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वैश्विक व्यवस्था को रौंदता ‘अमेरिका फर्स्ट’

वैश्विक व्यवस्था को रौंदता ‘अमेरिका फर्स्ट’

वैश्विक व्यवस्था को रौंदता ‘अमेरिका फर्स्ट’

डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल किसी निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष से अधिक एक ऐसे सर्वशक्तिमान सरपंच की तरह दिखाई देता है, जिसे न अंतरराष्ट्रीय कानून की परवाह है, न संस्थाओं की और न ही कूटनीतिक मर्यादाओं की। ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे की आड़ में ट्रंप ने बीते एक साल में जिस तरह वैश्विक व्यवस्था को झकझोरा है, उसने यह सवाल केंद्रीय बना दिया है कि आखिर उनकी मंशा क्या है अमेरिका को सुरक्षित करना या दुनिया को डराकर अपने हितों के आगे झुकने को मजबूर करना।

ट्रंप की राजनीति का मूल दर्शन साफ है ताकत ही कानून है। मीडिया रिपोर्टों में दिए गए उनके कथन कि उन्हें किसी अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं है, उनकी नैतिकता ही उनकी सीमा है, दरअसल उस मानसिकता की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है, जिसमें अमेरिका स्वयं को विश्व व्यवस्था से ऊपर मानता है। वेनेजुएला में आधी रात को कथित सैन्य ऑपरेशन, राष्ट्रपति मादुरो को उनके बेडरूम से उठाकर ले जाने का दावा और फिर यह घोषणा कि अब अमेरिका वहां ‘ट्रांजिशन’ तक शासन करेगा यह सब किसी लोकतांत्रिक राष्ट्राध्यक्ष की नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दौर के साम्राज्यवादी शासक की भाषा है।

ट्रंप की विदेश नीति में संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, डब्ल्यूटीओ या जी-20 जैसी संस्थाओं की कोई अहमियत नहीं बची है। वे या तो इन संस्थाओं को कमजोर कर रहे हैं या खुलेआम उनका अपमान कर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका को जी-20 से बाहर करने की मनमानी हो या विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका को बाहर निकालने का फैसला हर कदम यही बताता है कि ट्रंप को बहुपक्षवाद से चिढ़ है। उन्हें ऐसे मंच नहीं चाहिए जहां नियम साझा हों, उन्हें ऐसे सौदे चाहिए जहां शर्तें सिर्फ अमेरिका तय करे।

टैरिफ ट्रंप का सबसे पसंदीदा हथियार बन चुका है। ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ के नाम पर उन्होंने पूरी दुनिया को व्यापारिक धमकी के घेरे में ले लिया है। डब्ल्यूटीओ नियमों की अनदेखी करते हुए सभी देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाना केवल आर्थिक फैसला नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि अगर अमेरिका से कारोबार करना है, तो उसकी शर्तों पर करना होगा। भारत समेत कई देशों पर इसका सीधा असर पड़ा, लेकिन विरोध की आवाजें बिखरी और कमजोर रहीं। दिलचस्प यह है कि इन फैसलों की वैधता पर खुद अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठ रहे हैं, यानी ट्रंप न केवल वैश्विक कानून, बल्कि अपने देश की संस्थाओं से भी टकरा रहे हैं।

गाजा हो, ईरान हो या जलवायु परिवर्तन हर जगह ट्रंप की नीति में एक ही सूत्र दिखाई देता है। शांति व्यापार है और डर भी मुनाफे का जरिया। गाजा में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बनाकर उसकी अध्यक्षता खुद संभालना और उसमें शामिल होने के लिए देशों से अरबों डॉलर की फीस मांगना, शांति प्रक्रिया का निजीकरण है। ईरान पर ‘आने वाले खतरे’ के नाम पर किया गया हमला अंतरराष्ट्रीय कानून की खुली अवहेलना है, जिसके लिए कोई ठोस सबूत तक सार्वजनिक नहीं किए गए।

66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को बाहर निकालने का फैसला इस बात का प्रमाण है कि ट्रंप की नजर में वैश्विक सहयोग एक बोझ है। जलवायु समझौते हों या इंटरनेशनल सोलर अलायंस जहां अमेरिका को तत्काल आर्थिक लाभ नहीं दिखता, वहां वह पीठ फेर लेता है। अब ग्रीनलैंड पर नजरें टिकाकर ट्रंप जिस विस्तारवादी सोच का संकेत दे रहे हैं, वह बताती है कि उनकी राजनीति 21वीं सदी में 19वीं सदी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को पुनर्जीवित करना चाहती है।

नतीजा यह है कि पूरी दुनिया अस्थिरता के दौर में पहुंच गई है। नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ रही है और उसकी जगह डर, टैरिफ और सैन्य शक्ति का बोलबाला बढ़ रहा है। ट्रंप की मंशा अमेरिका को महान बनाना कम और अमेरिका को अपराजेय साबित करना ज्यादा लगती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जो राष्ट्र खुद को कानून से ऊपर समझते हैं, वे अंततः व्यवस्था नहीं, अराजकता ही पैदा करते हैं। सवाल यह नहीं है कि ट्रंप दुनिया को कहां ले जा रहे हैं, सवाल यह है कि दुनिया कब तक इस दादागिरी को चुपचाप सहती रहेगी।

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