बाबा साहब आंबेडकर की जयंती पर उनके विचारों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत के संकल्प पर चर्चा। सामाजिक न्याय और विकास के दृष्टिकोण का विश्लेषण।
लाल सिंह आर्य
संविधान शिल्पी, भारत रत्न, श्रद्धेय बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की 136वीं जयंती केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उत्सव है। यह वह दिन है, जब हम उस महापुरुष को स्मरण करते हैं, जिन्होंने सदियों की सामाजिक विषमता को चुनौती दी और एक ऐसे भारत की नींव रखी, जहां न्याय, समानता और गरिमा प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार के रूप में प्राप्त हो।
बाबा साहब का जीवन संघर्ष, ज्ञान और संकल्प का अद्वितीय उदाहरण है एक ऐसा जीवन, जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा और आत्मसम्मान की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया।डॉ. आंबेडकर का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे केवल संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि एक बड़े अर्थशास्त्री, श्रेष्ठ विधिवेत्ता, महान समाज सुधारक और दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता भी थे। उन्होंने यह स्पष्ट रूप से समझा था कि यदि भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाना है, तो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय भी सुनिश्चित करना होगा।
यही कारण है कि उन्होंने संविधान में ऐसे प्रावधान शामिल किए, जो समाज के अंतिम व्यक्ति को भी समान अवसर और अधिकार प्रदान करते हैं। उनकी दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पहलू मजबूत संस्थाओं का निर्माण भी था। बाबा साहब का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की स्थिरता और प्रगति उसकी संस्थागत संरचना पर निर्भर करती है।वित्त आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक, रोजगार कार्यालयों और श्रम नीतियों की जो बुनियाद उन्होंने रखी, वह आज भी भारत की आर्थिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रही है। उनकी सोच केवल वर्तमान तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार किया।
बहुत कम लोग जानते हैं कि डॉ. आंबेडकर की डॉक्टरेट थीसिस ने भारत में वित्त आयोग की स्थापना की नींव रखी और उनके विचारों ने 1934 के आरबीआई अधिनियम के निर्माण को दिशा दी। उन्होंने राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड, दामोदर घाटी परियोजना, हीराकुंड बांध और सोन नदी परियोजना जैसे बड़े बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी। ये योजनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि वे केवल सामाजिक न्याय के ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास और राष्ट्र निर्माण के भी अग्रदूत थे।बाबा साहब का सबसे बड़ा सपना था—एक ऐसा भारत, जहां कोई भी व्यक्ति जाति, वर्ग, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव का शिकार न हो। उन्होंने सामाजिक न्याय को केवल एक नारा नहीं, बल्कि शासन और समाज का मूल सिद्धांत बनाने का प्रयास किया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब सामाजिक और आर्थिक समानता भी सुनिश्चित हो।
उन्होंने समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने का कार्य किया। उनका संघर्ष केवल अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के लिए था। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना और वंचित वर्गों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया।आज जब हम वर्तमान भारत को देखते हैं, तो पाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसकी परिकल्पना बाबा साहब ने की थी। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” केवल एक नारा नहीं, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली का आधार बन चुका है।
अंत्योदय की भावना के साथ सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। आर्थिक समावेशन के क्षेत्र में किए गए प्रयास बाबा साहब के आर्थिक चिंतन का उदाहरण हैं। जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों के बैंक खाते खोले गए और उन्हें आधार व मोबाइल से जोड़कर सीधे लाभ पहुंचाया गया।
डिजिटल भुगतान प्रणाली, यूपीआई और भीम ऐप ने आम नागरिक को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है और शोषण व भ्रष्टाचार से बचाने में मदद की है। यह उस सोच का विस्तार है, जिसमें बाबा साहब आर्थिक सशक्तिकरण को सामाजिक मुक्ति का आधार मानते थे।इसके साथ ही, आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं। प्रधानमंत्री गति शक्ति, भारतमाला, सागरमाला और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति जैसी योजनाएं देश को नई गति प्रदान कर रही हैं। यह सब केवल विकास परियोजनाएं नहीं, बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत की नींव हैं, जो बाबा साहब के आर्थिक दृष्टिकोण के अनुरूप हैं।आज का भारत बाबा साहब के सपनों को साकार करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।