हल षष्ठी का व्रत संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है। जानें पूजा मुहूर्त, विधि और खान-पान के नियम।
धर्म। इस साल षष्ठी तिथि 2 सितंबर की सुबह 6:12 बजे से शुरू होगी और 3 सितंबर की सुबह 4:25 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार हल षष्ठी यानी हरछठ का पर्व 2 सितंबर को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार महिलाएं संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत रखती हैं। इस व्रत में खान-पान से जुड़े कई नियम बताए गए हैं।
हल षष्ठी व्रत में क्या न खाएं?
हल षष्ठी के व्रत में अनाज का सेवन नहीं किया जाता है। व्रती महिलाएं खेत में उगा या हल से जोता गया अनाज और सब्जियां भी नहीं खाती हैं। इस दिन गाय का दूध और उससे बने घी का सेवन भी वर्जित माना जाता है। व्रत के दौरान इन नियमों का पालन किया जाता है।
हल षष्ठी व्रत पूजा कैसे करें?
घर की दीवार पर गेरू, मिट्टी या भैंस के गोबर से छठ माता का चित्र बनाया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश और माता गौरा की पूजा की जाती है। पूजा में पहले से तैयार ऐपन से छठ माता के चित्र का शृंगार किया जाता है। जमीन को लीपकर घर में छोटा सा तालाब बनाया जाता है। इसमें झरबेरी, पलाश और कांसी के पौधे लगाए जाते हैं। इसके पास बैठकर पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के बाद हल षष्ठी की कथा सुनी जाती है। इसके बाद आरती कर भगवान को भोग लगाया जाता है।
ऐपन कैसे बनाएं?
ऐपन बनाने के लिए पूजा में रखे चावल को पानी में भिगोया जाता है। कुछ देर बाद चावल को छानकर निकाल लें और सिलबट्टे पर पीस लें। इसमें हल्दी मिलाने के बाद पीले रंग का लेप तैयार हो जाता है। इसी लेप को ऐपन कहा जाता है और इसका इस्तेमाल छठ माता के चित्र के शृंगार में किया जाता है।
हल षष्ठी व्रत में क्या खाएं?
पूजा और कथा पूरी होने के बाद व्रती महिलाएं तिन्नी के चावल, करेमुआ का साग और पसई के चावल का सेवन करती हैं। व्रत में इन्हीं पारंपरिक खाद्य पदार्थों को खाने की मान्यता है।
हल षष्ठी पूजा के शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:29 बजे से 5:14 बजे तक
प्रातः सन्ध्या: सुबह 4:52 बजे से 6:00 बजे तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 2:28 बजे से 3:18 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 6:42 बजे से 7:04 बजे तक
अमृत काल: शाम 9:06 बजे से 10:38 बजे तक
सायाह्न सन्ध्या: शाम 6:42 बजे से 7:50 बजे तक
सर्वार्थ सिद्धि योग: 3 सितंबर की रात 1:43 बजे से सुबह 6:00 बजे तक
रवि योग: 3 सितंबर की रात 1:43 बजे से सुबह 6:00 बजे तक
पूजा सामग्री की लिस्ट
हल षष्ठी की पूजा के लिए दीपक, कथा की किताब, भैंस का दूध, घी, दही, गोबर, महुए का फल, फूल, पत्ते, ज्वार की धानी, ऐपन, मिट्टी के छोटे कुल्हड़, देवली-छेवली, कलावा, धूप और कपूर सहित अन्य पूजा सामग्री रखी जाती है।
हल षष्ठी पर हल पूजन का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल है। इसी वजह से उन्हें हलधर भी कहा जाता है। मान्यता है कि बलराम जी शेषनाग के अवतार थे और वे गदायुद्ध में विशेष रूप से निपुण थे। कौरव राजकुमार दुर्योधन को भी उन्होंने गदायुद्ध की शिक्षा दी थी। हल षष्ठी के दिन हल पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। पूर्वी जिलों में इस पर्व को ललई छठ के नाम से भी जाना जाता है।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई धार्मिक मान्यताएं और जानकारियां विभिन्न स्रोतों एवं परंपराओं पर आधारित हैं। इनकी पूर्ण सत्यता और सटीकता का दावा नहीं किया जाता है। विस्तृत जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह लें।