श्योपुर में गोद ली गई बच्ची को जंगल में छोड़ने का मामला सामने आया। जांच में दंपति की मानसिकता पर सवाल, बाल सुरक्षा कानूनों की मजबूती की जरूरत पर बहस तेज।
प्रमोद दुबे।
आर्थिक संपन्नता, वैभव, उच्च शिक्षास्तर एवं संपन्न जीवन के साथ जुड़ा हुआ राजगढ़ जिले के मुंदड़ा परिवार की दंपत्ति आकाश मूंदड़ा एवं पत्नी कृतिका द्वारा 18 अप्रैल को गोद ली हुई ढाई साल की बच्ची को अपने शहर से 400 किलोमीटर दूर श्योपुर नेशनल हाईवे पर एक धार्मिक यात्रा से वापस लौटते हुए जंगली क्षेत्र में फेंक दिया।
हाईवे पर रोती हुई स्थानीय मजदूर को मिली इस ढाई साल की बच्ची को पुलिस द्वारा बाल कल्याण समिति को सौंप दिया गया। यहां से पुलिस जांच शुरू हुई। टोल बैरियर एवं अन्य तरीके से इस ढाई साल की बच्ची को फेंकने वाले व्यक्ति की तलाश हुई। और तलाश राजगढ़ जिले के उस संपन्न घराने तक जा पहुंची। जिसे मूंदड़ा परिवार कहा जाता है।
राजगढ़ सहित भोपाल तक 10 से अधिक पेट्रोल पंपों के मालिक , करोड़ों की प्रॉपर्टी का कारोबारी यह परिवार विशेष रूप से यह दंपत्ति , इसका अपना व्यक्तिगत जीवन उतार चढ़ाव वाला हो सकता है। परंतु जब इस दंपत्ति को गिरफ्तार किया गया , तो दंपत्ति के कथन एवं बयान ने ढाई साल की बच्ची के प्रति सभ्य समाज की उस अशुभ सोच को सामने ला दिया , जिसमें दंपति ने कहा -यह बच्ची हमारे लिए अशुभ साबित हुईं। जब से इस बच्ची को हमने गोद लिया तब से हम बर्बाद हो गए।
यहां प्रश्न अमानवीयता , विकृत मानसिकता से कहीं अधिक यह सामने आता है कि सभ्य समाज की यह कौन सी मानसिकता सामने है ? जो संपन्नता एवं शिक्षा से कहीं ऊपर विकृति का रूप ले चुकी है। बच्ची को भोपाल में केयरटेकर के रूप में पालने वाली महिला कहती है कि लगभग दो से तीन महीने इस बच्ची को मैंने केयर टेकर के रूप में संभाला। परंतु यह मानसिकता स्पष्ट दिखाई देती थी और बच्ची को दंपति के द्वारा प्रताड़ित किया जाता था। उसके साथ मारपीट की जाती थी।
संपूर्ण मामले में ढाई साल की बच्ची को अशुभ बताने वाले इस दंपति की मानसिकता उसी दिशा में दिखाई देती है -जहां यह सभ्य समाज जा रहा है । दूसरी और अगर गोद लेने वाली कानूनी प्रक्रिया की ओर देखें तो स्पष्ट होता है -गोद लेने वाले नाबालिग बच्चों के प्रति अभी भी कठोर कानून की आवश्यकता है ,क्योंकि वर्ष 1993 से लेकर 2025 तक बच्चों को गोद लेने का कानून भले ही दिखावटी रूप से पेचीदगी भरा हो , परंतु बेहद कमजोर नजर आता है।
1993 से 2025 तक 240 मामले गोद लेने वाले दंपति के विषय में सामने आए हैं , जिनमें अमानवीयता एवं मारपीट सहित प्रताड़ना के कारण यह संख्या बाल कल्याण आश्रमों में निराश्रित रूप से बढ़ती जा रही है । अब इसे सभ्य समाज के बीच ढाई साल की बच्ची को अशुभ माना जाए अथवा सभ्य समाज की अशुभ सोच।