भोपाल में 621 इलाकों में गाइडलाइन बढ़ाने का प्रस्ताव, जनप्रतिनिधियों ने जताया विरोध। वहीं बिजली दरों में 10.2% बढ़ोतरी पर 23 से जनसुनवाई
डॉ. विश्वास कुमार चौहान
भारतीय इतिहास के कैलेंडर में 22 फरवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्र-राज्य की सामूहिक संकल्पशक्ति और वैधानिक प्रतिज्ञा का वह दस्तावेज है. जिसने दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया कि कश्मीर का अर्थ केवल वह नहीं जो हमारे प्रशासनिक नियंत्रण में है, बल्कि वह भी है जो छल, बल और वैश्विक षडयंत्रों के कारण हमसे खौन लिया गया। 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने जब सर्वसम्मति से यह उद्घोष किया कि 'जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा', तो यह किसी दल विशेष का प्रस्ताव नहीं, बल्कि भारत के 140 करोड़ नागरिकों की 'सांस्कृतिक और रणनीतिक आत्मा' की पुकार थी। आज 'पीओजेके संकल्प दिवस' की सार्थकता इसी प्रतिज्ञा को केवल स्मृति और प्रतीकों से आगे ले जाकर एक ठोस राष्ट्रीय नीति और जन-कर्तव्य में परिवर्तित करने में निहित है।
अधिमिलन का सत्य और अधिक्रमण का भूगोल
इतिहास गवाह है कि 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' (अधिमिलन पत्र) वही वैधानिक दस्तावेज था, जिस पर अन्य रियासतों के राजाओं ने हस्ताक्षर किए थे। इसके साथ ही संपूर्ण जम्मू, कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा बन गए। किंतु दुर्भाग्यवस, ब्रिटिश कूटनीति और पाकिस्तानी विस्तारवाद के गठजोड़ ने 'ऑपरेशन गुलमर्ग के नाम पर जो हमला किया, उसने इस रियासत की अखंडता को खंडित कर दिया।
आज जब हम अधिकांत क्षेत्रों की बात करते हैं, तो हमारे समक्ष एक विशाल 'अधूरी अखंडता खड़ी दिखाई देती है। 2,22,236 वर्ग किलोमीटर की रियासत का लगभग 54.4 प्रतिशत हिस्सा आज भी पाकिस्तान और चीन के अवैध कब्जे में है। 31 अक्टूबर 2019 को भारत सरकार द्वारा जारी नया आधिकारिक मानचित्र केवल काटोग्राफी (मानचित्रण) का सुधार नहीं था, बल्कि वह भारत के 'वैधानिक मानचित्र विवेक' की पुनस्र्थापना थी। इसमें पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (POJK), पाकिस्तान अधिक्रांत लद्दाख (POTL) जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल है, और चीन अधिक्रांत लद्दाख (COTL) यानी अवस्साई चिन को स्पष्ट रूप से भारत की सीमा में दिखाया गया।
यह स्पष्ट करता है कि गिलगित-बाल्टिस्तान, जो कि मध्य एशिया का प्रवेश द्वार और सामरिक धुरो है, यह ऐतिहासिक रूप से लद्दाख का अभिन्न अंग है, जिसे पाकिस्तान ने चालाकी से 'उत्तरी क्षेत्र' (शुमाली इलाके जात) का नाम देकर मूल कश्मीर विवाद से अलग दिखाने का डोंग रचा है।
विस्थापन की प्रासदी और विस्मृत नरसंहार
पीओजेके का विमर्श केवल भूमि और नक्शों तक सीमित नहीं है; यह उन 12 लाख विस्थापित परिवारों के रक्त, पीड़ा और संघर्ष की गाथा है, जिन्हें अपनी ही पुण्यभूमि पर पराया कर दिया गया। ये लोग जम्मू-कश्मीर विषय के सबसे पहले और सबसे बड़े 'हितधारक' (Stakeholders) है। अक्टूबर 1947 से शुरू हुआ वह तांडव मानवता के इतिहास का सबसे काला अध्याय है।
मुजपफ़राबाद का नरसंहार हो या बारामूला की लूटपाट, मीरपुर का कत्लेआम हो या अलीबेग कैंप को वीभत्स मातनाएं पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों ने जो बर्बरता दिखाई, का किसी भी सभ्य समाज को लज्जित करने वाली थी।मीरपुर में 25 नवंबर 1947 को जो हुआ, उसे याद कर आज भी रूह कांप उठती है। 20 हजार से अधिक हिंदू-सिखों की हत्या और हजारों महिलाओं का अपहरण कर उन्हें बाजारों
में बेचे जाने की त्रासदी को इतिहास की पुस्तकों में वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। अलीवेग के कीर्तनगढ़ गुरुद्वारे को जिस प्रकार 'ऑशविट्द्ध' जैसे यातना गृह में बदला गया, वह धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। राजौरी में निहत्थे नागरिकों का वह 'जौहर', जहाँ परिवारों ने अपनी माताओं-बहनों के सतीत्व की रक्षा के लिए उन्हें स्वयं अपने हाथों से मारना पसंद किया, वह बलिदान की वह गाथा है जिसे दिल्ली के 'मीरपुर बलिदान भवन' जैसे स्मारक आज भी जीवंत रखे हुए हैं।
सांस्कृतिक पहचान पर प्रहारः एक सभ्यतागत संकट
अधिक्रांत क्षेत्रों में पाकिस्तान की गतिविधियां केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि औपनिवेशिक और सांस्कृतिक विनाश पर आधारित हैं। 51 शक्तिपीठों में से एक 'शारदा पीठ', जो कभी भारतीय सनातन परंपरा में ज्ञान और विद्या का अधिष्ठान थी, आज उपेक्षा और खांडहर में तब्दील हो चुकी है। यह केवल एक मंदिर का ध्वंस नाहीं, बल्कि उस 'काश्मीरपुरवासिनी देवी के अपमान जैसा है जिसकी स्तुति भारत का हर विद्यार्थी विद्यारम्भ संस्कार के समय करता है।मीरपुर का महाराजा रणधीर सिंह निर्मित रघुनाथ मंदिर, पुंछ का हजार वर्ष पुराना मंडोल सूर्य मंदिर और अलोवेग का गुरुद्वारा, ये सभी स्थल भारतीय सभ्यता के पदचिह्न थे, जिन्हें मिटाने का सुनियोजित प्रयास किया गया।वर्तमान में गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओजेके में पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Engineering) और स्थानीय भाषाओं व लिपियों का दमन इस भूभाग के सांस्कृतिक डीएनए को बदलने की एक कुत्सित चेष्टा है।
नीतिगत मूलों का विश्लेषण नेहरू से नरसिम्हा राव तक
पीओजेके की वर्तमान स्थिति कशिस की क्रमिक नीतिगत भूलों और रणनीतिक अदूरदर्शिता का परिणाम है। 1947-48 में जब भारतीय सेना विजयी पथ पर थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर युद्धविराम (Ceasefire) स्वीकार करना और मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाना एक ऐसी ऐतिहासिक भूल थी, जिसने घरेलू मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय जटिलता में उलझा दिया।
इतिहास गवाह है कि 1957 में मंगला बांध निर्माण के समय पीओजेके में पाकिस्तान के विरुद्ध जन-विद्रोह हुआ था, जिसे भारत ने अनदेखा कर दिया। 1962 में चीन द्वारा अक्साई चिन में सड़क निर्माणा की खबरों पर चुप्पी और 1963 में पाकिस्तान द्वारा शक्सगाम घाटी चीन को उपहार स्वरूप दे देने पर प्रभावी सैन्य कूटनीतिक हस्तक्षेप न करना हमारी संप्रभुता के लिए घातक सिद्ध हुआ।
1971 के युद्ध में 93 हजार बुद्धबंदियों के बदले पीओजेके की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता था, किंतु शिमला समझौते ने उस सुनाहरे अवसर को भी गंवा दिया।1994 का संसदीय संकल्प दरअसल उन्हीं दशकों को निष्क्रियता के बाद जागी हुई राष्ट्रीय चेतना का स्वर था, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के समय वैश्विक दबावों के विरुद्ध एक ढाल के रूप में उपयोग किया गया
संकल्प से सिद्धि की और
2014 के बाद भारत की रणनीतिक भाषा में जो 'शिफ्ट' आया है, वह 1994 के संकल्प की तार्किक परिणति है। 5-6 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के उन्मूलन के पश्चात गृहमंत्री अमित शाह का संसद में यह कथन 'जब में जम्मू और कश्मीर की बात कराता है, तो इसमें पीओजेके और अक्साई चिन शामिल हैं। इससके लिए हम जान भी दे सकते हैं भारत की बदली हुई रक्षा और विदेश नीति का मैनिफेस्टो है।रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार यह दोहराया जाना कि 'पाकिस्तान से बात अब केवल पीओजेके पर होगी, यह दशांता है कि भारत अब रक्षात्मक कवचा से बाहर निकलकर अपनी सीमाओं के प्रति 'प्रो-एक्टिव' हो चुका है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1953 से ही निरंतर प्रस्तावों के माध्यम से राष्ट्र को सचेत किया है कि अधिमिलन पूर्ण और वैधानिक है, तथा आक्रमणकारी को उसके कब्जे का लाभनहीं मिलने देना चाहिए। 1993 और 1994 के संघ के प्रस्तावों में सीमा पर सुरक्षा पट्टी बनाने और विस्थापितों के सम्मानजनक पुनर्वास की जो मांग की गई थी, वह आज सरकारी नीतियों के केंद्र में दिखाई देती है।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि 'पीओजेके संकल्प दिवार' केवल अतीत के शोक का दिन नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का पाथेय है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि हमारी एकता तब तक अपूर्ण है, जब तक सिंधु का जल और शारदा की धूल हमारे चरणों में नहीं लौट आती।पीओजेके और गिलगित-माल्टिस्तान में वर्तमान में उठ रहे विद्रोह के स्वर, महंगाई और दमन के विरुद्ध जनता का आक्रोश और भारत के साथ जुड़ने की उनकी आंतरिक आकांक्षा इस बात का संकेत है कि इतिहास अपना चक्र पूरा करने की और बढ़ रहा है। आज आवश्यकता है कि इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर एक 'अकादमिक और वैचारिक पाठ' बनाया जाए।
विस्थापितों के संघर्ष का दस्तावेजीकरण हो, नरसंहारों की स्मृतियों को विश्व मंच पर मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया जाए और नई पीढ़ी को यह बताया जाए कि 22 फरवरी 1994 का प्रस्ताव हमारी 'कानूनी प्रतिज्ञा' है। अखंड भारत का स्वप्न केवल भावना नहीं, बल्कि हमारा वैधानिक अधिकार और राष्ट्रीय कर्तव्य है। जब संकल्प और सामध्य का संगम होगा, तभी 1994 की वह प्रतिज्ञा पूर्ण होगी।