यूपी 2027 चुनाव से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने प्रशांत किशोर की कंपनी I-PAC को कैंपेन की जिम्मेदारी सौंपी। दिल्ली-बंगाल में हुई गुप्त बैठकों के बाद फैसला।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ा दांव चलते हुए चुनावी रणनीति की कमान चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कंपनी I-PAC को सौंप दी है। सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में इसको लेकर गोपनीय बैठकों का दौर चला। बताया जा रहा है कि दो मुख्यमंत्रियों की सलाह के बाद यह फैसला लिया गया।
बीजेपी को सीधी टक्कर की तैयारी
यूपी में मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा मजबूत संगठन के साथ मैदान में है। ऐसे में सपा अब 2027 की लड़ाई को सीधे मुकाबले के रूप में देख रही है। पार्टी के भीतर यह समझ बनी है कि सिर्फ पारंपरिक रैलियों और नारों से बात नहीं बनेगी। बूथ स्तर तक डेटा, सोशल मीडिया नैरेटिव और माइक्रो मैनेजमेंट की जरूरत होगी।
I-PAC क्या करेगी?
I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) को जमीनी सर्वे, वोटर प्रोफाइलिंग, मुद्दों की पहचान, डिजिटल कैंपेन और नैरेटिव बिल्डिंग की जिम्मेदारी दी जाएगी। कंपनी पहले भी कई राज्यों में चुनावी रणनीति तैयार कर चुकी है। हालांकि हर राज्य का समीकरण अलग होता है, और यूपी का सामाजिक-राजनीतिक गणित तो और भी जटिल है।
दिल्ली और बंगाल में हुई मुलाकातें
सूत्रों का दावा है कि अखिलेश यादव और PK की टीम के बीच शुरुआती बातचीत दिल्ली में हुई। इसके बाद पश्चिम बंगाल में भी एक अहम बैठक हुई, जहां रणनीति के खाके पर चर्चा की गई। कहा जा रहा है कि जिन दो मुख्यमंत्रियों ने सलाह दी, वे उन राज्यों से आते हैं जहां PK की रणनीति पहले असर दिखा चुकी है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
सपा की अंदरूनी रणनीति में बदलाव?
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि 2022 के चुनाव के बाद सपा ने महसूस किया कि उसे संगठन और संदेश—दोनों स्तर पर सुधार की जरूरत है। अब फोकस युवाओं, किसानों और पिछड़े वर्गों के मुद्दों पर होगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ-साथ गांव स्तर पर भी संवाद अभियान चलाने की तैयारी है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि रणनीतिकार बदलने से जमीन की हकीकत नहीं बदलती। उनका दावा है कि विकास और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार मजबूत स्थिति में है लेकिन साफ है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी होने वाली है। अभी चुनाव में वक्त है, मगर यूपी की सियासत में हलचल तेज हो चुकी है। आने वाले महीनों में और भी नई चालें चलती दिख सकती हैं।