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Afghan Taliban Backing Fuels TTP Threat in Pakista

अफगानी तालिबान की शह पर बढ़ रहा टीटीपी

अफगानी तालिबान की शह पर टीटीपी की ताकत बढ़ रही है. पाकिस्तान में आतंकी हमले, छाया सरकार का सपना और क्षेत्रीय तनाव, दक्षिण एशिया की शांति पर गंभीर सवाल


अफगानी तालिबान की शह पर बढ़ रहा टीटीपी

उमेश चतुर्वेदी

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी मौजूदा सैन्य संघर्ष की एक बड़ी वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी की पाकिस्तान में बढ़ती गतिविधियां हैं, जिसके अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज तालिबान से गहरे संबंध हैं। अफगानी तालिबान ने पाकिस्तान पर भी अफगानी तर्ज पर इस्लामी शासन स्थापित करने का सपना देखा है। इस सपने को हाल ही में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी ने भी अपनाया है और उसकी घोषणा भी की है, जिसे अफगानी तालिबान का गहरा समर्थन प्राप्त है। मौजूदा अफगान-पाक संघर्ष की बड़ी वजह यही है।

पाकिस्तान का आरोप है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान उसके यहां आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देता है। इसी आरोप में पाकिस्तान ने 21 से 26 फरवरी के बीच अफगानिस्तान के काबुल, कंधार, पक्तिका और खोस्त जैसे प्रमुख शहरों में हवाई हमले किए। हालांकि तब पाकिस्तान का दावा था कि उसने टीटीपी के ठिकानों को निशाना बनाया है, जबकि अफगानी तालिबान का कहना है कि पाकिस्तान ने उसकी संप्रभुता का उल्लंघन किया है। इसके बाद अफगानी तालिबान की ओर से भी पाकिस्तानी इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है। अफगानी तालिबान का दावा है कि उसने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को भी निशाना बनाया है।

टीटीपी धीरे-धीरे लगातार ताकतवर बनता जा रहा है। इसके पीछे अफगानी तालिबान का प्रत्यक्ष सहयोग माना जा रहा है। दोनों समूह एक ही विचारधारा और कट्टरपंथी इस्लामी कानूनों का न सिर्फ पालन करते हैं, बल्कि अपने प्रभाव वाले इलाकों में उन्हें लागू भी करते हैं। टीटीपी के लड़ाके संगठन में शामिल होने के बाद अफगानी तालिबान के सर्वोच्च नेता के प्रति ही निष्ठा की शपथ लेते हैं।संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में करीब साढ़े छह हजार टीटीपी के लड़ाके मौजूद हैं। हालांकि एक अन्य अनुमान के मुताबिक, इन दिनों टीटीपी के पास करीब पैंतीस हजार लड़ाके हैं। पाकिस्तान के गुस्से को बढ़ाने में हाल ही में टीटीपी द्वारा घोषित साल 2026 की उसकी कार्ययोजना भी रही है। इस दौरान टीटीपी ने अपने नए सांगठनिक ढांचे का ऐलान किया है। टीटीपी की इस घोषणा का उद्देश्य खुद को विद्रोही समूह से बदलकर ‘समानांतर सरकार’ के रूप में स्थापित करना है।

इसके तहत टीटीपी ने पाकिस्तान को उत्तरी, मध्य, दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्रों में बांटा है, जिन्हें वह ‘विलायत’ यानी छाया प्रांत कह रहा है। शासन व्यवस्था के लिए टीटीपी ने खुफिया विंग, आर्थिक निदेशालय, मीडिया इकाई और न्यायिक प्रणाली का भी ऐलान किया है। पहले टीटीपी की गतिविधियां सिर्फ अफगानी सीमा से सटे पाकिस्तान के कुछ इलाकों तक सीमित थीं, लेकिन अब उसने खैबर पख्तूनख्वा के साथ-साथ बलूचिस्तान और पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर तक अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि वह बलूच लड़ाकों को भी समर्थन दे रहा है।टीटीपी के पास आधुनिक अमेरिकी असॉल्ट राइफलें और मशीनगन हैं। माना जा रहा है कि ये वही हथियार हैं, जिन्हें अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से हटते समय छोड़ गई थी। टीटीपी का दावा है कि उसने ड्रोन हमलों की क्षमता भी विकसित कर ली है।

अपने अंदरूनी इलाकों में टीटीपी की बढ़ती भूमिका और शासन के उसके सपने के ऐलान से पाकिस्तान उससे चिढ़ा हुआ है। हाल के दिनों में पाकिस्तान में आत्मघाती हमले भी बढ़े हैं। बन्नू और बाजौर इलाकों में ये घटनाएं ज्यादा सामने आई हैं। टीटीपी ने दावा किया है कि साल 2025 में उसने पाकिस्तान में 3,573 आतंकी हमलों को अंजाम दिया, जिनमें करीब 3,481 सुरक्षाकर्मी मारे गए।पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवाद की एक बड़ी वजह डूरंड रेखा भी है, जिसे अफगानी तालिबान नहीं मानता। पाकिस्तान इन सभी कारणों से टीटीपी को अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है।

पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान टीटीपी को न सिर्फ सुरक्षित पनाहगाह और वैचारिक समर्थन मुहैया करा रहा है, बल्कि आर्थिक मदद भी दे रहा है। टीटीपी की बढ़ती ताकत का अंदाजा ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स से भी लगाया जा सकता है, जिसके 2025 के आंकड़ों के अनुसार टीटीपी दुनिया का सबसे तेजी से उभरता आतंकी समूह है।यह सच है कि पाकिस्तानी सेना के मुकाबले टीटीपी सीधे युद्ध के मामले में कमजोर है, लेकिन गुरिल्ला रणनीति, स्थानीय भूगोल की समझ और अत्याधुनिक हथियारों के बढ़ते प्रयोग ने इसे बेहद घातक संगठन बना दिया है। कुछ रिपोर्टों और संयुक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार, अफगानी तालिबान की ओर से टीटीपी को लगातार मदद मिल रही है। 2021 में अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण के बाद से ही टीटीपी को वहां सुरक्षित ठिकाने मिले हुए हैं, जहां से वह पाकिस्तान में हमलों की योजना बनाता है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट के अनुसार, अफगानी तालिबान टीटीपी को वित्तीय और रसद सहायता भी दे रहा है। कुछ अनुमानों के अनुसार, यह मदद करीब 43 हजार डॉलर प्रति माह है। रिपोर्टों के मुताबिक, अफगानी खुफिया एजेंसी जीडीआई की ओर से टीटीपी नेताओं को काबुल में ‘गेस्ट हाउस’ की सुविधा दी गई है। उनके नेताओं को गिरफ्तारी से छूट के साथ हथियारों के परमिट और आवाजाही के लिए विशेष पास भी जारी किए गए हैं।अफगानी तालिबान से मिले इस समर्थन के चलते टीटीपी के सपने बढ़ रहे हैं, जबकि पाकिस्तान की किरकिरी हो रही है। इससे उपजे संघर्ष से दक्षिण एशिया की शांति में खलल पड़ रही है। बहरहाल, तालिबान से जूझ रहे पाकिस्तान को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि सांप को पालना आखिरकार पालने वाले के लिए ही खतरनाक होता है। सवाल यह है कि क्या इससे वैश्विक राजनीति कुछ सबक लेगी?

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