पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव सिर्फ राज्य सरकार नहीं तय करेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करेंगे।
राज कुमार सिंह
पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनाव परिणाम इन पांच राज्यों में भावी सरकार का फैसला ही नहीं करेंगे, राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बताएंगे। इन राज्यों का सत्ता संग्राम ज्यादा दिलचस्प इसलिए भी होगा, क्योंकि दो राज्यों में केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन राजग की सरकारें हैं तो तीन में विपक्षी गठबंधन इंडिया की। सत्ता तो हर राज्य की महत्वपूर्ण होती है, पर सबसे ज्यादा निगाहें पश्चिम बंगाल के चुनाव पर रहेंगी। कांग्रेस छोड़ अपनी अलग तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता बनर्जी वहां तीन बार से मुख्यमंत्री हैं। दिलचस्प समीकरण यह कि पहले सत्ता में रही कांग्रेस और फिर तीन दशक से भी ज्यादा सत्तारूढ़ रहा वाम मोर्चा अब बंगाल की राजनीति में हाशिये पर है, जबकि भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन चुकी है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने बंगाल में बदलाव का माहौल तो बनाया था, लेकिन 294 सदस्यीय विधानसभा में 100 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई, जबकि ममता की तृणमूल 215 सीटें जीत गई। दोनों दलों के मत प्रतिशत में भी 10 प्रतिशत का भारी अंतर रहा।
बेशक तीन सीटों से 77 सीटों की छलांग कम चमत्कारिक नहीं, पर बहुमत का आंकड़ा 147 है। तमाम तिकड़मों के बावजूद भाजपा उसका आधा सफर ही तय कर पाई। दो सीटों से लड़ी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चर्चित नंदीग्राम सीट से शुभेदु अधिकारी द्वारा हरा देना शायद भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। कभी कांग्रेस, फिर तृणमूल कांग्रेस में रहे शुभेदु बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं। लगातार तीन कार्यकाल के बाद ममता और तृणमूल के विरुद्ध सत्ता विरोधी भावना की संभावना से इनकार नहीं, पर उसका चुनावी लाभउठाने के लिए स्वीकार्य विश्वसनीय चेहरा और मजबूत संगठन तो चाहिए। विशाल अल्पसंख्यक वोट बैंक तृणमूल कांग्रेस की बड़ी चुनावी ताकत है। इसीलिए भाजपा हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने की कवायद करती रहती है। पिछली बार मिल कर लड़े कांग्रेस और वाम मोर्चा इस बार अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगे। उनकी सीमित चुनावी भूमिका में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि वे तृणमूल के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाते हैं या फिर सत्ता विरोधी मतदाताओं में हिस्सा बंटा कर भाजपा को नुकसान पहुंचाते हैं। एक बात तय है कि यह चुनाव ममता और भाजपा, दोनों के लिए करो या मरो वाला रहेगा। ममता के लिए यह चुनाव सबसे चुनौतीपूर्ण होगा। इसलिए भाजपा के लिए बंगाल में सरकार बनाने का यह सबसे अनुकूल अवसर भी माना जा रहा है। अगर ममता चौथी बार भी जनादेश पाने में सफल रहीं तो विपक्षी गठबंधन इंडिया के जरिये राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए मुश्किल हो जायेगा।
तमिलनाडु की राजनीति अरसे तक द्रमुक और अनादमुक के बीच दो ध्रुवीय रही, लेकिन जयललिता के निधन के बाद वह संतुलन गड़बड़ा गया है। अन्नाद्रमुक के एकीकरण और उससे गठबंधन के जरिये भाजपा वहां सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं तलाश रही है, लेकिन एम के स्टालिन सरकार के कार्यकाल में रह-रह सनातन धर्म और हिंदी भाषा को ले कर उठते रहे विवादों के बावजूद यह आसान नहीं लगता। हां, टीवीके नामक दल बना कर फिल्म अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय अगर बड़ी ताकत बन कर उभरे तो तमाम समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर तो द्रमुक और कांग्रेस, इंडिया गठबंधन में शामिल हैं ही, तमिलनाडु में भी दोनों में पुराना गठबंधन है। अगर द्रमुक गठबंधन सत्ता बचाने में सफल रहा तो उससे राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन का भी मनोबल बढ़ेगा ही। अन्य क्षत्रपों की तरह एम के स्टालिन भी अपने बेटे उदयनिधि की ताजपोशी करना चाहते हैं, लेकिन उनकी राष्ट्रीय राजनीतक महत्वाकांक्षाओं का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है। वैसे सनातन और हिंदी विरोधी छवि के मद्देनजर एम के स्टालिन के लिए राष्ट्रीय राजनीति की डगर आसान होगी भी नहीं। इंडिया गठबंधन भी उनसे जुड़े विवादों से बचना ही चाहेगा। अगर टीबीके की चुनावी मौजूदगी से गैर द्रमुक दलों की सत्ता संभावनाएं बनीं तो वह एक धुर दक्षिण भारतीय राज्य में भाजपा के लिए बिना टिकट खरीदे ही लॉटरी खुल जाने से कम नहीं होगा।
पांच चुनावी राज्यों में भाजपा की जीत की सबसे बेहतर संभावनाएं असम में हैं। अरसे से घुसपैठ और जनसांख्यिकी परिवर्तन जैसे मुद्दों से घिरे रहे असम में लगातार दूसरी बार भाजपा सरकार है। पूर्व कांग्रेसी हिमंत बिस्वा सरमा ने पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा का जैसा विस्तार करवाया, उसके पुरस्कार स्वरूप उन्हें पिछले चुनाव के बाद असम का मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा के लाड़ले हिमंत इस समय कांग्रेस ही नहीं, राहुल गांधी के भी सबसे मुखर आलोचक हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा को भाजपा में शामिल करवा कर हिमंत ने कांग्रेस को एक और बड़ा झटका चुनाव से ठीक पहले दिया। बेशक असम की राजनीति में गठबंधन आज भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और कांग्रेस में से कौन बेहतर ढंग से चुनावी गठबंधन को अंजाम दे पाता है। राहुल के करीबी गौरव गोगोई के राजनीतिक भविष्य का फैसला भी काफी हद तक ये चुनाव कर देंगे। केरल की दो ध्रुवीय राजनीति में भाजपा के लिए ज्यादा संभावनाएं हैं नहीं। बेशक वहां से लोकसभा चुनाव जीते अभिनेता गोपी केंद्र में मंत्री बनाये गये।
हाल ही में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा अपना मेयर भी बनाने में सफल हो गयी, लेकिन केरल की सत्ता की जंग अभी भी मुख्यत वाम मोर्चा यानि एलडीएफ और कांग्रेसनीत मोचों यूडीएफ के बीच ही सिमटी है। कोई भी जीते, सत्ता इंडिया गठबंधन के पास ही रहेगी, लेकिन ध्यान रहे कि देश में केरल एकमात्र राज्य है, जहां वाम सत्ता बची हुई है। उस किले का दहना वाम राजनीति पर विराम जैसा होगा। केंद्रशासित पुदुचेरी की राजनीति बहुत कुछ तमिलनाडु की तर्ज पर चलती है। पिछली चार पासा पलट गया, क्योंकि द्रमुक की दोस्त कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन बेहद लचर रहा। परिणामस्वरूप क्षेत्रीय दल एनआरकग्ग्रेिस और भाजपा मिल कर सरकार बनाने में सफल हो गये। इस बार वहां गठबंधन की बिसात पर कौन कैसा प्रदर्शन करेगा, सत्ता का जनादेश उसी समीकरण पर निर्भर करेगा।