भस्म होली में मणिकर्णिका घाट

काशी में जलती चिताओं की राख से खेली जा रही अनोखी होली, जानिए इसके पीछे की वजह

काशी के मणिकर्णिका घाट पर राख से होली क्यों खेली जाती है? जानिए इसके पीछे का रहस्य...

By : Admin
काशी में जलती चिताओं की राख से खेली जा रही अनोखी होली, जानिए इसके पीछे की वजह

काशी का मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से होली खेली जा रही है। यहां एक अनूठा नजारा देखने को मिल रहा है जिसमें कोई गले में नरमुंडों की माला डाले हैं, तो कोई डमरू की थाप पर नाचता दिखाई दे रहा है। आपने शायद ही ऐसा कोई नजारा कहीं देखा होगा जहां पर चिताएं भी निकल रही हैं और वहीं पर उन्हीं चिताओं की राख से होली खेली जा रही है। लेकिन क्या आप इसके पीछे की वजह जानते हैं?

काशी में हर साल रंगभरी एकादशी के अगले दिन एक अनोखी और अद्वितीय होली का आयोजन होता है, जिसे लोग भस्म होली या मसान की होली के नाम से जानते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु और साधु-संन्यासी चिता की राख और भस्म के साथ रंगों का उत्सव मनाते हैं। शनिवार को मसान की होली का रंगोत्सव डमरू वादन से शुरू हुआ। डमरू की गूंज के बीच साधु-संन्यासी मणिकर्णिका घाट पहुंचे और पूजन किया। चलिए अब इसके पीछे की वजह जान लेते हैं।

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अनोखी परंपरा

काशी, जो जीवन और मृत्यु को सहज रूप से स्वीकार करने की संस्कृति का प्रतीक है, यहां देवस्थान और महाश्मशान दोनों का समान महत्व है। मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भगवान शिव यहाँ भस्मांगरागाय महेश्वराय के रूप में प्रकट होते हैं। इस दिन मसान की होली का आयोजन होता है, जिसमें राग-रागिनियों की धुन के बीच देश-विदेश से कई पर्यटक भी शामिल होते हैं।

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तीन लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक

इस भस्म होली में हर वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं। रंग, गुलाल और भस्म के बीच मणिकर्णिका घाट का दृश्य अत्यंत मनमोहक और अद्भुत लगता है। विदेशी पर्यटक भी इस अनोखे अनुभव का हिस्सा बनते हैं और श्रद्धा के साथ इस पौराणिक महोत्सव में शामिल होते हैं। इस साल जानकारी के अनुसार अभी तक लगभग 3 लाख लोग शामिल हो चुके हैं।

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मणिकर्णिका घाट पर होने वाली भस्म होली न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत को भी जीवित रखती है। यह आयोजन जीवन की अनित्यता को समझने और मृत्यु से भय मुक्त होने का संदेश देता है।

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