भोपाल में राष्ट्रीय शोधार्थी समागम-2026 का उद्घाटन, सुरेश सोनी बोले- भारतीय शोध दृष्टि समग्र है, यूरोप-केंद्रित सोच से बाहर निकलना होगा
प्रख्यात चिंतक और विचारक सुरेश सोनी ने कहा कि वर्तमान अकादमिक चिंतन यूरोप-केंद्रित है। इस विचार का ग्रेविटेशनल फोर्स भारत के बाहर है। यूरोप में विषयों का वर्गीकरण ऐसा किया गया है, जो भारत में नहीं है। शोध के लिए इसे भारत-केंद्रित बनाना होगा। भारत की शोध दृष्टि समग्रता में है, विषयों को खंड-खंड में देखने की नहीं है। श्री सोनी श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान द्वारा मेपकास्ट में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शोधार्थी समागम-2026 के उद्घाटन सत्र में उद्बोधन दे रहे थे।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध के लिए दृष्टि, उत्तरदायित्व और कार्य-योजना पर विस्तार से प्रकाश डाला। विकसित भारत के लिए विभिन्न विषयों में शोध और इस विचार के महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि हमारा शोध न तो पुराने की छाया हो और न ही रूस या अमेरिका की प्रतिकृति बने। हमें अकादमिक जगत में आंतरिक मूल्यों को ध्यान में रखकर शोध करना चाहिए। पाश्चात्य समाजशास्त्रीय विचारों ने समाज को विकृत रूप में प्रस्तुत किया है।
सुरेश सोनी ने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत के गांवों में ब्राह्मण के विवाह के अवसर पर कुम्हार की चाक से मिट्टी लाने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि हमारा अर्थशास्त्र का ज्ञान केवल मांग-आपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित नहीं है। इस सिद्धांत के आधार पर सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए ‘उत्पादन में प्रचुरता और उपभोग में संयम’ का मंत्र अपनाना होगा। मांग-आपूर्ति के सिद्धांत में लाभ की कोई सीमा नहीं मानी जाती।
इंटेलिजेंस आर्टिफिशियल न बन जाए
सुरेश सोनी ने डिजिटल और सोशल मीडिया की मौजूदा प्रवृत्तियों से हो रहे नुकसान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग संयमित होना चाहिए, नहीं तो यह हमारे इंटेलिजेंस को ही आर्टिफिशियल बना सकता है। स्क्रीन पर अत्यधिक व्यस्त रहने से व्यक्ति समाज से कट जाता है। तकनीक को अपना स्वामी नहीं बनाना चाहिए।उन्होंने कहा कि वर्तमान चिकित्सा पद्धति भौतिक दृष्टि पर आधारित है, जबकि आयुर्वेद शास्त्र में महर्षि चरक के अनुसार किसी भी पदार्थ के पांच स्तर होते हैंस्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अवयव और अर्थत्व।
शोध ऐसा हो, जो सबकी सोच ही बदल दे : मुख्यमंत्री
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि शोध केवल अकादमिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह समाज और राष्ट्र की दिशा बदलने वाली शक्ति है। कोई भी शोध इतना उच्च कोटि का होना चाहिए कि वह सभी की सोच को नई दृष्टि और नई दिशा दे।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे देश के विकास के लिए अपनी जिज्ञासा और रुचि के अनुसंधान क्षेत्रों में निर्भीक होकर आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि शोध का लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होता, बल्कि समाज के लिए होता है। शोध केवल शैक्षणिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और विकास का सशक्त माध्यम है।
भारतीय संस्कृति और चरित्र-मूलक होना चाहिए शोध
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने ‘महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम’ वेबसाइट का शुभारंभ किया, महाकाल ब्रोशर का विमोचन किया तथा मेपकास्ट द्वारा आयोजित होने वाले 41वें मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक सम्मेलन एवं विज्ञान उत्सव के पोस्टर का अनावरण किया।विशिष्ट अतिथि पूज्य आचार्य मिथलेशनन्दिनी शरण महाराज ने कहा कि शोध भारतीय संस्कृति और चरित्र-मूलक होना चाहिए, प्रतिक्रिया-प्रधान नहीं। इस अवसर पर उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष कुलगुरु प्रो. मधुकर एस. पाडवी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संस्थान के अध्यक्ष अशोक पाण्डेय ने समागम की विषयवस्तु पर प्रकाश डाला।उद्घाटन सत्र में मेपकास्ट के अध्यक्ष डॉ. अनिल कोठारी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सहित अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।