छतरपुर। मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर चल रहा विरोध अब एक संवेदनशील और निर्णायक स्थिति में पहुंच गया है। पन्ना और छतरपुर जिलों के आदिवासी समुदाय विरोध कर रहे हैं। इसमें विशेषकर महिलाएं जो परियोजना के खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रही हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। जबकि प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही जा रही है।
प्रशासनिक प्रतिबंध और धारा 163 को लेकर तनाव
आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि उन्हें अपनी बात रखने के लिए दिल्ली जाने से रोका गया। रास्तों में कई जगहों पर रोक लगाई गई और आवश्यक सुविधाओं जैसे भोजन व पानी तक की समस्या का सामना करना पड़ा।
स्थानीय स्तर पर प्रशासन द्वारा धारा 163 लागू किए जाने को लेकर भी विवाद बढ़ गया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इससे उनके विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है, जबकि प्रशासन का पक्ष है कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है।
पन्ना और छतरपुर जिलों की सीमाओं को लेकर जारी प्रशासनिक आदेशों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा है कि इन आदेशों से ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित हुई है और क्षेत्रीय विभाजन जैसा माहौल बन रहा है।
केन नदी क्षेत्र में प्रतीकात्मक प्रदर्शन
प्रतिबंधों के बावजूद आंदोलनकारी केन नदी क्षेत्र में विरोध दर्ज करा रहे हैं। दोनों जिलों के लोग अपने-अपने क्षेत्र में रहकर संयुक्त रूप से प्रदर्शन कर रहे हैं। इस बीच सबसे अधिक चर्चा महिलाओं द्वारा किए जा रहे प्रतीकात्मक 'चिता आंदोलन' की हो रही है। जिसमें महिलाएं छोटे बच्चों के साथ विरोध स्वरूप जमीन पर लेटकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रही हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई केवल मुआवजे की नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की है।
प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप
आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का कहना है कि प्रशासन पर दमनकारी रवैया अपनाने और भ्रष्टाचार को छिपाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। उनके अनुसार गांवों में बाहरी लोगों की आवाजाही पर रोक, दुकानों पर दबाव और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित करने जैसी स्थितियां सामने आई हैं।
वहीं, प्रशासनिक स्तर पर यह तर्क दिया जा रहा है कि किसी भी स्थिति में कानून-व्यवस्था को बिगड़ने नहीं दिया जाएगा और सभी निर्णय जनहित एवं सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर बढ़ता तनाव
गांवों में तनावपूर्ण माहौल की खबरें भी सामने आई हैं। आंदोलनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच कुछ स्थानों पर नोकझोंक की स्थिति बनी है। स्थानीय लोगों के अनुसार हालात लगातार अस्थिर बने हुए हैं और प्रशासनिक निगरानी बढ़ा दी गई है।
परियोजना को लेकर उठ रहा यह विवाद अब केवल विकास बनाम विस्थापन का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह स्थानीय समुदायों के अधिकार, पर्यावरण और प्रशासनिक नीतियों के बीच टकराव का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।