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नर्मदा तट से जैव-विविधता की खुशखबरी, जबलपुर में मिलीं चार नई तितलियां

नर्मदा तट से जैव-विविधता की खुशखबरी, जबलपुर में मिलीं चार नई तितलियां

नर्मदा तट से जैव-विविधता की खुशखबरी जबलपुर में मिलीं चार नई तितलियां

जबलपुर से मध्यप्रदेश को जैव-विविधता के क्षेत्र में एक बड़ी और खास उपलब्धि मिली है। नर्मदा नदी और उसके आसपास के इलाकों में किए गए सर्वेक्षण के दौरान तितलियों की चार ऐसी प्रजातियां मिली हैं, जिन्हें इससे पहले कभी भी मध्यप्रदेश में दर्ज नहीं किया गया था। इसका अर्थ है कि ये तितलियां प्रदेश में पहली बार जबलपुर से रिकॉर्ड की गई हैं।

प्रदेश में पहली बार मिलीं चार तितलियां

इस शोध में कुछ तितलियों की पहचान संग्रहित नमूनों के आधार पर की गई, जबकि कुछ की पहचान वैज्ञानिक फोटोग्राफी के माध्यम से हुई। सभी प्रजातियों की पुष्टि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप की गई है। इस महत्वपूर्ण शोध का प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिका एंटोमोलॉजी रिसर्च जर्नल (वेब ऑफ साइंस) में किया गया है।

कौन-सी तितलियां हुईं दर्ज

मध्यप्रदेश से पहली बार दर्ज की गई इन तितलियों में निम्फैलिडी कुल की नेप्टिस सैफो और टैनैसिया लेपिडिया, जबकि रियोडिनिडी कुल की डोडोना डिपोआ और जेमेरोस फ्लेग्यास शामिल हैं। इन सभी प्रजातियों का रिकॉर्ड बरगी डैम कैचमेंट एरिया, जबलपुर से प्राप्त हुआ है। इससे यह क्षेत्र तितलियों की दृष्टि से एक उभरते हुए बटरफ्लाई हॉट-स्पॉट के रूप में सामने आया है।

डॉ. श्रद्धा खापरे व डॉ. अर्जुन शुक्ला ने की खोज

यह महत्वपूर्ण खोज डॉ. श्रद्धा खापरे और डॉ. अर्जुन शुक्ला द्वारा की गई है, जो अपने-अपने विषय के जाने-माने शिक्षाविद् और शोधकर्ता हैं। विगत दो वर्षों तक चले इस शोध के दौरान डोडोना डिपोआ (लेसर पंच) तितली 24 दिसंबर 2024 को दर्ज की गई, जबकि जेमेरोस फ्लेग्यास 2 जनवरी 2025 को रिकॉर्ड की गई। इसी क्रम में नेप्टिस सैफो (कॉमन ग्लाइडर/पैलस सेलर) तितली 10 जनवरी 2024 को दर्ज हुई, वहीं टैनैसिया लेपिडिया (ग्रे काउंट) 2 मार्च 2025 को रिकॉर्ड की गई।

पर्यावरण की सेहत का संकेत

इन सभी तितलियों की उपस्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि जबलपुर और नर्मदा क्षेत्र का प्राकृतिक वातावरण तितलियों जैसी संवेदनशील प्रजातियों के लिए आज भी अनुकूल बना हुआ है।

तितलियों पर शोधरत डॉ. श्रद्धा खापरे ने बताया कि तितलियां केवल रंगीन और आकर्षक कीट नहीं होतीं, बल्कि वे पर्यावरण की सेहत बताने वाली अत्यंत संवेदनशील जैव-सूचक होती हैं। वे परागण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिससे वनस्पतियों की प्रजनन क्षमता बनी रहती है।

शोध में विश्व रिकॉर्ड बना चुके डॉ. अर्जुन शुक्ला ने कहा कि यह खोज सिर्फ एक वैज्ञानिक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि नर्मदा और उसके आसपास की प्रकृति के जीवित और स्वस्थ होने का प्रमाण भी है। यह उपलब्धि बताती है कि जब प्रकृति को संरक्षण और समझ मिलती है, तो वह खुद अपने संकेत देती है। इस बार नर्मदा अंचल से यह संदेश चार नन्ही तितलियों के रंगीन पंखों के साथ पूरे मध्यप्रदेश तक पहुंचा है।