उज्जैन। शहर में 2028 में होने वाले सिंहस्थ की तैयारियों के बीच एक सवाल उठ रहा है कि क्या क्षिप्रा नदी फिर से साल भर बहने वाली नदी बन पाएगी? स्पेशल डीजी राजाबाबू सिंह ने इसी पर ध्यान खींचा है। इंदौर के पास उज्जैनी गांव में क्षिप्रा के उद्गम स्थल का दौरा करने के बाद उन्होंने कहा कि नदी के प्राकृतिक कैचमेंट, आसपास की पहाड़ियों और हरियाली को बचाना होगा।
उद्गम स्थल की पहाड़ी पर कभी थे घने पेड़
क्षिप्रा इंदौर क्षेत्र में उज्जैनी गांव के पास की पहाड़ियों से निकलती है। यही नदी उज्जैन से गुजरती है, जहां श्रद्धालु महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं। राजाबाबू सिंह ने बताया कि क्षिप्रा का जल परंपरा से भगवान महाकाल के पूजन और अभिषेक से जुड़ा रहा है।
उद्गम स्थल पर मां क्षिप्रा और मां नर्मदा की प्रतिमाएं हैं। मां क्षिप्रा कछुए पर और अमरकंटक से निकलने वाली मां नर्मदा मगरमच्छ पर विराजमान दिखाई गई हैं। पास की जिस पहाड़ी तक करीब 180 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जाता है, वह नदी के स्रोत क्षेत्र का हिस्सा है। सिंह के मुताबिक इस पहाड़ी पर पहले घना जंगल था। पेड़ और मिट्टी बारिश का पानी सोखकर धीरे धीरे नदी तक पहुंचाते थे। जंगल घटने से यह प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर पड़ गई। उन्होंने पहाड़ी की हरियाली को स्पंज की तरह बताया।
पहाड़ी वन विभाग को सौंपने का सुझाव
सिंह ने बताया कि यह पहाड़ी अभी राजस्व विभाग के अधीन है, हालांकि वहां पौधरोपण हो चुका है। उन्होंने इंदौर जिला प्रशासन को सुझाव दिया है कि जमीन वन विभाग को सौंपने पर विचार किया जाए। इससे मौजूदा पौधों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी और आगे पौधरोपण भी हो सकेगा। उनका कहना है कि लंबे समय तक संरक्षण के बिना सिर्फ पौधरोपण से बिगड़ा हुआ इलाका नहीं सुधरेगा।
नर्मदा का पानी अस्थायी हल
क्षिप्रा में पानी की कमी दूर करने के लिए सरकार नर्मदा शिप्रा link परियोजना के जरिए नर्मदा का पानी पहुंचा रही है। इससे खासकर उन दिनों में राहत मिली है, जब नदी का अपना बहाव कम रहता है। राजाबाबू सिंह का मानना है कि बाहर से लाया गया पानी नदी के अपने कैचमेंट का विकल्प नहीं हो सकता। जंगल बढ़ाने, भूजल रीचार्ज सुधारने और सहायक धाराओं को बचाने से ही क्षिप्रा का प्रवाह लंबे समय में मजबूत होगा।
सिंहस्थ से पहले बढ़ी अहमियत
हर 12 साल में होने वाले सिंहस्थ में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और साधु संत नदी में स्नान के लिए जुटते हैं। पिछला सिंहस्थ 2016 में हुआ था और अगला 2028 में होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार सड़क, परिवहन, ठहरने, स्वच्छता, पेयजल और सुरक्षा की तैयारियों पर ध्यान दे रही है। सिंह का कहना है कि साफ और पर्याप्त पानी वाली क्षिप्रा धार्मिक स्नान के साथ जनस्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए भी जरूरी है।
गंगा बेसिन से जुड़ी है क्षिप्रा
सिंह ने बताया कि क्षिप्रा करीब 214 किलोमीटर बहने के बाद चंबल नदी तंत्र में मिलती है। चंबल उत्तर प्रदेश में इटावा के पास यमुना से मिलती है और यमुना प्रयागराज में गंगा में समाहित होती है। इस तरह क्षिप्रा बड़े गंगा बेसिन का हिस्सा है। उन्होंने नदी के दोनों किनारों पर जहां संभव हो एक से पांच किलोमीटर तक पौधरोपण का सुझाव दिया। साथ ही नदी और आसपास के क्षेत्र में अतिक्रमण पर ध्यान देने की बात कही। उनका कहना है कि पौधरोपण, संरक्षण और जनभागीदारी से मां क्षिप्रा को फिर सदानीरा बनाया जा सकता है।