Breaking News
  • सम्राट चौधरी बनेंगे CM, बिहार में BJP के पहले मुख्यमंत्री का ऐलान, नीतीश की जगह लेंगे
  • मुरैना में वनरक्षक को कुचलने वाला अहमदाबाद से गिरफ्तार, नमकीन-मिठाई बनाते पकड़ा गया
  • बिहार: आज शाम 4 बजे होगी विधायक दल की बैठक, बिहार CM पर होगा फैसला
  • महाराष्ट्र के ठाणे में सड़क हादसा, 11 की मौत: मृतकों में 3 महिलाएं, 2 की हालत गंभीर
  • I-PAC डायरेक्टर विनेश चंदेल गिरफ्तार, ED की कोयला घोटाले में कार्रवाई
  • MP और छत्तीसगढ़ में तापमान 40°C के पार, 15 अप्रैल से हीट-वेव का अलर्ट

होम > विशेष

Debate on Congress Role in Ambedkar’s Legacy

कांग्रेस ने बाबा साहब को हमेशा हाशिए पर रखा

डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका और कांग्रेस के साथ उनके संबंधों को लेकर राजनीतिक बहस तेज। इतिहास, विचार और वर्तमान राजनीति के संदर्भ में उठ रहे सवाल।


कांग्रेस ने बाबा साहब को हमेशा हाशिए पर रखा

धमेन्द्र सिंह लोधी

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है  “यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥” अर्थात् जिस प्रकार महापुरुष आचरण करते हैं, सामान्य व्यक्ति भी उसी का अनुसरण करता है। महापुरुष अपने कार्यों से जो आदर्श प्रस्तुत करते हैं, संपूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है।

भारतवर्ष ऐसे अनेक महामानवों की जन्मस्थली रहा है, जिन्होंने हर युग में समाज का मार्गदर्शन किया है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और गीता उपदेशक श्रीकृष्ण से लेकर महात्मा गांधी और बाबा साहब आंबेडकर तक, अनेक महान व्यक्तित्वों ने भारतीय समाज के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया है। आधुनिक भारत में बाबा साहब आंबेडकर एक ऐसे महामानव थे, जिन्होंने कुरीतियों में जकड़े समाज के उत्थान और पुनर्जागरण के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए।उन्होंने ऊंच-नीच, अस्पृश्यता और जातिगत असमानता को समाप्त कर सामाजिक समता स्थापित करने के लिए जीवनभर संघर्ष किया। बाबा साहब का मानना था कि समाज में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति को अपने गुणों के आधार पर आगे बढ़ने का अधिकार है, और यदि कोई व्यवस्था उसे इस अधिकार से वंचित करती है, तो ऐसी व्यवस्था समाप्त कर दी जानी चाहिए।

डॉ. भीमराव आंबेडकर आधुनिक भारत के महान मानवतावादी चिंतक, दार्शनिक, राष्ट्रवादी और प्रखर राजनीतिज्ञ थे। वे न केवल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के संविधान निर्माता थे, बल्कि सामाजिक समानता के प्रमुख पुरोधा भी थे।बाबा साहब एक सार्वभौमिक समाज सुधारक, राजनेता और दार्शनिक थे। उनका व्यक्तित्व और उनके आदर्श संपूर्ण भारत के लिए अनुकरणीय हैं। हालांकि, वर्तमान समय में उन्हें अक्सर केवल दलितों के मसीहा के रूप में सीमित कर देखा जाता है, जो उनके व्यापक व्यक्तित्व को संकुचित करने जैसा है। वे एक युगपुरुष थे, जो किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

जिस समय बाबा साहब का जन्म हुआ, उस समय भारतीय समाज न केवल पराधीनता की जंजीरों में जकड़ा था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूढ़ियों से भी ग्रस्त था। ऐसे दौर में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और सामाजिक अन्याय के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया। बाद में उनके विचार संवैधानिक प्रावधानों के रूप में देश ने स्वीकार किए।हालांकि, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी से पहले और बाद में भी कांग्रेस पार्टी ने बाबा साहब आंबेडकर को वह स्थान नहीं दिया, जिसके वे अधिकारी थे। आरोप है कि कांग्रेस ने उन्हें संविधान सभा तक पहुंचने से रोकने का प्रयास किया। बाद में बंगाल के नेता जोगेंद्र नाथ मंडल के प्रयासों से वे संविधान सभा के लिए चुने गए।

कहा जाता है कि विभाजन के समय जिन क्षेत्रों से वे चुने गए थे, उन्हें पाकिस्तान में शामिल किए जाने से वे फिर संविधान सभा से बाहर हो गए। इसके बाद हिंदू महासभा के नेता एम.आर. जयकर ने पुणे से अपनी सीट छोड़ दी, जिससे बाबा साहब को पुनः संविधान सभा में आने का अवसर मिला और वे संविधान निर्माण में अपनी भूमिका निभा सके।आजादी के बाद भी यह आरोप लगाए जाते रहे कि कांग्रेस ने चुनावों में उन्हें हराने का प्रयास किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा एडविना माउंटबेटन को लिखे एक पत्र का भी उल्लेख किया जाता है, जिसमें 1952 के चुनाव में आंबेडकर को हराने की बात कही गई थी।

यह भी कहा जाता है कि प्रारंभ में संविधान निर्माण के लिए ब्रिटिश विशेषज्ञ आइवर जेनिंग्स को नियुक्त करने का विचार था, लेकिन अंततः यह जिम्मेदारी डॉ. आंबेडकर को सौंपी गई और उन्होंने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संविधान का निर्माण किया।6 दिसंबर 1956 को उनके निधन के बाद भी उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। दिल्ली में अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी गई और उनके पार्थिव शरीर को मुंबई ले जाना पड़ा। उनके नाम पर तत्काल कोई स्मारक नहीं बनाया गया और न ही उन्हें तुरंत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।बाद में गैर-कांग्रेसी सरकार के समय उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। संसद भवन में उनका चित्र भी स्थापित किया गया।

वर्ष 2014 के बाद केंद्र सरकार ने बाबा साहब की स्मृति में कई पहलें कीं। उनके जीवन से जुड़े पांच प्रमुख स्थलों महू (जन्मभूमि), लंदन (शिक्षा भूमि), नागपुर (दीक्षा भूमि), दिल्ली (महापरिनिर्वाण स्थल) और मुंबई (चैतन्य भूमि) को ‘पंचतीर्थ’ के रूप में विकसित किया गया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाबा साहब को श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि वे संविधान के शिल्पकार होने के साथ-साथ सामाजिक न्याय के योद्धा भी थे। उन्होंने अपना जीवन वंचितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए समर्पित किया।

बाबा साहब आंबेडकर एक महान चिंतक, समाज सुधारक और शिक्षाविद् थे। उनका संदेश आज भी प्रासंगिक है. “अगर मरने के बाद भी जीना चाहते हो तो कुछ ऐसा लिख जाओ या कर जाओ, जिसे लोग याद रखें।”उन्होंने यह भी कहा था  “इस दुनिया में गरीब वही है, जो शिक्षित नहीं है। इसलिए आधी रोटी खा लेना, लेकिन अपने बच्चों को जरूर पढ़ाना।”आज की युवा पीढ़ी के लिए बाबा साहब का जीवन एक मार्गदर्शक है। उनके विचार, आदर्श और संघर्ष न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वे केवल एक युगपुरुष नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक स्थायी प्रेरणा हैं।

 

Related to this topic: