इजराइल के जल प्रबंधन से भारत क्या सीख सकता है? पानी को ‘गिरफ्तार’ करने की सोच, जल संकट और भारतीय संदर्भ पर गंभीर विश्लेषण।
जयराम शुक्ल
इजराइल की गैलीना मनुस्किन मेरी सोशल मीडिया मित्र हैं। वे पूरी दुनिया घूमती हैं, पर भारत से उनका खास लगाव है। वे यह इतिहास जानती हैं कि यहूदियों को जब दुनिया भर से खदेड़ा जा रहा था, तब भारत में ही उन्हें शरण मिली थी। कभी-कभार मैं उनसे इजराइल का अपडेट लेता रहता हूं। घुमक्कड़ होने के नाते वे यहां के पर्यटन स्थलों के बारे में पूछती रहती हैं। खजुराहो को लेकर उनमें खास रुचि दिखी।कुछेक साल पहले राष्ट्रीय जल सम्मेलन के सिलसिले में इन्हीं दिनों खजुराहो में था। विदेशी पर्यटकों को देखते ही गैलीना का स्मरण हो आया। इत्तेफाक से इजरायली पर्यटक समूह से आमना-सामना हो गया। मैंने उनके स्थानीय गाइड, जो दुभाषिए की भूमिका में था, के जरिए बातचीत की। चूंकि इजराइल के जल प्रबंधन के बारे में काफी कुछ सुन रखा था, इसलिए जानना चाहा। बात संक्षेप में हुई, लेकिन जो बताया गया, वह इजराइल के जल प्रबंधन का मूल मंत्र था ‘अरेस्ट द वाटर’, यानी पानी को गिरफ्तार करो।
केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद इजराइल से दोस्ती बढ़ी है। हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी इजराइल गए और वहां के जल प्रबंधन की काफी चर्चा हुई। पानी के प्रबंधन को सीखने के नाम पर प्रदेश सरकारों के मंत्रियों और अफसरों का प्रतिनिधिमंडल वहां घूमने जाता रहता है। उनकी खेती करने की तकनीक भी अद्भुत है कम पानी, खाद और पेस्टीसाइड से भरपूर उपज। मोहन भागवत जी ने जब से यह कह दिया कि इजराइल की रक्षा-सुरक्षा प्रणाली को अपना रोल मॉडल बनाना चाहिए, तब से हर रक्षा सौदे के लिए हम तेल अवीव की ओर देखने लगे हैं।एक ऐसा देश, जो भारत के आकार के मुकाबले मात्र 0.63 प्रतिशत है, जो चारों ओर से अपने जानी दुश्मनों से घिरा है, हिटलर की जर्मनी में जिसके वंश का नाश हो गया, जिसे मरने के लिए अरब देशों की छोड़ी हुई बंजर भूमि दी गई वह देश विश्वगुरु बनने की चाह रखने वाले इस महादेश का रोल मॉडल है। उसकी विकास यात्रा भी लगभग हमारी आजादी के साथ शुरू हुई। ऐसा क्यों? इसलिए कि उसने अतीत से सबक लिया और हम अपने अतीत पर मुग्ध होते हुए उसे दफन करते गए। जल प्रबंधन के मामले में भी यही हुआ।
कुछ मित्र लोग पानी को गिरफ्तार करने की बात से आहत हो सकते हैं, क्योंकि यह अपराधियों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द है। जल तो यहां पवित्र शब्द है। ऋग्वेद में इसे वरुण देवता माना गया है। हर हिंदू के घर में होने वाली कर्मकांडीय पूजाओं में इसके नाम से स्वस्तिवाचन होता है। पानी के भी विविध अर्थ हैं। यह पौरुषीय स्वाभिमान है, लोकलाज का प्रतीक है। करुणा पानी में घुलकर आंसू बन जाती है। नहाते समय सप्त नदियों के स्मरण से ही पानी अमृत का रूप धर लेता है और स्वर्ग का पथ प्रशस्त करता है। इसलिए इसके गिरफ्तारी की बात नहीं होनी चाहिए।शनिवार के ‘स्वदेश’ के अंक में लेखक-पत्रकार अनुराग तागड़े की एक गंभीर रिपोर्ट छपी है जल संकट से आगे बढ़कर ‘जल ही दिवालियापन’ की ओर दुनिया। रिपोर्ट के तथ्य आंखें खोल देने वाले हैं, खासतौर पर भारत के संदर्भ में। पानी के संकट को लेकर इंडिया वाटर पोर्टल की एक रिपोर्ट पढ़ रहा था कि भारत में 715 मिमी औसत वार्षिक वर्षा के मुकाबले इजराइल में 500 मिमी वर्षा होती है। देश के भीतर 9.5 प्रतिशत के मुकाबले इजराइल में 2 प्रतिशत वाटर बॉडीज हैं। इजराइल के लिए पानी पेट्रोल से भी ज्यादा कीमती है। इसलिए जरूरी है कि एक-एक बूंद का इस्तेमाल किया जाए। यानी 500 मिमी पानी गिरता है तो उसका पूरा का पूरा उपयोग होता है।
अब इजराइली पद्मपुराण या ऋग्वेद तो पढ़े नहीं, जो हम जैसे उसकी महत्ता समझें और पूजें, इसलिए ‘छटक के जाने न पाए’ के भाव के साथ उन्होंने ‘अरेस्ट द वाटर’ की अवधारणा दी। इजराइल ही ऐसा देश है, जो व्यर्थ पानी बहाने, प्रदूषित करने या बर्बाद करने के गुनहगारों को कड़ी सजा देता है। यानी जिसने भी पानी को अरेस्ट करने में जरा भी हीलाहवाली की, उस व्यक्ति का अरेस्ट होना तय।हम किसी का ज्ञान भले न ग्रहण करें, लेकिन उसे प्रवचन के लिए बुलाते जरूर हैं। पानी प्रबंधन पर व्याख्यान देने मुंबई आए इजराइल के नेशनल वाटर सीवरेज अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर डॉ. गिओरा एलन ने बताया कि वे क्या-क्या करते हैं। पहली बात, पानी का अपव्यय और प्रदूषण सबसे बड़ा अपराध है। सीवरेज यानी लेट्रिन में उपयोग होने वाले पानी तक का ट्रीटमेंट कर उसे दोबारा उपयोग के योग्य बनाते हैं। सिंचाई में बूंद-बूंद पानी का इस्तेमाल करते हैं और इस पर भी नजर रखते हैं कि जो बचे, उसी से फिर सिंचाई हो। भाप बनकर न उड़े, इस पर भी निगरानी रहती है।
दैनिक जीवन में हर इजराइली पानी की स्वमेव राशनिंग करता है। पेस्टीसाइड, क्षार और लवण का उपयोग न्यूनतम रखा जाता है और जिसने भी पानी प्रदूषित किया, उसकी खैर नहीं। कुल मिलाकर यह समझ लें कि गंभीर अपराध करने वाला एक बार बच भी जाए, पर पानी के प्रति अपराध करने वाले का बच पाना मुमकिन नहीं। सूखा इजराइल आज इसलिए पानीदार है और पानी को ईश्वर मानने वाला यह महादेश कंगाल।पानी हमारी सृष्टि का आधार है। समूचा वैदिक वाङ्मय नदियों के किनारे, पानी को साक्षी मानकर रचा गया। पानी हमारे संस्कारों में था, उस संस्कार को हमने त्याग दिया, इसलिए हमारी यह गति हुई। भारत में पानी के सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले दो महान योद्धा अनुपम मिश्र और राजेंद्र सिंह राणा ने हमारे जल संस्कारों को जागृत करने की जंग लड़ी है। अनुपम जी अब हमारे बीच नहीं हैं, जलपुरुष राणा आज भी यह लड़ाई लड़ रहे हैं।हां, इनका रोल मॉडल इजराइल नहीं है। इनका रोल मॉडल यही भारत भूमि है, यहीं के जन हैं, यहीं की परंपरा और संस्कृति है, यहीं के संदर्भ हैं और यहीं के आदर्श भी। आगे इन्हीं संदर्भों पर आपको शामिल करते हुए विचार करेंगे।