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पंच परिवर्तन से राष्ट्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा: डॉ. मोहन भागवत

पंच परिवर्तन से राष्ट्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा: डॉ. मोहन भागवत

पंच परिवर्तन से राष्ट्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा डॉ मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना के शताब्दी वर्ष के अवसर पर अभनपुर के सोनपैरी गांव स्थित असंग देव कबीर आश्रम में बुधवार को विशाल हिन्दू सम्मेलन आयोजित किया गया। हिन्दू सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत मुख्य वक्ता रहे। मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संत असंग देव एवं विशिष्ट अतिथि गायत्री परिवार की समाजसेवी उर्मिला नेताम की गरिमामयी उपस्थिति रही।

इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने पर देशभर में हिन्दू सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। मंडल स्तर पर यह आयोजन हो रहे हैं। संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष कोई उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज कार्य को और गति देने का अवसर है। इस अवसर पर स्वयंसेवक ‘पंच परिवर्तन’ विषय को लेकर समाज में जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हम केवल संकट की चर्चा नहीं करते, बल्कि उसके उपायों पर भी बात करते हैं, क्योंकि यदि हम दृढ़ रहेंगे तो किसी भी संकट का असर नहीं होगा। अपने संबोधन में उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा-एक खरगोश सोया हुआ था। अचानक पत्ता गिरा तो वह डर गया। उसने भगवान से कहा, “भगवान, मुझे छोटा क्यों बनाया? कुछ हाथी जैसा बना देते।” भगवान ने उसे ‘तथास्तु’ कह दिया।

अब वह तालाब में नहाने गया तो वहां मेढकों ने कहा, “वहां मगरमच्छ हैं, मत जाओ।” खरगोश ने फिर कहा, “हे भगवान, मगरमच्छ जैसी मोटी खाल दे देते।भगवान ने कहा, “तथास्तु।” अगले दिन वन में वह कहीं जा रहा था, तभी जानवरों ने कहा, “भागो, जंगली भैंसों का झुंड आ रहा है, यहां कोई मोटी खाल काम नहीं आएगी।” इस पर खरगोश ने पुनः भगवान को याद किया। भगवान ने कहा कि अलग-अलग रूप और क्षमताएं मांगने के बजाय भय समाप्त करने का वरदान मांग लेते।

सरसंघचालक ने पंच परिवर्तन के ये सिद्धांत बताए

पहला- भेद को समाप्त करना होगा। समाज के हर वर्ग में हमारा उठना-बैठना हो, सुख-दुःख में सहभागिता हो। “सबको मैं अपना मित्र बनाऊंगा” यही सामाजिक समरसता है। पानी का साधन जो भी हो, वह सबके लिए हो।

दूसरा- अपने घर में सप्ताह में एक दिन तय करके सब एक साथ भजन करें और घर पर बना भोजन साथ करें। आपस के सुख-दुःख की चर्चा करें। हम कौन हैं, देश की स्थिति और परिस्थितियों पर चर्चा करें। महान आदर्शों पर विचार कर यह तय करें कि उन्हें जीवन में कैसे अपनाया जाए और एक-दूसरे को प्रेरित करें।

तीसरा- आज ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ी चुनौती है। पर्यावरण संरक्षण के लिए मैं व्यक्तिगत स्तर पर क्या कर सकता हूं, इस पर विचार करना होगा। सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कैसे कम हो सकता है? पेड़ लगाएं और वाटर हार्वेस्टिंग करें।

चौथा- स्व के मार्ग पर चलना। घर, परिवार और समाज में अपनी भाषा बोलें। यदि दूसरे प्रांत में रहते हैं तो वहां की भाषा भी सीखें। अपनी वेशभूषा पहनें। हर दिन संभव न हो तो पूजा के समय अवश्य पहनें। अपनी वेशभूषा पहनना भी नहीं आता, यह उचित नहीं है। स्वदेशी वस्तुओं का अधिक उपयोग करें।

पांचवां- धर्मसम्मत आचरण के लिए नागरिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। संविधान हमारे पुरखों ने हमें प्रदान किया है, जिसमें हमारे मूल्य और संस्कृति के दर्शन होते हैं, इसलिए उसका पालन आवश्यक है। कुछ बातें कानून में नहीं हैं, जैसे माता-पिता और बड़ों के चरण स्पर्श करना-इससे विनम्रता आती है। बच्चों को संस्कार दें। घर में बच्चों से दान दिलवाने की परंपरा रही है, जिससे उनमें दायित्व का बोध आता है।

संघ के शताब्दी वर्ष में स्वयंसेवक यही पांच बातें लेकर समाज में जा रहे हैं। स्वयंसेवकों ने इन विषयों को पहले स्वयं अपनाया है। इन पांच बातों-पंच परिवर्तन-को अपनाकर हम राष्ट्र और समाज की उन्नति में सहभागी बन सकते हैं।

मातृत्व स्नेह का अद्भुत दृश्य हिन्दू संगम में

जैसे ही मंच पर मुख्य वक्ता, मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि को आमंत्रित किया गया, मंच पर मातृत्व स्नेह और मातृशक्ति के प्रति आदर का एक सुंदर दृश्य देखने को मिला। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गायत्री परिवार की वरिष्ठ समाजसेवी श्रीमती उर्मिला नेताम को सहारा दिया, जिन्हें आयु के कारण चलने में असुविधा हो रही थी, और भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित करने में सहयोग किया। यह दृश्य अत्यंत प्रेरक था।

बंटने का नहीं, संगठित होने का समय है: राष्ट्रीय संत असंग देव

कार्यक्रम के मंच से मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संत असंग देव ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमें स्वयंसेवा करना सिखाता है। यदि मधुमक्खियों में संगठन होता है तो हाथी भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। धन खो जाए तो पुनः मिल सकता है, मित्र भी वापस आ सकते हैं, लेकिन यदि मनुष्य का शरीर व्यर्थ चला जाए तो उसके पुण्य को पुनः अर्जित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि देवताओं से भी श्रेष्ठ मनुष्य का जीवन होता है, लेकिन उसके लिए संस्कार आवश्यक हैं। बिना संस्कार मनुष्य दानव बन जाता है। हिन्दू धर्म सभी पंथों की जड़ है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम भारत जैसी पुण्य भूमि में जन्मे, जहां भगवान राम और श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। आज बांग्लादेश समेत विश्व में जिस प्रकार की चुनौतियां हैं, ऐसे समय में बंटने का नहीं, संगठित होने का समय है।

उन्होंने कहा कि देश में जब भी कोई आपदा आती है, तो सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक खड़ा मिलता है, जो बिना प्रचार के सेवा कार्य करता है।

मातृशक्ति का जागरण सबसे आवश्यक: उर्मिला नेताम

हिन्दू सम्मेलन को संबोधित करते हुए गायत्री परिवार की समाजसेवी श्रीमती उर्मिला नेताम ने कहा कि आज समाज को संगठन की सबसे अधिक आवश्यकता है। परिवार बिखर रहे हैं, संस्कार देकर ही भारतीय संस्कृति को बचाया जा सकता है। विदेशी संस्कृति के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, ऐसे में मातृशक्ति का जागरण अत्यंत आवश्यक है।

कलाकारों ने दी सांस्कृतिक प्रस्तुति

सम्मेलन के दौरान छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार एवं गायिका आरु साहू और उनकी टीम ने भजन और लोकगीतों की सुंदर प्रस्तुति दी। उनके भजनों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो गया।

कोविदार का पौधा लगाकर दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश

हिन्दू संगम कार्यक्रम के पश्चात सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने सोनपैरी गांव में कोविदार का पौधा लगाकर लोगों को पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति दायित्व का संदेश दिया।