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MP High Court 3.5 Lakh Pending Service Cases

सुनिए सरकारः प्रदेश के साढ़े तीन लाख लंबित मामलों को फैसले की दरकार

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में कर्मचारियों के सेवा विवादों के 3.5 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। सरकार ट्रिब्यूनल गठन पर विचार कर रही है, जिससे अदालतों का बोझ कम हो सकता है।


सुनिए सरकारः प्रदेश के साढ़े तीन लाख लंबित मामलों को फैसले की दरकार

प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी विवादों (सर्विस मैटर) की बढ़ती संख्या ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में मुकदमों का अंबार लगा दिया है। किसी को वेतनवृद्धि नहीं मिली, किसी को पदोन्नति नहीं दी गई, तो किसी का तबादला गलत कर दिया गया। उच्च न्यायालय की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में लंबित मामलों की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास बताई जा रही है, जिन्हें फैसले की दरकार है।

दरअसल, सच्चाई यह है कि अधिकतर मुकदमे ऐसे हैं जिनका निपटारा विभागीय अफसरों या मंत्रालय स्तर पर ही हो सकता है, लेकिन अफसरशाही के कारण अनावश्यक रूप से ये मामले उच्च न्यायालय का बोझ बढ़ा रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार जल्द ही एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) बनाने पर विचार कर रही है। उच्च न्यायालय ने भी राज्य सरकार को इस संबंध में सुझाव दिया है।

28 जनवरी को उच्च न्यायालय ने चौकी लाल यादव बनाम मप्र राज्य के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि सर्विस मैटर अदालतों पर बहुत बड़ा बोझ डाल रहे हैं।

कर्मचारियों के सेवा संबंधी मामलों के निराकरण के लिए ट्रिब्यूनल के गठन पर विचार चल रहा है। कैबिनेट की बैठक में इस पर चर्चा हुई है और जल्द ही प्रस्ताव लाया जा सकता है।
- संजय कुमार शुक्ल, अतिरिक्त मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन

उच्च न्यायालय के मुख्य सुझाव

  • हर विभाग में एक प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाए।
  • कर्मचारियों की शिकायतें (स्थानांतरण, पदोन्नति, वरिष्ठता क्रम, वेतन, निलंबन आदि) विभागीय स्तर पर ही निपटाई जाएं। इससे अदालतों में मामलों की संख्या कम होगी, खर्च बचेगा और समय की बचत होगी।
  • यदि विभाग में पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध न हों, तो सेवानिवृत्त जजों या अनुभवी अधिकारियों की सेवाएं ली जा सकती हैं।
  • यह प्रणाली कर्मचारी और अधिकारी के बीच सीधी चर्चा के माध्यम से लचीले ढंग से मुद्दों के समाधान की अनुमति देगी।
     

दिग्विजय सरकार ने खत्म किया था न्यायाधिकरण

अदालतों से मिल रही फटकार के चलते सरकार भी चिंतित है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसके लिए योजना बनाने के निर्देश दिए हैं। लगभग 25 साल पहले राज्य में ऐसे ट्रिब्यूनल की व्यवस्था थी, जिनमें कर्मचारियों के मामलों की सुनवाई होती थी, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इन ट्रिब्यूनल को समाप्त कर दिया। इसके बाद कर्मचारी अदालत की शरण में जाने लगे और अब हालात और गंभीर हो गए हैं।

80 प्रतिशत मामले शिक्षा विभाग से जुड़े

न्यायालयीन और सरकारी सूत्रों के मुताबिक, लंबित प्रकरणों में लगभग 80 प्रतिशत मामले शिक्षा विभाग से संबंधित हैं। इनमें तबादले, वेतनमान, वेतनवृद्धि, पदोन्नति, वरिष्ठता, नियमितीकरण, निलंबन, सेवा समाप्ति और पेंशन जैसे मुद्दे शामिल हैं।

सरकार प्रयास करे, तो संसाधनों की बचत

यदि सरकार इन मामलों के निराकरण के लिए ठोस प्रयास करे, तो समय और धन दोनों की बचत हो सकती है। विभागीय स्तर पर ही विवादों का समाधान हो जाने से अदालतों का बोझ भी कम होगा।
- बसंत पुरोहित, संरक्षक, अधिकारी-कर्मचारी पेंशनर्स महासंघ

सरकार अपने स्तर पर लंबित मामलों का निपटारा करने के लिए प्रयास करे। इससे सरकार और कर्मचारियों दोनों का समय, धन और संसाधन बचेंगे।
- उमाशंकर तिवारी, महामंत्री, तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ

कई बार अदालत के आदेश के बावजूद अधिकारी उनका पालन नहीं करते। इसी कारण कर्मचारियों को याचिका दायर करनी पड़ती है, जिससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जाती है।
- धन्य कुमार जैन, अध्यक्ष, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर

 

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