यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ लड़ने के संकेतों से सियासी हलचल तेज हो गई है। मेरठ में सीट बंटवारे के नए समीकरण बन रहे हैं। जानिए किन मुद्दों पर चुनावी मुकाबला केंद्रित होगा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav के हालिया संकेतों के बाद यह लगभग साफ माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक बार फिर गठबंधन के साथ मैदान में उतर सकते हैं।
इस संभावित गठबंधन का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर मेरठ की राजनीति पर साफ दिखाई देने लगा है। राजनीतिक रणनीतिकार सीटों के बंटवारे और सामाजिक समीकरणों का आकलन करने में जुट गए हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यदि गठबंधन कायम रहता है तो चुनावी लड़ाई किन मुद्दों पर लड़ी जाएगी और किसे फायदा मिल सकता है।
सीटों के बंटवारे को लेकर क्या बन रहे हैं समीकरण?
मेरठ जिले की सात विधानसभा सीटों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह आकलन किया जा रहा है कि गठबंधन की स्थिति में पांच से छह सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में जा सकती हैं, जबकि एक या दो सीटों पर कांग्रेस दावा ठोक सकती है। दरअसल, लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन के बाद सपा का आत्मविश्वास बढ़ा है। अखिलेश यादव पहले भी कह चुके हैं कि उनकी प्राथमिकता सीटों की संख्या नहीं बल्कि जीत सुनिश्चित करना है। यही वजह है कि सीट बंटवारे का फॉर्मूला पारंपरिक गणित से अलग भी हो सकता है।
किन मुद्दों को चुनावी हथियार बना सकती है सपा?
युवाओं और पेपर लीक का मुद्दा
मेरठ और आसपास के जिलों में बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे चुनावी बहस का केंद्र बन सकते हैं समाजवादी पार्टी पहले भी युवाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाती रही है और आगामी चुनाव में यह उसका प्रमुख एजेंडा बन सकता है।
किसान और गन्ना भुगतान
पश्चिमी यूपी की राजनीति में किसान हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। गन्ना भुगतान, बढ़ती लागत, खाद-बीज की कीमतें और छुट्टा पशुओं की समस्या जैसे मुद्दे किसानों के बीच प्रभाव रखते हैं ऐसे में किसान बेल्ट वाली सीटों पर गठबंधन इन मुद्दों को जोर-शोर से उठा सकता है।
महंगाई और पीडीए राजनीति
सपा का "पीडीए" (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फार्मूला पिछले कुछ चुनावों में चर्चा का विषय रहा है। पार्टी महंगाई, सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को इस रणनीति के साथ जोड़कर पेश कर सकती है, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही रणनीति आगामी चुनाव में भी सपा की मुख्य चुनावी लाइन बन सकती है।
मेरठ की सात सीटों पर कैसी है तस्वीर?
मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण, किठौर और सरधना जैसी सीटों पर सामाजिक समीकरण गठबंधन के लिए अहम माने जा रहे हैं। वहीं मेरठ कैंट पर कांग्रेस की संभावित दावेदारी की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में हो रही है। हस्तिनापुर सीट, जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, हमेशा से विशेष राजनीतिक महत्व रखती है। दूसरी ओर सिवालखास में किसान और जाट-मुस्लिम समीकरण चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
रालोद के एनडीए में शामिल होने के बाद पश्चिमी यूपी की राजनीति पहले से अधिक दिलचस्प हो गई है। ऐसे में सपा-कांग्रेस गठबंधन की रणनीति और उम्मीदवारों का चयन कई सीटों पर मुकाबले की दिशा तय कर सकता है फिलहाल चुनाव में अभी समय है, लेकिन गठबंधन के संकेतों ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है।