इंदौर हाई कोर्ट ने मैटरनिटी लीव को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। कहा कि मातृत्व अवकाश महिला कर्मचारियों का अधिकार है। इसे लेकर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता।
इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मैटरनिटी लीव को लेकर अहम फैसला सुनाया है। उन्होंने फैसले में साफ किया है कि महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश से रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी महिला के करियर या शैक्षणिक अवसरों पर सिर्फ इसलिए असर नहीं डाला जा सकता क्योंकि उसने बच्चे के जन्म और देखभाल के लिए छुट्टी ली थी।
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (DCI) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला डॉक्टर को एमडीएस (Master of Dental Surgery) कोर्स दोबारा शुरू करने से रोक दिया गया था।
महिला डॉक्टर ने दी थी DCI के आदेश को चुनौती
दरअसल, मामला डॉ. श्रद्धा पवार से जुड़ा है। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर DCI के फैसले को चुनौती दी थी। जानकारी अनुसार, डॉ. पवार ने साल 2018-19 में एमडीएस कोर्स में दाखिला लिया था। नियमों के तहत उन्हें यह कोर्स तय समय सीमा में पूरा करना था। लेकिन इस दौरान वह संस्थान में ट्यूटर के पद पर काम कर रही थीं और बाद में मातृत्व अवकाश पर भी गईं। इसी वजह से उनकी पढ़ाई पूरी होने में देरी हुई। डॉ. पवार के अनुसार, वह 7 नवंबर 2019 से 14 दिसंबर 2022 तक ट्यूटर के रूप में कार्यरत रहीं। इसके अलावा 10 अप्रैल 2022 से 14 दिसंबर 2022 तक उन्होंने मैटरनिटी लीव ली थी। इसके बाद उन्होंने एमडीएस की पढ़ाई फिर से शुरू करने की अनुमति मांगी थी।
कोर्ट ने की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने माना कि महिला डॉक्टर की नौकरी के दौरान दी गई सेवाओं और मातृत्व अवकाश की अवधि को कोर्स पूरा करने की समय सीमा में नहीं जोड़ा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि मातृत्व अवकाश महिलाओं को मिलने वाला कानूनी अधिकार है। किसी कर्मचारी को सिर्फ इस वजह से नुकसान नहीं उठाना चाहिए कि उसने इस अधिकार का इस्तेमाल किया है। कोर्ट ने DCI के उस फैसले को गलत माना, जिसमें डॉ. पवार को एमडीएस कोर्स दोबारा शुरू करने से रोक दिया गया था। इसके साथ ही DCI को उन्हें पढ़ाई फिर से शुरू करने की अनुमति देने के निर्देश दिए गए।
क्या होती है मैटरनिटी लीव?
मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश कामकाजी महिलाओं के लिए दी जाने वाली विशेष सवेतन छुट्टी होती है। इसका उद्देश्य गर्भावस्था, बच्चे के जन्म और शुरुआती देखभाल के दौरान महिला को जरूरी समय और सुविधा देना है। इस छुट्टी का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि महिलाएं नौकरी या करियर प्रभावित होने की चिंता किए बिना अपने स्वास्थ्य और नवजात बच्चे की देखभाल कर सकें। इंदौर हाई कोर्ट का यह फैसला इसी अधिकार को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।