छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 में डिजिटल कन्वर्जन, संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा को लेकर कड़े प्रावधान प्रस्तावित हैं। यह कानून ओडिशा, मध्यप्रदेश और हिमाचल के अनुभवों के आधार पर तैयार किए गए है
कैलाश चन्द्र
भारत में कन्वर्जन को लेकर विधिक संरचना पिछले पांच दशकों में निरंतर परिवर्तित होती रही है। राज्यों की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियां, जनजातीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता, विदेश-प्रेरित मिशनरी गतिविधियां और बदलती तकनीकी परिस्थितियां इन सभी ने मिलकर धर्म-स्वातंत्र्य कानूनों को एक विशेष दिशा दी है। इसी पृष्ठभूमि में छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 सामने आया है, जो न केवल अवैध कन्वर्जन को रोकने के उद्देश्य से निर्मित है, बल्कि आधुनिक डिजिटल युग में उभरते नए रूपों की व्यापक पहचान भी करता है।
यदि इस विधेयक की तुलना देश के अन्य प्रमुख राज्यों ओडिशा, मध्यप्रदेश और हिमाचल प्रदेश के कानूनों से की जाए, तो यह स्पष्ट दिखता है कि छत्तीसगढ़ ने अनुभव-संचित मॉडल को आधुनिकीकृत करते हुए कहीं अधिक कठोर और बहुआयामी विधिक संरचना विकसित करने का प्रयास किया है। इन तीनों राज्यों में ओडिशा सबसे पुराना मॉडल प्रस्तुत करता है, मध्यप्रदेश नवीनतम कठोरता और संरचनात्मक गहराई, तथा हिमाचल प्रदेश डिजिटल माध्यमों और संस्थागत प्रचार की निगरानी का विशिष्ट ढांचा स्थापित करता है।
छत्तीसगढ़ ने इन तीनों के प्रमुख बिंदुओं को समाहित कर 2026 का जो मसौदा प्रस्तुत किया है, वह समकालीन चुनौतियों को देखते हुए अपराध की प्रकृति और दंड की कठोरता दोनों को नए आयाम देता है।
भारत में ऐसे कानूनों की ऐतिहासिक शुरुआत ओडिशा से हुई थी, जिसने 1967 में ओडिशा धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम के माध्यम से बल, लोभ और कपट से होने वाले कन्वर्जन को रोकने का कानून बनाया। उस समय विधेयक का स्वरूप अत्यंत सरल था और दंड भी सीमित रखे गए थे। यह उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप था, जब कन्वर्जन का मुख्य रूप ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में भौतिक प्रलोभन या कपटपूर्ण तरीकों के माध्यम से होता था। तकनीकी माध्यम, वैश्विक मिशनरी नेटवर्क या डिजिटल प्रचार अभी उभरने बाकी थे। इसलिए ओडिशा का मॉडल अपने समय में सर्वाधिक उपयुक्त माना गया, किन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में वह कई सीमाओं से युक्त प्रतीत होता है।
इसके विपरीत, मध्यप्रदेश ने 1968 में कानून बनाकर एक प्रारंभिक ढांचा तो निर्मित किया, परंतु वास्तविक रूप से व्यापक संशोधनों का क्रम 2021 और 2022 में आरम्भ हुआ। इन संशोधनों में लव जिहाद, धोखे से विवाह, लिव-इन संबंध में पहचान छिपाने, संगठित कन्वर्जन और सामाजिक-डिजिटल दबाव जैसी आधुनिक समस्याओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया। मध्यप्रदेश का कानून इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था कि उसने कन्वर्जन के इरादे को पहचानने के लिए ‘पूर्व अनुमति’ की अवधारणा को कानूनी शक्ति प्रदान की। यह मॉडल कठोर नियंत्रण, पुलिस सत्यापन और विस्तृत प्रशासनिक प्रक्रिया पर आधारित है, जिसके कारण यह कई राजनीतिक वाद-विवादों का केंद्र भी बना। परंतु वस्तुतः इसका उद्देश्य संवेदनशील सामाजिक समूहों की रक्षा ही था।हिमाचल प्रदेश ने 2006 में जो कानून बनाया, उसे 2019 में संशोधित करते हुए डिजिटल प्रचार, संस्थागत कन्वर्जन और विशेष अदालतों की अवधारणा शामिल की गई। यह पहला राज्य था जिसने स्वीकार किया कि कन्वर्जन का आधुनिक स्वरूप अब व्यक्तियों पर प्रत्यक्ष दबाव डालकर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, वीडियो सामग्री, ऑनलाइन मिशनरी अभियान, चैरिटेबल संस्थाओं द्वारा डिजिटल प्रलोभन तथा एनजीओ नेटवर्क के माध्यम से संचालित होने लगा है। इस प्रकार हिमाचल का मॉडल तकनीकी विवेचना में अग्रणी माना गया।
इन तीनों पृष्ठभूमियों के आधार पर जब छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 सामने आया, तो यह विधेयक ऐसे समय में आया जब राज्य में संगठित कन्वर्जन को लेकर व्यापक जनचिंताएं उभर रही थीं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में कैबिनेट द्वारा स्वीकृत यह मसौदा न केवल उपर्युक्त राज्यों के अनुभवों को सम्मिलित करता है, बल्कि उन चुनौतियों की पहचान भी करता है जिनके लिए भारतीय विधायी ढांचा अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं था।उदाहरण के लिए, ‘डिजिटल कन्वर्जन’ की विस्तृत परिभाषा जिसमें सोशल मीडिया अभियान, ऑनलाइन प्रचार, डिजिटल वादे और इंटरनेट आधारित प्रलोभन को अवैध रूप में चिह्नित किया गया है छत्तीसगढ़ को भारत का सबसे आधुनिक कानून बनाने वाली विशेषताओं में से एक है।छत्तीसगढ़ का विधेयक इसलिए भी विशिष्ट है कि इसमें सामूहिक कन्वर्जन के लिए आजीवन कारावास तक का दंड प्रस्तावित है। यह भारत में पहला ऐसा मसौदा है जिसमें संगठित, रैकेट-आधारित कन्वर्जन को ‘सामाजिक और सांस्कृतिक सुरक्षा के विरुद्ध अपराध’ के रूप में देखा गया है। यह दंड ओडिशा, मध्यप्रदेश और हिमाचल तीनों से अत्यधिक कठोर है।इसी प्रकार, एससी/एसटी/ओबीसी, महिलाओं और नाबालिगों के संदर्भ में भी छत्तीसगढ़ ने 10 से 20 वर्ष तक की सजा तथा न्यूनतम 10 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान रखा है। इस दृष्टि से यह विधेयक संवेदनशील समूहों को प्राथमिकता देता है और यह स्वीकार करता है कि अवैध कन्वर्जन प्रायः इन्हीं वर्गों को लक्ष्य बनाते हैं।
विधेयक का एक और उल्लेखनीय पहलू स्वेच्छिक कन्वर्जन के लिए निर्धारित प्रक्रिया है। इसमें 30 दिन पूर्व सूचना, सार्वजनिक प्रदर्शन, आपत्ति अवधि तथा कन्वर्जन कराने वाले व्यक्ति या संस्था की रिपोर्टिंग ये सभी कदम कन्वर्जन की प्रक्रिया को पारदर्शी और वैधानिक बनाने पर केंद्रित हैं। यह प्रावधान हिमाचल और मध्यप्रदेश के मॉडल से लिया तो गया है, पर छत्तीसगढ़ ने इसे अधिक व्यवस्थित और स्पष्ट रूप में लागू किया है।इसके साथ ही अपराधों को संज्ञेय और अजमानतीय बनाना, विशेष न्यायालयों की व्यवस्था तथा डिजिटल सबूतों की वैधानिक स्वीकार्यता का प्रावधान यह दर्शाता है कि कानून प्रवर्तन को मजबूत और त्वरित बनाने का उद्देश्य प्रमुख है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि अपराधों की जांच और न्यायिक कार्रवाई समय-सीमा में पूर्ण हो और आरोपी तथा पीड़ित दोनों के अधिकार सुरक्षित रहें।
ऐसे विधेयकों पर राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर चर्चा होना स्वाभाविक है। कुछ आलोचकों का मत है कि कठोरता बढ़ाने से धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। वहीं समर्थक कहते हैं कि अवैध, संगठित और वित्तीय-डिजिटल माध्यमों से फैल रही कन्वर्जन गतिविधियां केवल व्यक्तिगत चयन का मामला नहीं रह जातीं, बल्कि वे समाज की सांस्कृतिक संरचना, सुरक्षा और सामुदायिक संतुलन को प्रभावित करती हैं।