रत्नेंद्र ने रचा अंतरिक्ष इतिहास

सतना के रत्नेंद्र ने अंतरिक्ष में इतिहास रचा, 'विक्रम-1' मिशन में अहम भूमिका

सतना के रत्नेंद्र सिंह ने भारत के पहले निजी रॉकेट 'विक्रम-1' के सफल प्रक्षेपण में मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सिस्टम पर काम किया।

By : नरेंद्र कुमार
सतना के रत्नेंद्र ने अंतरिक्ष में इतिहास रचा, 'विक्रम-1' मिशन में अहम भूमिका

मध्य प्रदेश के सतना जिले के 28 वर्षीय एयरोस्पेस इंजीनियर रत्नेंद्र सिंह ने देश के पहले निजी रॉकेट 'विक्रम-1' की ऐतिहासिक सफलता में अहम भूमिका निभाकर प्रदेश और देश का नाम रोशन किया है। स्काईरूट एयरोस्पेस के इस महत्वाकांक्षी मिशन में वह मिशन कंट्रोल टीम का हिस्सा थे। 18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रॉकेट के सफल प्रक्षेपण और तय कक्षा में पहुंचने के पीछे उनकी साढ़े चार साल की मेहनत शामिल रही।

रॉकेट के 'ब्रेन' की जिम्मेदारी संभाली

रत्नेंद्र सिंह ने बताया कि कंपनी ने उन्हें रॉकेट के कई महत्वपूर्ण तकनीकी कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसमें ईंधन (फ्यूल) का विश्लेषण, गाइडेंस, नेविगेशन एंड कंट्रोल (GNC) सिस्टम का विकास, एल्गोरिद्म तैयार करना और यह सुनिश्चित करना शामिल था कि रॉकेट निर्धारित कक्षा (ऑर्बिट) तक सही तरीके से पहुंचे।उन्होंने बताया कि GNC सिस्टम रॉकेट के 'दिमाग' की तरह काम करता है। यही सिस्टम तय करता है कि रॉकेट किस दिशा में उड़ान भरेगा, कितनी ऊंचाई हासिल करेगा, कब दिशा बदलेगा और आखिर में किस कक्षा में पहुंचेगा।

सिमुलेशन टीम में निभाई अहम भूमिका

रत्नेंद्र ने बताया कि उनकी सिमुलेशन टीम में कुल चार सदस्य थे। उड़ान से पहले रॉकेट के व्यवहार, दिशा, गति और ऑर्बिट की सटीक गणना व सत्यापन की जिम्मेदारी उनकी टीम के पास थी। इसी तकनीकी तैयारी ने मिशन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

तीसरी कक्षा में तय कर लिया था सपना

रत्नेंद्र सिंह ने बताया कि उनका अंतरिक्ष विज्ञान की ओर रुझान बचपन में ही हो गया था। जब वह तीसरी कक्षा में पढ़ते थे, तब टीवी पर रॉकेट लॉन्चिंग देखकर उन्होंने तय कर लिया था कि भविष्य में इसी क्षेत्र में काम करेंगे। वहीं, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला से भी उन्हें काफी प्रेरणा मिली।

पिता चाहते थे बेटा IAS बने

रत्नेंद्र के पिता पुष्पेंद्र सिंह, जो सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं, चाहते थे कि उनका बेटा यूपीएससी परीक्षा पास कर आईएएस अधिकारी बने। उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी भी की, लेकिन उनका मन हमेशा अंतरिक्ष विज्ञान में ही लगा रहा। यही वजह रही कि उन्होंने अपना सपना नहीं छोड़ा।

रेलवे की नौकरी और मोटा पैकेज भी ठुकराया

आर्मी स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद रत्नेंद्र ने देहरादून से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की। कुछ समय निजी क्षेत्र में नौकरी करने के बाद उन्होंने उसे छोड़ दिया और आईआईएसटी (Indian Institute of Space Science and Technology), तिरुवनंतपुरम से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में एमटेक किया। उन्होंने रेलवे में इंजीनियर की नौकरी और निजी कंपनियों के आकर्षक पैकेज भी ठुकरा दिए। एमटेक पूरा करने के बाद उन्हें स्काईरूट एयरोस्पेस में काम करने का अवसर मिला।

सतना के कोठरा गांव से अंतरिक्ष तक का सफर

रत्नेंद्र सिंह का जन्म सतना जिले के कोठरा गांव में हुआ। उनकी मां ऋतु सिंह गृहिणी हैं और बहन शिल्पा सिंह हैं। इसी वर्ष उनका विवाह स्मृता सिंह से हुआ। आज उनकी सफलता न सिर्फ सतना, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

 

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