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कर्तव्य पथ पर पूर्वी एशिया का खास मेहमान, पहली बार परेड में दिखे मंगोलियाई ऊंट

कर्तव्य पथ पर पूर्वी एशिया का खास मेहमान, पहली बार परेड में दिखे मंगोलियाई ऊंट

कर्तव्य पथ पर पूर्वी एशिया का खास मेहमान पहली बार परेड में दिखे मंगोलियाई ऊंट

77वें गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ की परेड में इस बार कुछ अलग नजर आया. आधुनिक हथियारों और सैन्य टुकड़ियों के बीच दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंटों ने भी लोगों का ध्यान खींचा. ये वही मंगोलियाई ऊंट हैं, जो पूर्वी लद्दाख की कठिन परिस्थितियों में भारतीय सेना के भरोसेमंद साथी बन चुके हैं. गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार इन खास ऊंटों की मौजूदगी ने यह दिखा दिया कि सेना अब आधुनिक तकनीक के साथ-साथ पारंपरिक और कारगर संसाधनों को भी बराबर महत्व दे रही है।

क्यों सेना में शामिल किए बैक्ट्रियन ऊंट

पूर्वी लद्दाख जैसे दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में जहां वाहन भी कई बार जवाब दे देते हैं, वहां बैक्ट्रियन ऊंट सेना के लिए बड़ी मदद साबित हो रहे हैं. भारतीय सेना इन्हें भारी सामान ढोने, पेट्रोलिंग और लास्ट माइल डिलीवरी के लिए इस्तेमाल कर रही है। कठिन रास्ते, बर्फीली ज़मीन और ऑक्सीजन की कमी इन सबमें भी ये ऊंट बिना हिचक काम करते हैं।

क्या है इन ऊंटों की खासियत

बैक्ट्रियन ऊंट दो कूबड़ वाले होते हैं और मूल रूप से मंगोलिया व मध्य एशिया में पाए जाते हैं. ये 15,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर आसानी से काम कर सकते हैं और 150 से 200 किलो तक भार उठाने में सक्षम होते हैं.सबसे खास बात यह है कि ये माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी बिना परेशानी काम करते हैं, जहां आम इंसान के लिए खड़ा रहना भी चुनौती बन जाता है।

कहलाते हैं ‘कोल्ड डेजर्ट वॉरियर’

इन ऊंटों की शरीर संरचना उन्हें कड़ाके की ठंड से बचाती है. ये बिना पानी और भोजन के कई दिनों तक जीवित रह सकते हैं, जो पूर्वी लद्दाख जैसे इलाकों में बेहद अहम है.तेज़ हवा, कम ऑक्सीजन और जमा देने वाली ठंड के बीच ये ऊंट सेना के ऐसे साथी हैं, जिन पर हर हाल में भरोसा किया जा सकता है। यही वजह है कि इन्हें ‘कोल्ड डेजर्ट वॉरियर’ कहा जाता है।

भारत में कहां मिलते हैं बैक्ट्रियन ऊंट

भारत में बैक्ट्रियन ऊंट मुख्य रूप से लद्दाख और कोल्ड डेजर्ट क्षेत्रों में पाए जाते हैं. इन इलाकों में तापमान अक्सर माइनस में चला जाता है, हवाएं तेज होती हैं और हालात बेहद चुनौतीपूर्ण रहते हैं. कर्तव्य पथ पर इन ऊंटों की मौजूदगी सिर्फ परेड का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह संकेत भी था कि सीमाओं की सुरक्षा में परंपरा और प्रकृति दोनों की ताकत को भारत पूरी गंभीरता से अपना रहा है।

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