Breaking News
  • सम्राट चौधरी बनेंगे CM, बिहार में BJP के पहले मुख्यमंत्री का ऐलान, नीतीश की जगह लेंगे
  • मुरैना में वनरक्षक को कुचलने वाला अहमदाबाद से गिरफ्तार, नमकीन-मिठाई बनाते पकड़ा गया
  • बिहार: आज शाम 4 बजे होगी विधायक दल की बैठक, बिहार CM पर होगा फैसला
  • महाराष्ट्र के ठाणे में सड़क हादसा, 11 की मौत: मृतकों में 3 महिलाएं, 2 की हालत गंभीर
  • I-PAC डायरेक्टर विनेश चंदेल गिरफ्तार, ED की कोयला घोटाले में कार्रवाई
  • MP और छत्तीसगढ़ में तापमान 40°C के पार, 15 अप्रैल से हीट-वेव का अलर्ट

होम > विशेष

Children Losing Playgrounds to Screens: A Growing

मैदानों से दूर होता बचपन...

डिजिटल दौर में बच्चों का बचपन मैदानों से दूर होता जा रहा है। पारंपरिक खेलों की जगह स्क्रीन ले रही है, जिससे उनके मानसिक और सामाजिक विकास पर असर पड़ रहा है।


मैदानों से दूर होता बचपन

बालपन की सच्ची सुंदरता बा सिर्फ खेलों या मस्ती के पलों में नहीं है.. बल्कि उन क्षणों में है.. जब बच्चे अपने जीवन के महत्वपूर्ण पाठ सीखते हैं... वे खेल, दोस्ती, प्रतिस्पर्धा और सामूहिकता के माध्यम से अपना व्यक्तित्व गढ़ते हैं और यही उन्हें जीवन के संघर्षों से निपटने के लिए तैयार करता है... आज जब तकनीकी दुनिया बच्चों को एकाकी बनाने की चुनौती सामने रख रही है.. जब तमाम बच्चे इस आभासी दुनिया में खोये लगते हैं तो सवाल सही है कि क्या हम उस पुरानी खुशबू उस मिट्टी की महक, उस गिल्ली-डंडे और कचे के खेल को फिर से लौटा सकते हैं..? क्या हम उस गली-मोहल्ले को फिर से जीवित कर सकते हैं.. जहां बच्चों की हंसी और दौड़-भाग से सजीव था हर एक कोना..? 

अब वह मैदानों की माटी से कटकर स्क्रीन की चमक में उलझता जा रहा है... एक देश का भविष्य बच्चों में छुपा होता है और जब वे अपनी मिट्टी से जुड़कर खेलते हैं. जब वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं तो न केवल उनका, बल्कि पूरे समाज का भविष्य उज्ज्वल होता है... यही वह आधार है.. जिस पर भारत का समृद्ध और समावेशी समाज खड़ा होगा... यह सामूहिक और साझा जिम्मेदारी है सरकार, समाज और परिवार की... बच्चों को एक ऐसा संतुलित और समृद्ध बचपन दें.. जहां वे तकनीक के साथ साथ जीवन के वास्तविक पाठ भी सीखखें... यदि हम इस संतुलन को साथ पाए तो हम न केवल एक स्वस्थ और सशक्त पीढ़ी तैयार करेंगे, बल्कि हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे, जो अपने मूल्यों, अपनी पहचान और अपनी शक्ति को समझने वाला हो... आज के बच्चों का बचपन एक विचित्र दौर और द्वंद्व से गुजर रहा है... एक ओर डिजिटल तकनीक ने बच्चों के सामने ज्ञान, वैश्विक संपर्क और रचनात्मकता के नए क्षितिज खोले हैं... वहीं दूसरी ओर यह तकनीक उनके विकास के नैसर्गिक आयामों को क्षीण करती प्रतीत हो रही है... 

यह परिवर्तन केवल दृश्य स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से भी गहरे असर डाल रहा है.. कुछ दशक पहले तक बच्चों की दिनचर्या में मोहल्लों की गलियों में भागदौड़ और खेल के मैदानों की एक खास जगह होती थी... गिल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी, क्रिकेट, फुटबॉल, दौड़, लुका छिपी और कंचे जैसे खेल केवल मनोरंजन नहीं थे., बल्कि वे जीवन के प्राथमिक विद्यालय समान थे... कंचों की पक्तियां बनाकर निशाना साधना हो या गिल्ली को हवा में मारना... यह केवल खेल नहीं.. बल्कि एकाग्रता, धैर्य और संतुलन का अभ्यास था... इन खेलों के माध्यम से बच्चे सामूहिकता, नेतृत्य, सहयोग और सहानुभूति जैसे गुणों को स्वाभाविक रूप से आत्मसात करते थे... मिट्टी से जुड़ाव और शारीरिक सक्रियता उनके मानसिक संतुलन और सामाजिक विकास के लिए आधारशिला का काम करते थे... लेकिन 1990 के दशक के बाद भारत में इंटरनेट और मोबाइल तकनीक का जिस तीव्र गति से प्रसार हुआ.. उसने बच्चों की दिनचर्या, प्राथमिकताएं और सामाजिकता को ही बदल दिया... 

आज के बच्चे मैदानों से कटकर स्क्रीन तक सीमित हो गए हैं... क्रिकेट का बल्ला अब हाथ में नहीं, उगुलयों की टैप में बदल गया है... दोस्तों के साथ दौड़ने खेलने की जगह अब वीडियो गेम के आभासी पात्रों ने ले ली है... विद्यालयों में पारंपरिक खेलों को पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग बनाना.. खेल मैदानों का पुनरुद्धार और अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों के स्क्रीन समय का विवेकपूर्ण नियंत्रण ये कुछ ऐसे ठोस कदम हैं जो बच्चों को दोबारा संतुलित और सक्रिय बचपन की ओर ले जा सकते हैं... साथ ही, शिक्षा में भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सामाजिक संवाद कौशल को स्थान देना भी समय की आवश्यकता बन चुका है...

 

Related to this topic: