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Ancient Trishul and Vajra Found in Philippines

भारतीय होने पर गर्व कीजिए, हमारी सनातन संस्कृति 10 हजार साल पुरानी

फिलीपींस में खनन के दौरान प्राचीन त्रिशूल और वज्र मिलने का दावा किया गया है। शोधकर्ता के अनुसार ये सनातन परंपरा से जुड़े प्रतीक हैं और इनकी उम्र हजारों साल पुरानी बताई जा रही है।


भारतीय होने पर गर्व कीजिए हमारी सनातन संस्कृति 10 हजार साल पुरानी

फिलीपींस में 10 हजार वर्ष पुराना त्रिशूल व तीन हजार साल पुराना वज्र मिला, हिन्दू मान्यता के प्रतीक

आपको न केवल भारतीय होने पर गर्व करना चाहिए, बल्कि सनातन संस्कृति का हिस्सा होने के लिए भी गौरवान्वित होना चाहिए। गर्व की अनुभूति कराने और गौरवान्वित होने की अब वाजिब वजह भी मिल गई है। यह वजह है दक्षिण-पूर्व एशिया में हमारी 10 हजार साल से ज्यादा पुरानी सनातनी निशानियों का मिलना। फिलीपींस में खनन के दौरान लगभग 10 हजार वर्ष पुराना त्रिशूल और तीन हजार साल पुराना वज्र मिला है, जिन्हें सनातन धर्म के प्राचीन प्रतीकों से जोड़ा जा रहा है। लिहाजा, इस बात की पुष्टि होती है कि सनातन संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी है।

दरअसल, यह खोज मई 2015 में हुई, जब रविवार विशेष खनिकों ने असामान्य वस्तुओं को देखकर भारतीय शोधकर्ता सैयद शमीर हुसैन को सूचित किया। हुसैन 2012 से फिलीपींस में स्थानीय समुदायों के साथ काम कर रहे थे। जांच के बाद उन्होंने त्रिशूल को भगवान शिव का प्रतीक और वज्र को भगवान इंद्र का आयुध बताया। ये कलाकृतियां 2016 में भारत लाई गईं, जहां हुसैन ने इन्हें प्रस्तुत किया।

इस खोज ने प्राचीन भारतीय संस्कृति के दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैलाव पर नई बहस छेड़ दी है। त्रिशूल और वज्र सनातन धर्म के प्रमुख प्रतीक हैं। त्रिशूल भगवान शिव की शक्ति, संतुलन और विनाश-निर्माण के गुणों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वज्र इंद्र का हथियार है, जो शक्ति, वर्षा और युद्ध से जुड़ा है। हुसैन का दावा है कि ये वस्तुएं हजारों वर्ष पुरानी हैं। इनका फिलीपींस में मिलना भारतीय सभ्यता की प्राचीनता व वैश्विक प्रभाव को प्रमाणित करता है। उन्होंने इन कलाकृतियों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), संस्कृति मंत्रालय और भारतीय संग्रहालयों में पंजीकृत कराया है, जहां इन्हें ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं के रूप में मान्यता मिली है। यह खोज सांस्कृतिक एकता और प्राचीन व्यापार या प्रवास के प्रमाण के रूप में देखी जा रही है।

त्रिशूल 500 करोड़ का और वज्र की कीमत 250 करोड़

शोधकर्ता सैयद शमीर हुसैन ने मुंबई में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन कलाकृतियों को सार्वजनिक किया। उन्होंने बताया कि खोज के दौरान उन्हें सांप काटने की घटना भी हुई, लेकिन वे बच गए। हुसैन ने प्रधानमंत्री और अन्य अधिकारियों को पत्र लिखे हैं। वे इन वस्तुओं की नीलामी कर प्राप्त राशि अनाथालयों और वंचित बच्चों की शिक्षा के लिए उपयोग करने की योजना बना रहे हैं। त्रिशूल की अनुमानित शुरुआती कीमत 500 करोड़ रुपए और वज्र की 250 करोड़ रुपए बताई गई है। हुसैन ने कहा कि ऐसी दुर्लभ खोज विश्व की 8.8 अरब आबादी में बहुत कम लोगों को नसीब होती है।

पुरावशेष नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता के प्रमाण

शोधकर्ता सैयद शमीर हुसैन का कहना है कि मैंने इन चीजों को समझने की कोशिश में लगभग आठ साल बिताए। बहुत सारे शोध और चर्चा के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये सिर्फ पुरावशेष नहीं हैं, बल्कि स्पष्ट रूप से सदियों पुरानी भारतीय सभ्यता और संस्कृति की जड़ों से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि शोध के दौरान त्रिशूल और वज्र के साथ क्या किया जाना चाहिए, इस पर चर्चा करने के लिए उन्होंने कई धार्मिक नेताओं से मुलाकात की। सैयद शमीर हुसैन के मुताबिक लोगों ने अलग-अलग राय दी। कुछ लोगों ने इन पुरावशेषों को खरीदने की इच्छा भी व्यक्त की, लेकिन उन्होंने ऐसे सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।

 

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