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CAPF Rights vs Government: Supreme Court Orders Ig

अर्धसैनिक बलों के हितों का सवाल और सरकार

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारी अपने अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे। छठे वेतन आयोग और न्यायालय के आदेशों पर सरकार की चुप्पी ने बड़ा सवाल खड़ा किया है।


अर्धसैनिक बलों के हितों का सवाल और सरकार

मेजर सरस् त्रिपाठी

अपनी ही सरकार के विरूद्ध अवमानना याचिका योजित करने को मजबूर केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल अब सर्वोच्च न्यायालय के द्वार पर खड़े हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं एक कटुसत्य है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अन्तर्गत प्रतिस्थापित केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में कुल पांच पुलिस बल आते हैं- बार्डर सेक्योरिटी फोर्स, इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस, सीमा सुरक्षा बल, केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल। इसमें पहले तीन पर क्रमसः भारत -पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा, भारत-तिब्बत की सीमा और भारत-नेपाल की सीमा को सुरक्षित रखने का दायित्व है। जबकि केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल औद्योगिक संस्थानों और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल आन्तरिक सुरक्षा सहित नक्सल विरोधी अभियान और आतंकवाद विरोधी कार्यवाही में महत्वपूर्ण योगदान करता है। भारत का संविधान एक 'कल्याणकारी राज्य' की संकल्पना से ओतप्रोत है।

संविधान की मूल भावना यह है कि बिना भेदभाव के सभी का कल्याण हो और किसी के साथ भेदभाव ना हो। लेकिन यदि आपको पता चले कि सरकार पुलिस बलों के साथ भेदभाव करती है तो आपको विश्वास नहीं होगा परंतु यह सच है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल शांति काल में न सिर्फ हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं और आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं बल्कि सच्चे अर्थों में यह लोकतंत्र के एक सुदृद्ध प्रहरी है। भारतीय सशस्त्र सेनाएं (थलसेना, जल सेना एवं वायुसेना) जहां देश की सुरक्षा बाहरी आक्रांताओं से करते हैं वहीं केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल देश की आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं। चाहे लोकतांत्रिक चुनाव हो या कानून व्यवस्था, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों का देश के लोकतंत्र के संरक्षण में बहुत बड़ा योगदान है।

लेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि सरकार उनके हित में दिए गए निर्णयों पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को ही मानने को तैयार नहीं है। औपनिवेशिक काल की मानसिक दासता में जकड़ी लाल फीता शाही उचित और अनुचित का निर्णय कर पाने में या ती असमर्थ है या उसे अंधेरे में रखा जा रहा है। छठे वेतन आयोग ने केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के हित में जो सिफारिशें की थीं उसको लागू कराने के लिए केन्द्रीय पुलिस बल आज तक भी न्यायालय में संघर्ष कर रहे है। न्यायालय के अधिकांश निर्णय केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के पक्ष में गए हैं लेकिन सरकार उसे क्रियान्वित नहीं करना चाहती। कभी रिव्यू पिटीशन और कभी क्यूरेटिव पेटिशन डालती रहती है। यह देश के हित में बिल्कुल नहीं है। जिस देश में सुरक्षा बलों को अपने अधिकारों की लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक लड़नी पड़े तो उनका आत्मविश्वास, आत्मबल और आत्मसम्मान कहां होगा यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है। चाणक्य अपने अर्थशास्त्र में कहता है कि 'हे चंद्रगुप्त! तुम्हारे प्रशासन का वह सबसे बुरा दिन होगा जिस दिन एक सैनिक या सुरक्षा कर्मी को तुम्हारे दरबार में आकर अपने अधिकार के लिए भीख मांगनी पड़े।'

छठे वेतन आयोग ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के अधिकारियों के लिए काफी अच्छी सिफारिशें की थी। सरकार ने उनको कभी ठीक तरीके से लागू नहीं किया। 2 फरवरी 2019 को माननीय न्यायालय ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के अधिकारियों के पक्ष में निर्णय देते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह छठवें वेतन आयोग के सिफारिश को लागू करें। प्रधानमंत्री के अध्यक्षता में कैबिनेट ने निर्णय लिया कि इसे लागू किया जाएगा। लेकिन इसे आधा-अधूरा लागू किया गया। इसलिए इन सर्विस कैडर के अधिकारियों ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में स्पेशल लीव पिटिशन योजित की जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तीन महत्वपूर्ण निर्णय दिए एक, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के सभी अधिकारी 1986 से 'ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए' सर्विस के अधिकारी माने जाएं: दूसरा 'ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के जो भी लाभ या विशेषाधिकार है इन्हें 6 महीने के अंदर दे दिया जाए; तीसरा, इनके कैडर का रिव्यू 6 महीने के अंदर पूरा किया जाए, चौथा, सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड पर जितने भी डेपुटेशन से आईपीएस आते हैं, उसको घटाया जाए।

लेकिन इन आदेशों को क्रियान्वित करने की बजाय सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में रिव्यू पिटीशन यानि पुनरीक्षण याचिका दायर कर दी। सरकार के तरीके पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी कठोर नाराजगी प्रकट की और पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। पुनरीक्षण याचिका 11 अगस्त 2025 को दाखिल की गई और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 28 दिसम्बर 2025 को उसे खारिज कर दिया। याचिका खारिज होने के बाद सरकार का यह कर्तव्य था कि वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को क्रियान्वित करें। लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया। परिणाम स्वरुप इन अधिकारियों के पास और कोई रास्ता न होने के कारण यह फिर से सर्वोच्च न्यायालय गए और अपनी ही सरकार के विरुद्ध इन्होंने अवमानना याचिका योजित की। अवमानना याचिका 6 जनवरी 2026 को स्वीकार कर दी गई। 

लेकिन अभी असली झटका आना बाकी था। सरकार की तरफ से अतिरिक्त महान्यायवादी उपस्थित हुए और उन्होंने न्यायालय को सूचित किया कि सरकार इस विषय में 'हस्तक्षेप' करेगी। मतलब? हां, सरकार इस विषय में संसद से कानून बनाएगी। और क्या कानून बनाएगी? वह किसी को पता नहीं है? हां यह निश्चित है कि यह कानून केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों पक्ष में नहीं होगा क्योंकि पक्ष में तो न्यायालय ने निर्णय दे ही दिया है, बस उसे क्रियान्वित करना था।

अब जिस देश के सुरक्षा बलों को अपने ही सरकार के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमा लड़ना पड़े और जीतने के बाद भी सरकार उसे स्वीकार न करें और उसमें संसदीय और कानूनी हस्तक्षेप करके सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बदलने का मन्तव्य प्रकट करें तो उसे देश के सुरक्षा बलों का मनोबल कैसा होगा? यह कोई भी अनुमान लगा सकता है। लेकिन रहस्य का विषय यह है की तमाम तरह की योजनाओं पर अनाप-शनाप खर्च करने वाली सरकार अपने ही इन अधिकारियों के लिए, जो अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र और देश की सुरक्षा, देश के नागरिकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा करने के लिए उद्यत रहते हैं; कुछ देने को तैयार क्यों नहीं है? इसी तरह का विषय उनके प्रमोशन और डेपुटेशन से भी संबंधित है। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद भी कि महानिरीक्षक स्तर के नीचे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों का डेपुटेशन नहीं होना चाहिए और महानिरीक्षक स्तर पर भी 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए; सरकार चुप है और सब कुछ यथावत चल रहा है। सरकार इसे क्रियान्वित करने के लिए तैयार ही नहीं है। विशेषज्ञों का मत है कि आईपीएस अधिकारियों का केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में जाना पूरी तरह से समाप्त होना चाहिए। यही राष्ट्र और सुरक्षा बलों के हित में है। क्योंकि इन सभी पुलिस बलों जो (लेखक संविधान और राष्ट्रीय कार्य है वह स्पेशलाइज्ड है और आईपीएस ऑफिसर जनरल कैडर के होते हैं, उनका कोई स्पेशलाइजेशन नहीं होता। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार आइ ए एस और आई पी एस के चक्रव्यूह से स्वयं को बाहर नहीं निकल पा रही है और यदि ऐसा है तो यह है देश हित में नहीं है।

 

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