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Book Launch at DU: Ram Cultural Perspective Discus

दिल्ली विश्वविद्यालय में पुस्तक “राम : जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई” का लोकार्पण, राम के सांस्कृतिक महत्व पर हुई चर्चा

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो. निरंजन कुमार द्वारा संपादित पुस्तक ‘राम: जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में राम के सांस्कृतिक और वैचारिक महत्व पर चर्चा हुई। swadesh news


दिल्ली विश्वविद्यालय में पुस्तक “राम  जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई” का लोकार्पण राम के सांस्कृतिक महत्व पर हुई चर्चा

 नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के महर्षि कणाद भवन सभागार में 23 अप्रैल 2026 को प्रो. निरंजन कुमार द्वारा संपादित पुस्तक “राम : जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई” का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति द्वारा किया गया।

 राम भारतीय जीवन-दृष्टि के केंद्र में: आलोक कुमार

मुख्य अतिथि आलोक कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि राम भारतीय जीवन-दृष्टि के केंद्र में स्थित आदर्श हैं। उनके अनुसार राम केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि आचरण, मर्यादा और लोककल्याण के मानक भी हैं। उन्होंने कहा कि राम का चरित्र त्याग, न्याय और सामाजिक समरसता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है और वे राष्ट्र की सामूहिक चेतना को एक सूत्र में जोड़ते हैं।

राम एक सतत जीवन-मूल्य: प्रो. योगेश सिंह

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि राम भारतीय परंपरा में केवल धार्मिक या ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि जीवन मूल्यों की निरंतर प्रवाहित धारा हैं। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के समय से लेकर आज तक रामकथा समाज को दिशा देने का माध्यम रही है और वर्तमान समय में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि रामकथा भारतीय संस्कृति की आत्मा है और राम मंदिर भारतीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करने का प्रयास: प्रफुल्ल केतकर

विशिष्ट अतिथि प्रफुल्ल केतकर ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि वर्तमान समय में बाहरी प्रभावों के कारण भारतीय सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में यह पुस्तक सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

पुस्तक का वैचारिक स्वरूप

पुस्तक के संपादक प्रो. निरंजन कुमार ने बताया कि यह संकलन रामकथा पर आधारित विभिन्न दृष्टिकोणों को एक साथ प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि रामकथा ने विभिन्न धर्मों और परंपराओं को प्रभावित किया है और राम को पंथनिरपेक्षता का भी प्रतीक माना जा सकता है। इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बी. आर. रामचंद्र दीक्षितार, वासुदेव शरण अग्रवाल, कामिल बुल्के और मुंशी प्रेमचंद जैसे विचारकों के लेख शामिल हैं। साथ ही इसमें मीडिया, प्रबंधन, चिकित्सा, इतिहास, दर्शन और राजनीति विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों के विद्वानों के विचार भी संकलित किए गए हैं।

विश्वविद्यालय परिसर में वैचारिक विमर्श

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित विद्वानों ने पुस्तक के विविध आयामों पर विस्तार से चर्चा की। राम के सांस्कृतिक, सामाजिक और वैचारिक महत्व पर केंद्रित यह कार्यक्रम अकादमिक और बौद्धिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आलोक कुमार उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रफुल्ल केतकर तथा पुस्तक के संपादक प्रो. निरंजन कुमार मौजूद रहे। कार्यक्रम में शैक्षणिक और सांस्कृतिक जगत से जुड़े अनेक विद्वानों ने भी सहभागिता की।

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