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संसद में साजिशः सरकार और विपक्ष

संसद में साजिशः सरकार और विपक्ष

प्रो. आनन्द पाटील


संसद में साजिशः सरकार और विपक्ष

वर्तमान परिदृश्य को सदसद्विवेक से देखा जाए, तो इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि क्रमशः तीसरी बार सत्ता-प्राप्ति के बाद भी नदामो वा भाजपा को जिस रूप में सहज स्वीकार्यता प्राप्त है, वह समकालीन राजनीति में विरल ही है। इस स्वीकार्यता को केवल चुनावी आंकड़ों की परिधि में आंकना पूर्णतः बेमानी ही होगा। यह सहज स्वीकार्यता मूलतः लोकभन के विश्वास, आकांक्षाओं और स्थायित्वपूर्ण नेतृत्व की चाह में अन्तर्निहित है। ऐसे में, यह अपेक्षित है कि नदामो सरकार विपक्ष की किसी भी चुनौती से विचलित हुए बिना, लोकतान्त्रिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हो। लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला का यह कथन कि 'माननीय प्रधानमंत्री के साथ कुछ भी हो सकता था, इसलिए उनसे सदन में न आने का आग्रह किया राजनीतिक और नैतिक, दोनों दृष्टियों से उचित नहीं प्रतीत होता।

जिस विशाल जनमानस ने नदामो को प्रधानमंत्री के रूप में अभूतपूर्व जनादेश दिया हो, जहां विश्वास को पूंजी इतनी प्रबल (अटूट) हो, वहां आशंका की राजनीति के बजाय निर्भीक उपस्थिति ही सर्वधा अपेक्षित है। लोकतंत्र में साहस का अर्थ केवल सुरक्षा में रहना न होकर, दूसरी धारा वा विपक्ष की असहमति, विरोध वा उकसावे का निष्कम्प सामना करना भी है। यदि प्रधानमंत्री में आते और विपक्ष अपनी तथाकथित 'कुछ भी करने' की मंशा को साकार करता भी, तो वह दृश्य जनमानस के सामने होता। यह भी सम्भव था कि उसी क्षण 'कांग्रेस मुक्त भारत' की बहुचर्चित घोषणा को नई ऊर्जा मिलती।

देश यह निरन्तर देख रहा है कि विगत कुछ समय में, विपक्ष के नेता के आचरण और वक्तव्यों में वैचारिक असंगति के साथ साथ अस्थिरता व सुनियोजित उकसावे की प्रवृत्ति भी निरन्तर प्रबल हुई है। संसद जैसे गरिमामय मंच पर संकेतों, प्रतीकों और विवादास्पद पुस्तकों के सुविधाजनक अंशों को उछाल कर प्रश्न खड़े करने से राजनीतिक विमर्श की गम्भीरता कदापि नहीं बढ़ती, वह प्रकारान्तर से केवल क्षणिक ध्यानाकर्षण का प्रयास ही सिद्ध होती है। विपक्ष के नेता द्वारा पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुन्द नरवणे की पुस्तक 'फॉर स्टार्स ऑफ डेस्टीनाय' के चयनित अंश को प्रस्तुत किए जाने के सन्दर्भ में, तथ्यों तथा हमेशा की तरह व्यंग्य के सहारे प्रत्युत्तर देना नदामो सरकार के लिए कदापि कठिन नहीं था। विशेषतः, जब उसी पुस्तक के आगे के अंशों में तत्कालीन सेनाध्यक्ष की विवेकपूर्ण भूमिका का उल्लेख है, जिसने देश को एक जटिल परिस्थिति में धकेलने से बचाया।

प्रसंगवश एक सहज प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या इससे पूर्व कांग्रेस अथवा अन्य किसी सरकार ने अपने सेनाध्यक्ष को ऐसी संस्थागत स्वायत्तता, इतनी सहजता और विश्वास के साथ प्रदान की है कि वे परिस्थितियों की प्रासंगिकता के अनुरूप स्वयं निर्णय लेकर आवश्यक कार्रवाई कर सकें? यदि नहीं, तो विपक्ष का दायित्व समाज में संशय और अविश्वास फैलाने के अनावश्यक प्रयास के स्थान पर सरकार के निर्णय की प्रशंसा करना होना चाहिए था, किन्तु अभिजात्यता के आवरण में उलझे विपक्ष से ऐसी परिपक्व राजनीतिक दृष्टि की अपेक्षा करना भी यथार्थ से परे ही प्रतीत होता है। विपक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका धर्म नकारात्मकता न होकर राष्ट्रहित में वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना है, छिटपुट और उत्तेजक मुद्दे उपस्थित कर विपक्ष कदापि दीर्घकालिक राजनीतिक लाभ अर्जित नहीं कर सकेगा। विपक्ष निरन्तर वही प्रयोग दोहरा रहा है, जिनका उद्देश्य राष्ट्रहित में समाधान नहीं, राजनीतिक समाज के जंगल में टकराव उत्पन्न करना है.

यहां यह समझना आवश्यक है कि विपक्ष अब सरकार को नीतिगत विफलताओं पर घेरने की स्थिति में नहीं है, इसलिए वह संस्थाओं, प्रतीकों और आशंकाओं को राजनीतिक औजार बनाने का प्रयास कर रहा है। ऐसी राजनीति का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन न होकर राजनीतिक वातावरण को अस्थिर बनाना है। यह हताशा से उत्पन्न रणनीति हो सकती है, जो अल्पकालिक मीडिया लाभ तो दे सकती है, परन्तु दीर्घकाल में विपक्ष को वैचारिक रिक्तता को ही उजागर करती है। प्रसंगावधान से यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि सरकारें प्रायः विपक्ष से नहीं, अपने ही समर्थकों के किसी-न-किसी कारण उत्पन्न मनोभंग से दुर्बल होती है। ऐसे में, समर्थकों के मनोभावों को सचेतनता के साथ देखना-समझाना और मनोभंग की स्थिति से समय रहते निपटना अनिवार्य हो जाता है।

आज 'डीप स्टेट' जैसे शब्द केवल साजिश सिद्धान्त नहीं रह गए हैं, वे विशेष रूप से जेन जी के बीच भ्रम और अविश्वास का उपकरण बनते जा रहे है। सरकार को यह समझना होगा कि डिजिटल युग में वैचारिक युद्ध केवल संसद में नहीं, सोशल मीडिया, सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शी और महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में लड़ा जा रहा है। नदामों सरकार की राजनीतिक दक्षता का एक सकारात्मक पक्ष यह रहा है कि उसने संकटों व आपदाओं को व्यापक हितार्थ अवसरों में रूपान्तरित किया है। विपक्ष के उकसावे यदि अनियन्त्रित प्रतिक्रिया को जन्म दें, तो वे सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल सकते हैं। इसके विपरीत, यदि उन्हें रणनीतिक ढंग से उजागर किया जाए, तो वही उकसावे विपक्ष की अविश्वसनीयता को सार्वजनिक कर देते हैं। प्रधानमंत्री का यह कथन 'डंडे खाने के लिए पीठ मजबूत कर रहा हूं, इसी राजनीतिक मनोविज्ञान को रेखांकित करता है।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस अपनी समावेशहीनता, ध्रुवीकरण, अल्पसख्यकवाद और भ्रष्टाचार-प्रधान राजनीति के कारण अप्रासंगिक हुई है, परन्तु यदि सत्ता पक्ष भी केवल 'हम बनाम वे' के मनोविज्ञान में फंस जाए, तो राजनीतिक श्रेष्ठता धीरे-धीरे नैतिक बढ़त खो देती है। ध्यातव्य है कि सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं, अपितु असहमति वा विरोध को आत्मविश्वास से झेल सकने की क्षमता भी है। भाजपा की दीर्घकालिक अपराजेयता विपक्ष की विफलताओं पर नहीं, अपितु स्वयं की वैचारिक अनुशासनशीलता, संस्थागत पारदर्शिता और समर्थक वर्ग के मनोबल पर निर्भर करती है। इसी वैचारिक और नैतिक दृढ़ता के आधार पर सरकार विपक्ष की अराजकता को संयमित और विवेकपूर्ण ढंग से उजागर कर सकती है, जिससे जनमानस का स्वाभाविक झुकाव निरन्तर बना रहता है। लोकतन्त्र में वही सरकारें स्थायित्व प्राप्त करती हैं, जो साहस व विवेक, दोनों के बीच सन्तुलन साधने में सक्षम होती हैं।

 

 

 

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