राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर विशेष लेख: भारत में विज्ञान और अध्यात्म को विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना गया। वैदिक काल से लेकर आधुनिक क्वांटम फिजिक्स तक समग्र दृष्टि की परंपरा
शिवानी कटारा
डॉ. सी. बी. रमन ने प्रकाश के प्रकीर्णन पर शोध कर 1930 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। उनका कार्य यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान भारतीय परंपरा में निरंतर जीवित और सक्रिय रहा है। रमन का कथन था- 'प्रकृति स्वयं हमें प्रेरित करती है।' यह वाक्य वैज्ञानिक अवलोकन और आध्यात्मिक संवेदना के सुंदर मेल को प्रकट करता है। पश्चिमी आधुनिक सोच में विज्ञान और अध्यात्म को अक्सर दो अलग रास्तों की तरह देखा जाता है-एक प्रयोग और प्रमाण पर आधारित, दूसरा अनुभव और आस्था पर। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा में यह दूरी इतनी स्पष्ट नहीं रही। यहां ज्ञान को एक समग्र यात्रा माना गया, जहां प्रकृति और चेतना दोनों की खोज समान रूप से महत्वपूर्ण थी। स्वामी विवेकानंद ने 1893 (शिकागो) में कहा था कि विज्ञान और धर्म का लक्ष्य एक ही है सत्य की खोज। बिज्ञान पूछता है-यह जगत कैसे काम करता है? अध्यात्म पूछता है-मैं कौन हूं और जीवन का अंतिम सत्य क्या है? दोनों के प्रश्न अलग दिखते हैं, पर लक्ष्य एक है-सत्य। भारत की विज्ञान चेतना केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि तर्क, जिज्ञासा और जिम्मेदारी से सोचने की आदत है। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय अध्यात्म ने वैज्ञानिक सोच को केवल प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि उसे एक गहरा दार्शनिक आधार भी प्रदान किया।
वैदिक युग प्राप्न से शुरू हुई खोज-भारतीय अध्यात्म का प्रारंभिक आधार ऋग्वेद है। इसमें नासदीय सूक्त 'नासदासीन्नो सदासात्तदानी' सुष्टि की उत्पत्ति पर प्रश्न उठाते हैं-'तब क्या था? किसने सृष्टि की?' यहां कोई अंतिम उत्तर थोपने की जल्दी नहीं है, बल्कि प्रश्न करने की स्वतंत्रता है। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण की पहली सीढ़ी है आश्चर्य और जिज्ञासा। उपनिषदों में 'नेति नेति' (यह नाहीं, वह नहीं) की पद्धति भी एक तरह की विश्लेषणात्मक विधि है-हर संभावना को परखकर सत्प तक पहुंचना। यह उसी प्रकार है जैसे विज्ञान में परिकल्पना को जांचकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है। इस प्रकार भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी माना बाहरी खोज और आंतरिक अनुभूति की संयुक्त यात्रा के रूप में। यहां प्रकृति, ग्रहों या शरीर का अध्ययन आध्यात्म से आलग नहीं समझा गया। भारतीय दृष्टि के अनुसार केवल बाहरी ज्ञान से जीवन का पूर्ण अर्थ नहीं मिलता और केवल आंतरिक साधना धना से संसार की कार्यप्रणाली नहीं समझी जा सकती, दोनों का संतुलन आवश्यक है।
प्राचीन विज्ञान: अध्यात्म की भूमि पर विकसित प्राचीन भारत में गणित, खगोलशास्व और आयुर्वेद का विकास केवल तकनीकी आवश्यकता से नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। भारतीय गणितज्ञों ने दशमलव पद्धति, शून्य और अनंत जैसी क्रांतिकारी अवधारणाएं दीं। ये खोजें केवल संख्याओं का विस्तार नहीं थीं, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था (लौकिक व्यवस्था ऋत) को समझने का प्रयास भी थी-एक ऐसा विश्वास कि यह सृष्टि व्यवस्थित और अर्थपूर्ण है। खगोलशास्व में ग्रह-नक्षत्रों की गति को केवल गणना का विषय नहीं माना गया, बल्कि एक नियमबद्ध ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। इसी प्रकार आयुर्वेद को 'साइंस ऑफ लाइफ' कहा गया। आयुर्वेद समग्र दृष्टि अपनाता है जहां शरीर, मन और आत्मा एक ही सूत्र में जुड़े माने जाते हैं। स्वास्थ्य को तीन दोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन के रूप में समझा गया। यह संतुलन हमें याद दिलाता है कि हम अलग बलग अस्तित्व नहीं हैं, बल्कि प्रकृति का ही हिस्सा हैं। हमारे भीतर का सूक्ष्म जगत बाहर के विराट जगत से जुड़ा है। जब प्रकृति में लय होती है, तब जीवन में भी लय आती है।
अध्यात्म ने विज्ञान को कैसे समृद्ध किया: भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को तीन स्तरों पर दिशा दी पहला, नैतिक दिशा, ताकि ज्ञान मानव कल्याण के लिए उपयोग हो। दूसरा, जिज्ञासा-प्रेरित खोज, जहां 'मैं कौन हूं?' और 'यह जगत क्या है?' जैसे प्रश्न खोज की शुरुआत बने। तीसरा, समग्र दृष्टि, जिसमें मनुष्य, प्रकृति और चाह्मांड को परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था माना गया।
आधुनिक युग: क्वांटम फिजिक्स और वेदांत आज के रहे हैं। बीच संवाद जारी है। विशेषकर क्वांटम भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान के क्षेत्र में। जिनेवा स्थित विश्व प्रसिद्ध प्रयोगताला सीईआहएन में भगवान शिव 'नटराज' की प्रतिमा स्थापित है। यह 'कॉस्मिक डंस' यानी 'ब्रह्मांड का नृत्य' की प्रतीक है-सृष्टि लगातार बनती और बदलती रहती है। जैसे शिव का नृत्य निर्माण और विनाश के चक्र को दिखाता है. वैसे ही विज्ञान बताता है कि बहुत छोटे कण आपस में टकराते हैं, टूटते हैं और ऊर्जा में बदल जाते हैं। वैज्ञानिक फ्रीटीआफ केपरा ने कहा कि जो दृश्य भारतीय कलाकारों ने शिव के नृत्य में दिखाया, आज के वैज्ञानिक उसे कण्णों और ऊर्जा की गतिविधि में देखते हैं। यानी अलग भाषा है, पर कहानी एक ही है-ब्रह्मांड हमेशा गतिशील है। क्ययंटम फिजिक्सर का एक रोचक सिद्धांत है तरंग-कणा द्वैत। बहुत छोटे कण कभी तरंग की तरह व्यवहार करते हैं और कभी कण की तरह। यानी जो चीज हमें एक रूप में दिखती है, वह असल में उससे कहीं अधिक जटिल हो सकती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि वास्तविकता हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हमारी आंखों को दिखाई देती है।
चेतना का प्रश्न आज भी खुला संवाद-आज का आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड और मस्तिष्क का बहुत बारीक नक्शा बना सकता है। हम जान सकते हैं कि कौन-सा हिस्सा क्या काम करता है। लेकिन एक सवाल अब भी पूरी तरह सुलाल नहीं है-हम जो 'अनुभव' करते हैं, जैसे खुशी, दुख, प्रेम या शांति, यह आखिर कैसे जन्म लेता है? यह व्यक्तिगत अनुभव अभी भी विज्ञान के लिए एक रहस्य है। ऋषियों ने बहुत पहले कहा था कि भौतिक जगत को समझ लेना ही अंतिम ज्ञान नहीं है। उसके परे भी एक आयाम है चेतना, जो केवल पदार्थ से परिभाषित नहीं होती क्योंकि यह हमारे अनुभव, सोच और आत्मबोध से जुड़ी है। आज ध्यान पर हो रहे वैज्ञानिक शोध दिखा रहे हैं कि यह तनाव कम कर सकता है और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इस तरह प्राचीन योग परंपरा और आधुनिक न्यूरोसाइंस के बीच एक रचनात्मक विमर्श विकसित हो रहा है-जहां बाहरी अध्ययन और आंतरिक अनुभव एक-दूसरे से सीख रेह है।