सूरजपुर के DAV मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल में RTE कोटे से पढ़ने वाले बच्चों से काम करवाने और भेदभाव के आरोप लगे हैं। परिजनों ने जिला शिक्षा अधिकारी से शिकायत की, जांच के आदेश जारी।
सूरजपुरः छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से चौंकाने वाली खबर सामने आई है। इसने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि शिक्षा के अधिकार यानी RTE कोटे से दाखिला लेने वाले बच्चों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। इतना ही नहीं, उनसे स्कूल में मजदूरी तक करवाई जा रही है और विरोध करने पर टीसी काटने की धमकी दी जा रही है।
मामला तिलसिंवा गांव स्थित DAV मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल का बताया जा रहा है। परिजनों ने खुलकर आरोप लगाए हैं, और जिला शिक्षा अधिकारी तक शिकायत पहुंच चुकी है।
RTE कोटे के बच्चों से काम कराने का आरोप
परिजनों ने आरोप लगाते हुए कहा कि स्कूल की प्रिंसिपल विधु शर्मा RTE के तहत पढ़ने वाले बच्चों को अलग नजर से देखती हैं। बच्चों से कहा जाता है कि 'तुम लोग गरीब हो, शिक्षा के अधिकार के तहत पढ़ाई करते हो, मजदूरी करो, मवेशी चराओ।' आरोप ये भी है कि बच्चों से पुताई, रंगाई, सीमेंट मसाला बनाने और फावड़ा चलाने तक का काम कराया गया। कुछ बच्चों के हाथ में चोट आने की भी बात सामने आई है।
एक अभिभावक ने कहा कि हम अपने बच्चों को पढ़ाने भेजते हैं, काम कराने नहीं। अगर यही हाल रहा तो उन्हें सरकारी स्कूल में ही डालना पड़ेगा।
कमजोर है, सरकारी स्कूल में डाल दो
शीतल बाई केवट ने बताया कि प्रिंसिपल ने उनसे कहा कि तुम्हारा लड़का बहुत कमजोर है, इसे निकालकर सरकारी स्कूल में डाल दो। हम यहां सब्जी-भाजी बेचने नहीं आते, पढ़ाने आते हैं। वहीं, सविता देवी ने आरोप लगाया कि उनके बच्चे से स्कूल में सीमेंट उठवाया गया। बच्चे के हाथ में चोट आ गई थी, फिर भी ताने दिए गए।
कुछ परिजनों ने बताया कि माहौल से परेशान होकर उन्होंने अपने बच्चों का नाम ही कटवा दिया। उनका कहना है कि RTE से पढ़ने वाले बच्चों को अलग बैठाया जाता है, अलग व्यवहार किया जाता है।
जांच के आदेश, तीन सदस्यीय कमेटी गठित
मामले को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी अजय मिश्रा ने कहा कि जनदर्शन में शिकायत मिली है। विभाग ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है। उन्होंने कहा कि सभी आरोपों की बिंदुवार जांच की जाएगी। जो भी तथ्य सामने आएंगे उसके अनुसार, नियमानुसार कार्रवाई होगी।
शिक्षा के अधिकार पर सवाल
क्या है आरटीई का उद्देश्य
RTE कानून का मकसद था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को भी बेहतर शिक्षा सम्मान के साथ मिले। लेकिन अगर स्कूलों में ही भेदभाव हो, तो सवाल उठना लाज़िमी है। अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। परिजन चाहते हैं कि सच सामने आए और बच्चों के साथ न्याय हो। क्योंकि बात सिर्फ एक स्कूल की नहीं है, बात भरोसे की है उस भरोसे की जो माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजते वक्त करते हैं।