चंबल की रेत में दबे अंडों से जब हल्की-सी आवाज आती है, तो वह सिर्फ एक बच्चे की पहली पुकार नहीं होती, बल्कि एक प्राचीन प्रजाति के अस्तित्व का संदेश होती है। घड़ियाल के ये नन्हे बच्चे जन्म लेते ही ऐसे खतरों से घिर जाते हैं कि प्राकृतिक परिस्थितियों में 100 में से केवल एक-दो ही जीवित बच पाते हैं। यही वजह है कि चंबल में इन दुर्लभ जीवों को बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से उनका पालन-पोषण शुरू किया गया है, ताकि वे सुरक्षित रूप से नदी की दुनिया में लौट सकें।
पहली पुकार और मां का स्नेह
घड़ियाल फरवरी में प्रजनन करते हैं और अप्रैल में मादा रेत में 30 से 40 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा खोदकर 18 से 50 अंडे देती है। करीब एक महीने बाद जब बच्चे अंडों के भीतर से विशेष प्रकार की आवाज निकालते हैं, जिसे विशेषज्ञ 'मदर कॉल' कहते हैं, तब मां रेत हटाकर उन्हें बाहर निकालती है। यह दृश्य प्रकृति के सबसे भावुक क्षणों में से एक होता है।
पालीघाट बना जीवनरक्षक केंद्र
राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के पालीघाट में स्थापित विशेष संरक्षण केंद्र घड़ियाल शावकों के लिए जीवनरक्षक की भूमिका निभा रहा है। यहां बच्चों को मानसून के दौरान सुरक्षित रखा जाता है और बाढ़ का खतरा कम होने के बाद उन्हें प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाता है।
नदी में बाढ़ नन्हे बच्चों की सबसे बड़ी दुश्मन
घड़ियाल के बच्चों की देखभाल किसी नवजात शिशु की तरह की जाती है। विशेषज्ञ लगातार उनके स्वास्थ्य, वृद्धि और सुरक्षा पर नजर रखते हैं। लगभग तीन वर्ष में जब उनकी लंबाई 1.2 मीटर के आसपास पहुंच जाती है, तब उन्हें सर्दियों के मौसम में चंबल नदी की मुख्यधारा में छोड़ दिया जाता है।घड़ियालों के लिए सबसे बड़ा खतरा चंबल नदी का तेज बहाव और मानसून की बाढ़ है। प्राकृतिक परिस्थितियों में पैदा होने वाले करीब 98 प्रतिशत शावक बाढ़ में बह जाते हैं या अन्य कारणों से जीवित नहीं रह पाते। केवल एक से दो प्रतिशत बच्चे ही वयस्क अवस्था तक पहुंच पाते हैं।बाढ़ के अलावा बाज, कौवे और मगरमच्छ भी इन छोटे शावकों के लिए घातक साबित होते हैं। यही कारण है कि संरक्षण केंद्रों में उन्हें तब तक रखा जाता है, जब तक उनका आकार कुछ बड़ा नहीं हो जाता और नदी का जलस्तर सामान्य नहीं हो जाता।
जन्म के साथ शुरू होता है सुरक्षा अभियान
अंडों से बाहर निकलने के बाद शावकों को विशेष संरक्षण केंद्र में लाया जाता है। यहां उन्हें संक्रमण से बचाने के लिए रासायनिक घोल से साफ किया जाता है। 15 दिनों तक उन्हें क्वारंटीन पूल में रखा जाता है। इस अवधि में उन्हें अलग से भोजन की जरूरत नहीं होती। शुरुआती दिनों के लिए आवश्यक पोषण उनके शरीर में पहले से मौजूद रहता है।
दुर्लभ जलीय जीवों का आश्रय स्थल बनी चंबल
भारत सरकार द्वारा 1978 में स्थापित राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के प्रयासों का ही परिणाम है कि आज चंबल नदी दुर्लभ जलीय जीवों का महत्वपूर्ण आश्रय स्थल बन चुकी है। वर्तमान में यहां 2,938 घड़ियाल, 1,512 मगरमच्छ, 155 डॉल्फिन तथा बाटागुर कछुओं की विभिन्न प्रजातियां निवास कर रही हैं।चंबल की रेत से निकलकर नदी की धार तक पहुंचने की यह यात्रा केवल एक घड़ियाल की कहानी नहीं, बल्कि उन संरक्षण प्रयासों की मिसाल है जो विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजातियों को नया जीवन दे रहे हैं। नन्हे शावकों की हर बची हुई सांस चंबल के भविष्य की एक नई उम्मीद है।