क्या आप जानते हैं सबसे पहले इच्छामृत्यु का वरदान किसे मिला था और महाभारत युद्ध में उनका क्या योगदान रहा था?
महाभारत के महान योद्धाओं में भीष्म पितामह का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके जीवन की कई घटनाएं इतिहास और धर्मग्रंथों में उल्लेखित हैं, लेकिन उनकी सबसे अनोखी विशेषता थी, इच्छामृत्यु का वरदान। इस वरदान के कारण वे अपनी इच्छा के अनुसार ही मृत्यु का समय चुन सकते थे और अपनी मर्जी से मृत्यु को प्राप्त कर सकते थे।
युद्ध में भी नहीं त्यागे तुरंत प्राण
महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरव सेना के सेनापति थे और पांडवों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए थे। उनकी वीरता और अनुभव के कारण उन्हें हराना आसान नहीं था। जब युद्ध के दौरान अर्जुन के बाणों से वे बुरी तरह घायल हुए और तीरों की शैया पर गिर पड़े, तब भी उन्होंने तुरंत प्राण नहीं छोड़े। इसका कारण यही था कि उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था।

क्यों किया सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार
धार्मिक मान्यता के अनुसार, उत्तरायण के समय प्राण त्यागना मोक्षदायक माना जाता है। इसलिए भीष्म पितामह ने तीरों की शैया पर लेटे-लेटे कई दिनों तक प्रतीक्षा की और सही समय आने का इंतजार किया। कहा जाता है कि वे लगभग 58 दिनों तक उसी अवस्था में जीवित रहे और जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
देवव्रत से बने भीष्म
भीष्म पितामह का जन्म माता गंगा और हस्तिनापुर के राजा शांतनु के घर हुआ था। उनका असली नाम देवव्रत था। बचपन से ही वे पराक्रमी, तेजस्वी और विद्वान थे। उन्होंने महर्षि परशुराम से शस्त्र विद्या सीखी थी।

भीष्म प्रतिज्ञा और मिला इच्छामृत्यु का वरदान
एक समय राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, लेकिन सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनकी बेटी से जन्म लेने वाला पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने सिंहासन का अधिकार त्याग दिया और जीवनभर विवाह न करने की प्रतिज्ञा ले ली। इस कठोर व्रत को ही भीष्म प्रतिज्ञा कहा गया, जिसके बाद देवव्रत का नाम भीष्म पड़ गया। अपने पुत्र के इस महान त्याग से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें वरदान दिया कि वे अपनी इच्छा से ही मृत्यु को स्वीकार कर सकेंगे।
महाभारत में निभाई अपनी प्रतिज्ञा
राजा शांतनु के बाद हस्तिनापुर की गद्दी पर पांडु और फिर धृतराष्ट्र बैठे। भीष्म पितामह ने हमेशा सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। इसी कारण उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया, भले ही वे अधर्म के मार्ग पर क्यों न हों।
भीष्म पितामह का जीवन त्याग, कर्तव्य और प्रतिज्ञा का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। उनकी इच्छामृत्यु की कथा आज भी महाभारत की सबसे रहस्यमयी और प्रेरणादायक घटनाओं में गिनी जाती है।