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Statues of Dr Ambedkar: Symbols of Equality-Inspir

बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्तियां: प्रेरणा और समानता का प्रतीक

विवेक शुक्ला


बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्तियां प्रेरणा और समानता का प्रतीक

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की देश के कोने-कोने में बनी मूर्तियां उनके समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आदर्शों से करोड़ों लोगों को प्रेरित करती हैं। ये प्रतिमाएं हर वर्ग के नागरिकों को संवैधानिक मूल्यों की याद दिलाती हैं और सामाजिक संघर्ष की राह पर आगे बढ़ने का साहस भरती हैं। बाबासाहेब अंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माता, सामाजिक न्याय के प्रतीक, शिक्षा के महान प्रचारक और दलितों तथा पिछड़ों के मुक्तिदाता के रूप में जाने जाते हैं। उनकी मूर्तियां न केवल उनकी याद को ताजा करती हैं, बल्कि समाज में व्याप्त असमानता, छुआछूत और अन्याय के खिलाफ निरंतर संघर्ष की प्रेरणा भी देती हैं।

बाबासाहेब की प्रथम प्रतिमा उनकी मृत्यु के महज चार महीने बाद, 14 अप्रैल 1957 को दिल्ली के रानी झांसी रोड स्थित अंबेडकर भवन में स्थापित की गई थी। उस समय यह एक छोटी लेकिन भावपूर्ण प्रतिमा थी, जो उनके अनुयायियों की भावनाओं को व्यक्त करती थी। उसके बाद देशभर में उनकी अनेक मूर्तियां स्थापित होती रहीं। आज आपको उनकी देश के हर छोटे-बड़े शहर, कस्बे और गांव में मूर्तियां मिलेंगी। ये मूर्तियां विभिन्न आकार-प्रकार की हैं – कुछ छोटी और सादगी भरी, तो कुछ भव्य और विशाल। पर कुछ मूर्तियां वास्तव में अद्भुत हैं, जो कला और प्रतीकवाद का अनुपम मिश्रण प्रस्तुत करती हैं।

इनमें सबसे प्रमुख उदाहरण आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा शहर में लगी बाबासाहेब की प्रतिमा है, जिसे दुनिया की सबसे ऊंची अंबेडकर प्रतिमा माना जाता है। इसे स्टैच्यू ऑफ सोशल जस्टिस के नाम से जाना जाता है। यह 125 फीट ऊंची कांस्य मूर्ति 81 फीट ऊंचे आधार पर खड़ी है, जिसकी कुल ऊंचाई 206 फीट (लगभग 63 मीटर) है। यह भारत की चौथी सबसे ऊंची मूर्ति है और विश्व की टॉप-40 सबसे ऊंची मूर्तियों मं  शामिल है। बाबासाहेब की यह मूर्ति स्टील, कांस्य, पीतल और कंक्रीट से निर्मित है। इसका आधार बौद्ध वास्तुकला के कलचक्र महामंडल पर आधारित है, जो शांति, करुणा और समानता के बौद्ध दर्शन को प्रतिबिंबित करता है। इसका उद्घाटन 19 जनवरी 2024 को पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी द्वारा किया गया।

यह मूर्ति सामाजिक न्याय और समानता की लंबी लड़ाई का जीवंत प्रतीक है, जो प्रतिदिन अनगिनत लोगों को प्रेरणा प्रदान करती है। इसमें गति और भाव का शानदार समन्वय है – बाबासाहेब की मुद्रा दृढ़ संकल्प और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यह मूर्ति दर्शाती है कि कैसे कला और तकनीक का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के संदेश को मजबूत कर सकता है।

इस बीच, तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में राज्य सचिवालय के समीप हुसैन सागर झील के किनारे स्थित बाबासाहेब की प्रतिमा देश की दूसरी सबसे ऊंची अंबेडकर मूर्ति है। 125 फीट ऊंची कांस्य मूर्ति 50 फीट ऊंचे गोलाकार आधार पर स्थापित है, जिसकी कुल ऊंचाई 175 फीट है। यह भारत की पांचवीं सबसे ऊंची मूर्ति मानी जाती है। 11.8 एकड़ क्षेत्र में फैले इस स्मारक का निर्माण 791 टन स्टेनलेस स्टील और 9 टन पीतल से किया गया है। इस मूर्ति में बाबासाहेब संविधान की पुस्तक हाथ में लेकर खड़े दिखाए गए हैं, जो उनके संवैधानिक योगदान को रेखांकित करता है। प्रसिद्ध मूर्तिकार राम  सुतार द्वारा निर्मित यह प्रतिमा 14 अप्रैल 2023 को तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव द्वारा अनावरण की गई।

यह मूर्ति रोजाना प्रशासनिक अधिकारियों तथा आम नागरिकों दोनों को संवैधानिक मूल्यों की याद दिलाती है। झील के किनारे होने के कारण इसका दृश्य अत्यंत मनमोहक है, खासकर रात में जब रोशनी से जगमगाती है। यह परिसर पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए एक लोकप्रिय स्थल बन गया है, जहां लोग बाबासाहेब के जीवन और संघर्ष पर चर्चा करते हैं।

इस क्रम में, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमती नगर में 107 एकड़ (कुछ स्रोतों में 108 एकड़) में फैला अंबेडकर मेमोरियल पार्क (जिसे डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल भी कहा जाता है) बाबासाहेब की स्मृति का एक अनुपम उदाहरण है। पार्क के केंद्र में स्तूप के आकार का भवन है, जिसमें बाबा साहेब की भव्य कांस्य मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के नीचे बाबासाहेब का प्रसिद्ध कथन अंकित है- “मेरा जीवन संघर्ष ही मेरा संदेश है”। इस पार्क में बाबासाहेब के जीवन को दर्शाते बहुत से म्यूरल्स हैं। इसमें 124 monument elephants की श्रृंखला भी है, जो शक्ति और स्थिरता का प्रतीक हैं। यह स्मारक न केवल डॉ. अंबेडकर को समर्पित है, बल्कि अन्य महान सामाजिक सुधारकों जैसे कांशीराम और अन्य की याद भी ताजा करता है। लाखों पर्यटक और दलित समुदाय के लोग यहां प्रेरणा लेने आते हैं। पार्क की लाल बलुआ पत्थर की वास्तुकला और शाम की रोशनी इसे एक भव्य दृश्य प्रदान करती है।

महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित दीक्षाभूमि बाबासाहेब के जीवन का अत्यंत पवित्र स्थल है। यहीं 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था, जो हिंदू समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था से मुक्ति का एक ऐतिहासिक कदम था। यहां स्थापित उनकी भव्य प्रतिमा दीक्षा मुद्रा में है, जो सामाजिक क्रांति और धर्म परिवर्तन का प्रतीक है। पूरा परिसर विशाल स्तूप (जो भारत के सबसे बड़े बौद्ध स्तूपों में से एक है), ध्यान कक्ष, बौद्ध विहार और संग्रहालय से सुसज्जित है। लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष यहां आकर बाबासाहेब के सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन के संदेश को स्मरण करते हैं। दीक्षाभूमि पर बाबासाहेब की अस्थियों को भी रखा गया है, जो इसे और अधिक पावन बनाता है। यह स्थल बौद्ध अनुयायियों और सामाजिक न्याय के पक्षधरों के लिए तीर्थ स्थल की तरह है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित अंबेडकर नेशनल मेमोरियल (26, अलीपुर रोड) में स्थापित बाबासाहेब की प्रतिमा राजधानी की सबसे महत्वपूर्ण मूर्तियों में से एक है। यह संविधान सभा और संवैधानिक मूल्यों की याद दिलाती है। स्मारक में संग्रहालय, पुस्तकालय, प्रदर्शनी हॉल, ध्यान कक्ष और अशोक स्तंभ की प्रतिकृति है। यहां 12 फीट ऊंची कांस्य मूर्ति है, साथ ही एक रोबोटिक स्टैच्यू भी है जो संविधान सभा में बाबासाहेब के भाषण दोहराती है। प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार द्वारा निर्मित यह प्रतिमा राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र में होने के कारण देश के नेतृत्व वर्ग को निरंतर प्रेरित करती है। मेमोरियल में आधुनिक तकनीक से बाबासाहेब के जीवन और कार्यों को प्रदर्शित किया गया है, जो युवाओं को उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराता है।

ये पांच भव्य मूर्तियां डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपनों को जीवंत रखती हैं। इनके अलावा देश में हजारों अन्य मूर्तियां हैं, जैसे मुंबई में प्रस्तावित 450 फीट ऊंची स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी (जो निर्माणाधीन है) और विदेशों में भी कई प्रतिमाएं, जैसे अमेरिका में 19 फीट ऊंची स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी। इन मूर्तियों से युवा पीढ़ी को यह समझ आता है कि शिक्षा, संघर्ष और अटूट इच्छाशक्ति से समाज को बदला जा सकता है। बाबासाहेब की ये मूर्तियां न केवल कला, बल्कि सामाजिक न्याय की अनथक यात्रा के जीवंत साक्षी भी हैं।

इन मूर्तियों का महत्व केवल दर्शन तक सीमित नहीं है। ये हमें याद दिलाती हैं कि बाबासाहेब ने शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार माना, उन्होंने “शिक्षित बनो, संगठित होओ, संघर्ष करो” का मंत्र दिया। आज के समय में, जब सामाजिक असमानता अभी भी चुनौती बनी हुई है, ये प्रतिमाएं हमें संवैधानिक मूल्यों – समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय – का पालन करने के लिए प्रेरित करती हैं। हर मूर्ति के आसपास लगे संग्रहालय और प्रदर्शनियां उनके लेखन, जैसे “एनिहिलेशन ऑफ कास्ट” और “स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज” से परिचय कराती हैं।

 बाबासाहेब की मूर्तियां मात्र पत्थर या धातु की संरचनाएं नहीं हैं; ये एक विचारधारा का प्रतीक हैं। ये करोड़ों लोगों को सशक्त बनाती हैं और एक समावेशी, न्यायपूर्ण भारत के निर्माण में योगदान देती हैं। इनके दर्शन से हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि संघर्ष जारी रखें, क्योंकि बाबासाहेब का संदेश आज भी प्रासंगिक है – “मैं ऐसे समाज का सपना देखता हूं जहां व्यक्ति को जाति, धर्म या लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उसके गुणों के आधार पर आंका जाए।”