वरुथिनी एकादशी और सोमवार का संयोग आज खास माना जा रहा है। इस दिन भगवान विष्णु, शिव और चंद्रदेव की पूजा से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
धर्म डेस्कः 13 अप्रैल को वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पड़ रही है, जिसे वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। इस बार यह दिन सोमवार के साथ होने के कारण धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। इस संयोग में भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
वरुथिनी एकादशी पर व्रत और उपवास करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। मान्यता है कि इस व्रत से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, एकादशी और सोमवार का संयोग धार्मिक और ज्योतिषीय रूप से अत्यंत शुभ फल देने वाला माना जाता है। सोमवार भगवान शिव को समर्पित होता है, जबकि चंद्रमा को इस दिन का ग्रह स्वामी माना जाता है। ऐसे में इस दिन तीनों—विष्णु, शिव और चंद्रदेव की पूजा का विशेष महत्व बढ़ जाता है।
वरुथिनी एकादशी व्रत विधि
इस दिन सुबह स्नान के बाद भगवान गणेश की पूजा से शुरुआत करने की परंपरा है। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। विष्णु पूजा में जल, पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। पीले फूल, तुलसी दल और चंदन अर्पित करना शुभ माना जाता है। भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करते हैं। शाम के समय पुनः पूजा की जाती है और अगले दिन द्वादशी पर व्रत का पारण किया जाता है।
शिव और चंद्रदेव की पूजा का महत्व
इस विशेष संयोग में शिवलिंग पर जल और काले तिल अर्पित करना शुभ माना गया है। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने की मान्यता है। चंद्र दोष से प्रभावित लोगों के लिए चंद्रदेव की पूजा विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है। शिवलिंग पर दूध अर्पित कर “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का 108 बार जप करने की परंपरा बताई गई है।
दान और शुभ कार्यों का महत्व
इस दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। गोशाला में दान, गायों को चारा खिलाना, मछलियों को आहार देना और जरूरतमंदों को कपड़े, भोजन व अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करना शुभ माना जाता है।