिससे उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्षीण हो जाती है। तीसरा मार्ग समयानुकूल, किन्तु सिद्धान्त-संगत पुरुर्याख्या ही टिकाऊ है परन्तु वही सबसे कठिन है, क्योंकि उसमें आत्मालोचन और साहस दोनों अपेक्षित हैं। संगठन की मूल संकल्पना सांस्कृतिक एकात्मता की रही है. एक ऐसा 'हिन्दू' जो विविधताओं के भीतर एक साक्षश सभ्यतागत चेतना को स्वीकार करत्ता है, परन्तु जब राजनीतिक व्यवहार उसे दलित, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, सवर्ण या क्षेत्रीय समीकरणों में व्यवस्थित करता है, तब सांस्कृतिक भाषा और राजनीतिक वर्गीकरण में तनाव उत्पन्न होता है। यदि 'हिन्दू' की संज्ञा कभी सांस्कृतिक और कभी चुनावी श्रेणी बन जाए, तो उसकी स्थायित्व-शक्ति स्व्वाभाविक रूप से कम होती है। कार्यकर्ता और समाज दोनों पूछते हैं मूल सत्य क्या है? एकात्मता या समीकरण?

इन प्रश्नों का समाधान घोषणाओं से सम्भव नहीं है। सामाजिक समरसता के लिए ऐतिहासिक असमानताओं की प्रामाणिक स्वीकृति, संस्थागत संवाद की निरन्तर प्रक्रिया और सत्ता से परे सामाजिक निवेश ये तीनों अनिवार्य है। जब तक संगठन शिक्षा, संस्कार और नेतृत्व विकास में दीर्घकालिक निवेश नहीं करेगा, तब तक राजनीतिक रणनीति और सामाजिक उद्देश्य का समन्वय अधूरा रहेगा। इसलिए यह संघर्ष मूलतः आत्म परिभाषा का है। संगठन यदि स्वयं को समाज आन्दोलन मानता है, तो राजनीति उसका साधन छोगी और रणनीति 'सिद्धान्त के अधीन' होगी। यदि वह स्वयं को राजनीतिक शक्ति के रूप में परिभाषित करता है, तो समाज रणनीति का संसाधन बन जाएगा और सिद्धान्त परिस्थिति निर्भर व्याख्या में बलते जाएंगे। संगठन आज इसी निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। चुनावी सफलताएं आत्मसन्तोष भी दे सकती है और आत्मपरीक्षण का अवसर भी। यदि समरसता को रणनीति से ऊपर स्थान दिया गया, ती दीर्घकालिक सामाजिक शक्ति कर निर्माण सम्भव है, यदि रणनीति को समरसता पर वरीयता मिली, तो सफलताएं (जीत) क्षणिक सिद्ध होंगी। अन्ततः प्रश्न जातियों के गठजोड़ का नहीं, समाज को आत्मचेतना का है. क्या समाज स्वयं को एक 'माझा सांस्कृतिक एकक' के रूप में देखता है, या केवल संसाधनों के प्रतिस्पर्धी समूहों के रूप में? इस प्रश्न का उत्तर किसी जनगणना, किसी चुनाव या किसी नारे से नहीं निकलेगा। वह निकलेगा आत्मालोचन, समन्वय और नैतिक साहस से और वही इतिहास की दिशा भी निर्धारित करेगा।




 

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